साठ साल के लोगों के लिए ऐसी घरबंदी..! अंतिम इच्छा यही है वरना अश्वत्थामा की तरह भटकूंगा

वह मान नहीं रहा था. मैं ग़ुस्से मे चिल्लाया.अगर मेरा अंतिम संस्कार बनारस में नहींं हुआ, तो मैं नही मरूंगा. वो सकते में आ गया. किसी को बुलाने जाने लगा और मैं उठ कर भागा. भागते भागते सोचने लगा कि कहां मरा जाय....
Life And Death In Time of Corona, साठ साल के लोगों के लिए ऐसी घरबंदी..! अंतिम इच्छा यही है वरना अश्वत्थामा की तरह भटकूंगा

एक वायरस ने वक्त को रोक लिया. जीवन ठहर गया. ठहरे वक्त में बड़ी फुर्सत होती है. कल्पनाओं की उड़ान के लिए. मेरी दादी प्लेग महामारी की कहानियां सुनाती थीं. बाबा ने स्पेनिश बुखार की भयावहता बताई थी, जिसे बाद में महाकवि निराला की कुल्लीभाट में पढ़ा. वह बुखार महाकवि का पूरा परिवार लील गया था. पर कोरोना की भयावहता और इस श्मशानी सन्नाटे का अहसास ‘प्लेग’ और ‘स्पेनिश फ्लू’ दोनों महामारी की कहानियों में नहीं था. आज का माहौल दादा-दादी के जीवन से ज़्यादा ख़ौफ़नाक लग रहा है.

समाज, दुनिया, धर्म, मंदिर, मस्जिद, चर्च सब ठहर गए हैं. चल रहा है तो बस जीवन की नश्वरता का चिंतन. अपने बीते हुए जीवन का ‘फ्लैश बैक’ और घर में खालीपन से उद्भूत कारगुजारियां. अब तक कैसे गुजरी, कहां गुजरी, आगे क्या होगा. आने वाले कल में रोजगार और भूख की क्या स्थिति होगी. हमारी सोच का यह नया टंटा है. बनारसी तो हमेशा मोक्ष और मुक्ति के बारे में सोचता है. फिर यह मुक्ति की चेतना हमें कहॉं ले जा रही है.

जीवन के उतरार्ध में वक्त का रुकना खतरनाक होता है. साठ साल के लोगों के लिए ऐसी घरबंदी. यह ख़ौफ़नाक है. लगता है दरवाजे के बाहर मौत बैठी है. पता नहीं दुनिया में बूढ़ों को ऐसी चेतावनी पहले कब मिली होगी? तो क्या कोरोना वायरस बर्थ सर्टिफिकेट देखकर आएगा. साठ तो नही पूरे हुए पर करीब पहुंच रहे हैं. उसे क्या मालूम कि अभी साठ साल पूरे नही हुए हैं. कोरोना अगर सिर के बाल देखकर आएगा तो मुझे दौड़ाकर पकड़ लेगा. फिर क्यों न वक्त से ठहरी जिंदगी का पूरा मज़ा लिया जाए.

इसे ही समय की ताकत कहते हैं एक पिद्दी वाईरस भी महाशक्तियों की कैसे बैंड बजाता है. उन महाशक्तियों के पास मिसाइल है. तोप है,एटम बम है. पर कोरोना का इलाज नहीं है. कोरोना में रोना निहित है. सभी ताकतवर रो रहे है.क्योंकि वायरस मरता नहीं, इसे अमरत्व का वरदान है.पूरी दुनिया में बिना वीज़ा के घूम रहा है. लोग उसके डर से हाथ धो रहे है. बार बार हाथ धोने से हाथ से पैसे की रेखा मिट रही है. हाथ न धोए तो जीवन की रेखा मिट सकती है. पश्चिमी देशों में धोने का चलन नहीं था. वो लोग काग़ज़ से काम चलाते थे. अब वो भी धोने पर उतारू हैं. हम सब छींकना, खाँसना कम पानी में उच्चस्तरीय हाथ धोना सीख गए हैं.

