केजरीवाल का धरना: ‘पूर्ण राज्य’ या ‘पूर्ण बहुमत’ के लिए?

महागठबंधन की ‘ममता’ में केजरीवाल का आमरण अनशन, पहले ममता बनर्जी, फिर चंद्रबाबू नायडू और अब अरविंद केजरीवाल. मोदी सरकार के ख़िलाफ़ 2019 की चुनावी जंग को धारदार बनाने के लिए महागठबंधन के मुख्यमंत्रियों की धरना पॉलिटिक्स को आगे बढ़ाएंगे केजरीवाल!

नई दिल्ली: 2014 में मुख्यमंत्री बनने के बाद अरविंद केजरीवाल के पहले धरने को याद कीजिए. दिल्ली पुलिस के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग करते हुए रेल भवन के बाहर जनवरी रकी सर्दियों में सीएम केजरीवाल धरने पर बैठे थे. 2018 में उपराज्यपाल के दफ्तर में धरने पर सीएम केजरीवाल और डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने धरना दिया. अब ज़रा ममता बनर्जी के धरने को याद कीजिए. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता जनवरी ही CBI और मोदी सरकार के ख़िलाफ़ धरने पर बैठी थीं. उसके बाद चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश को विशेष आर्थिक पैकेज दिलाने के लिए मोदी सरकार के ख़िलाफ़ दिल्ली में धरने पर बैठे.

मोदी सरकार के ख़िलाफ़ मुख्यमंत्रियों की इस धरना पॉलिटिक्स को केजरीवाल एक बार फिर अपने आमरण अनशन से आगे बढ़ाने का काम करेंगे. 1 मार्च से आमरण अनशन शुरू करने का ऐलान किया है. केजरीवाल का कहना है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा दिलाना है. विकास के तमाम कार्य रुके पड़े हैं. पुलिस राज्य सरकार की सुनती नहीं है. आरोप है कि मोदी सरकार उन्हें काम नहीं करने दे रही. मगर, आमरण अनशन के पीछे कुछ सवाल हैं, जिनका जवाब सीएम केजरीवाल ही दे सकते हैं. वो जवाब भले ना दें, लेकिन उन्हीं के कुछ विज्ञापनों से कई सवाल उठते हैं. तमाम अख़बारों, रेडियो और टीवी पर दिल्ली सरकार अपने ‘अभूतपूर्व’ विकास कार्यों का दावा करती है. जब मोदी सरकार काम नहीं करने दे रही. ज़्यादा अधिकार नहीं हैं, तो फिर दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने ऐतिहासिक विकास कैसे कर लिया?

अब 19 जनवरी 2019 को ममता की महारैली का वो मंच याद कीजिए, जिसमें महागठबंधन के तमाम राजनेता मौजूद थे. इस रैली का नाम तो यूनाइटेड इंडिया रैली था, लेकिन दरअसल ये मोदी सरकार के ख़िलाफ़ महागठबंधन का शक्ति प्रदर्शन बन गया. विपक्ष यही चाहता भी है और उसी मंच से ख़ुद दिल्ली के सीएम ने कहा था कि वो मोदी सरकार को 2019 में नहीं देखना चाहते हैं. पूरा विपक्ष हर तरह से इसी कोशिश में जुटा है. मगर, विरोधियों के पास मोदी सरकार के ख़िलाफ़ हथियार कम ही हैं. शायद इसीलिए मोदी विरोधी महागठबंधन ने धरने के ज़रिए माहौल बनाने की कोशिश जारी रखी है. ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू के बाद केजरीवाल का आमरण अनशन का ऐलान ये बताता है कि अब वो दिल्ली में 2019 के लिए आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार हैं. उनका लक्ष्य साफ़ नज़र आ रहा है. जिन लोगों के करप्शन और सियासी नीयत पर केजरीवाल ने हर मंच से निशाना साधा, अब वही लोग उन्हें अपने लगने लगे हैं. जिन लोगों पर केजरीवाल ने सवाल उठाए, आज उन्हीं के हाथों में हाथ डालकर जब वो 2019 का सियासी गठबंधन कर रहे हैं, तो लोग ‘आप’ को  सवालिया नज़रों से देख रहे हैं.

हो सकता है सीएम केजरीवाल को भूलने की आदत हो. क्योंकि, 2014 में वाराणसी से लोकसभा का चुनाव बुरी तरह हारने के बाद उन्होंने कसम खाई थी कि अब दिल्ली को छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे, कभी नहीं जाएंगे. मगर, उनका ध्यान अक्सर मोदी विरोधियों के मंच का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करने पर रहता है. हालांकि, मुख्यमंत्री केजरीवाल को ये नहीं भूलना चाहिए कि जनता कुछ नहीं भूलती। सिर्फ़ मोदी का विरोध करने से वोट नहीं मिलते. 2017 के नगर निगम चुनाव नतीजों में वो इस सच्चाई को अच्छी तरह समझ गए थे. इसीलिए करीब दो साल से उन्होंने टकराव की सियासत छोड़कर सिर्फ़ जनहित के कार्यक्रमों पर ध्यान देना शुरू किया था. लेकिन अब एक बार फिर केजरीवाल ने मोर्चा संभाला है. जनता के लिए केजरीवाल का संदेश है कि वो दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा दिलाने के लिए जान की बाज़ी भी लगा देंगे. आमरण अनशन इसी रणनीति का हिस्सा है. आख़िर क्या कारण है कि पूर्ण राज्य का दर्ज़ा दिलाने वाली जंग में संसद से लेकर कोर्ट तक हर बार हार का सामना करने के बावजूद केजरीवाल एक बार फिर मोर्चा संभालने के लिए तैयार हैं. दिल्ली वाले पूर्ण राज्य का दर्ज़ा मिलने के साथ-साथ ये भी जानना चाहते हैं कि जिस लोकपाल को भ्रष्टाचार मुक्त सियासत का सबसे बड़ा हथियार बनाकर आंदोलन किया. प्रदर्शन किए, राजनीतिक पार्टी बनाई, सीएम भी बने और अब उसी मज़बूत लोकपाल को भूल गए? दिल्ली की जनता जानती है कि पूर्ण राज्य के साथ-साथ लोकपाल के लिए आमरण अनशन जैसी कोशिश क्यों नहीं की? लोकपाल के बारे में सोचकर शायद केजरीवाल को वो चेहरे याद आ रहे होंगे, जिन्हें वो अपने मंच से कोसते थे और अब उन्हीं के मंच पर जाकर उनसे गले मिलते हैं. बहरहाल, दिल्ली की जनता को ये जानने का हक़ है कि क्या सच में केजरीवाल पूर्ण राज्य का दर्ज़ा दिलाने की लड़ाई लड़ रहे हैं या सिर्फ़ मोदी विरोधी महागठबंधन को पूर्ण बहुमत दिलाने के लिए दिल्ली का इस्तेमाल कर रहे हैं?