Life And Death In Time of Corona, साठ साल के लोगों के लिए ऐसी घरबंदी..! अंतिम इच्छा यही है वरना अश्वत्थामा की तरह भटकूंगा

सपने सच नहीं होते. सुबह का सपना तो बिलकुल नहीं. राष्ट्रकवि दिनकर लिख गए हैं- “आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का/आज उठता और कल फिर फूट जाता है/किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो?/बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है. “
फिर भी सपनों को सच बनाना पुरुषार्थ का काम माना गया है.वैसे भी उम्र के लिहाज से यह जीवन का वह मोड़ है जहां से दोस्त, मित्र बिछड़ना शुरू हो जाते हैं.जो आया है वह जाएगा, तो फिर जीवन में इतनी हाय-तौबा क्यों? कल आधी रात के बाद इसी उधेड़बुन में दिमाग घूम रहा था.

अज्ञेय के मुताबिक समय सिर्फ स्मृतियों में ठहरता है और स्मृतियाँ मरने से पहले तेज़ी से लौटती हैं.जीवन भर की घटनाएँ एक-एक कर याद आती हैं. जिन्दगी का लेखा-जोखा एक फिल्म की तरह चलता है.

जन्म के बाद अगर कोई एक चीज निश्चित है तो वह मृत्यु है. इसे सोच मैं जीवन में किए-अनकिए पर मंथन करने लगा. आधी रात के बाद लगा कि मृत्यु तो अवश्यंभावी है फिर इस पर क्या सोचना? आप ईश्वर के अस्तित्व को तो नकार सकते हैं लेकिन मृत्यु को नहीं. वह अटल है. दिमाग के कोने में कहीं बैठे कबीर ने कहा, ‘मरते-मरते जग मुआ, औरस मरा न कोय।’ सारा जग मरते मरते मर रहा है, लेकिन ठीक से मरना कोई नहीं जानता. यह ठीक से मरना क्या हो? कैसे मरा जाए ठीक से? कोरोना तो रोज़ रोज़ घुट-घुट कर मार रहा है. विचारों को पंख लगे कि मैं कहाँ मरूँ? और कैसे मरूँ? यह सोच एक अजीबोगरीब आनंदलोक में पहुँच गया. फिर जो कुछ हुआ, वह भूल नही सकता.हर मनुष्य के जीवन में एक बार यह अवस्था आनी है.पर न जाने क्यो मेरी कुछ चलते फिरते ही आ गयी. यह स्थिति और सुखद है.

तो भंतो हुआ यूं कि कल रात मैं कोरोना का शिकार हो गया.हालात बिगड़ी और प्राण चले गए।कोरोना तो साठ के उम्र वालो को पकड़ता है. मेरा दो साल बाक़ी है. पर डाक्टर कह रहा था, ‘अरे भाई वह बर्थ सर्टिफिकेट थोड़े ही देख रहा है. अन्दाज़ से मार रहा है. आपका काम हो गया. आपके समाचार अब समाप्त.’

Life And Death In Time of Corona, साठ साल के लोगों के लिए ऐसी घरबंदी..! अंतिम इच्छा यही है वरना अश्वत्थामा की तरह भटकूंगा

डॉक्टर मुझे बेदर्दी से प्लास्टिक की थैली में सील बंद करने लगे. मैंने उनसे निवेदन किया कि मुझे मेरे घर वालो को सौंपपा जाय.वे बोले नही. गृह मंत्रालय ने अन्तिम संस्कार की गाइड लाइन बनायी है. सबका सामूहिक अन्तिम संस्कार विद्युत शवदाह गृह में होगा. मैंने कहा, ‘प्रभु मैं तो निकल ही लिया. अब एक ही इच्छा बची है कि गंगा किनारे काशी में अन्तिम संस्कार हो. इसे पूरा होने दे. मर तो गया ही हूँ।’ कहने लगे कि आपको जाने नहीं दिया जायगा, इससे संक्रमण फैलेगा. मैंने कहा, ‘मालिक मैं बोलूँगा तभी तो संक्रमण फैलेगा.मैं बोलूँगा नही, मास्क लगा कर चुपचाप लेटा लेटा चला जाऊँगा.जहाज़ और रेल तो बंद है. अखिलेश जी ने जाने के लिए सड़क बना दी है उसी से चुपचाप निकल लूगॉं।’ मुर्दाघर में मौजूद आदमी मुझसे हील हुज्जत किए जा रहा था. गृह मंत्रालय सख़्त है.मैंने कहा, ‘आप गृहमंत्री से पूछ लें.उन्हे भी बनारस से प्रेम है.मै उन्हें जानता हूँ।शायद वे नियमों को शिथिल कर दें.’ मेरी बात सुनकर वह थोड़ा ढीला तो हुआ पर मानने को तैयार नही था. मैं निवेदन कर रहा था.मेरी अन्तिम इच्छा यही है वरना अश्वत्थामा की तरह मैं भटकता रहूँगा.

वह मान नहीं रहा था.मैं ग़ुस्से मे चिल्लाया.अगर मेरा अंतिम संस्कार बनारस में नहींं हुआ, तो मैं नही मरूंगा. वो सकते में आ गया. किसी को बुलाने जाने लगा और मैं उठ कर भागा. भागते भागते सोचने लगा कि कहां मरा जाय. मित्रों का दखल मेरे जीवन में बहुत रहा है.इसलिए मैं सार्वजनिक होने की हद तक सामाजिक हूँ.शास्त्रों ने मरने के लिए काशी को सबसे उपयुक्त जगह माना है.कहते हैं, काशी में मरो तो मोक्ष मिलता है.कबीर इस धारणा को तोड़ना चाहते थे, इसलिए वे मरने के लिए काशी से मगहर गए.कबीर को पता नहीं मगहर में मोक्ष मिला या नहीं, लेकिन काशी अपनी जगह, अपनी धारणा और स्थापना पर कायम है।

काशी यानी महाश्मशान, उसके अधिपति शिव यहीं विराजते हैं.इसलिए मृत्यु यहाँ परम पवित्र है।उत्सव है.लेकिन अब मसला यह था कि मेरी मौत इवेंट कैसे बने? इस पर दिमाग़ तेज़ी से चलने लगा.मित्रों की राय मृत्यु को बड़ा इवेंट बनाकर पेश करने की थी.इसलिए वे कहने लगे, मृत्यु का जो मजा दिल्ली में है, वह बनारस या छोटे शहर-कस्बों में कहाँ? लेकिन अब तो बनारस प्रधानमंत्री का चुनाव क्षेत्र है. उसकी हैसियत दिल्ली से कम नही है.पर मित्र अड़े हुए थे कि दिल्ली में मृत्यु को इवेंट बनाया जा सकता है. जरूरत पड़े तो किसी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी को ठेका भी दिया जा सकता है।बनारस में यह संम्भव नहीं है. गेस्ट कोआर्डिनेशन के महारथी योगेश सिंह दो इवेंट कंपनियों का रिफरेंस भी देने लगे जो रातो रात तिल का ताड़ बना देती है.दिल्ली में खबर को तूफान बनानेवाले टेलीविजन चैनल भी हैं.फिर अपने संत जी तो मेरी मौत को पाकिस्तान और चीन से भी जोड़ सकते हैं.राष्ट्रीय कहे जाने वाले अखबार भी यहीं हैं.टी.वी. पर न्यूज ब्रेक होगी.अखबार में फोटो छपेगी।शोक संदेशों का ताँता लगेगा.हो सकता है, राष्ट्रपति भवन या पीएमओ से शोक संदेश भी आए.

Life And Death In Time of Corona, साठ साल के लोगों के लिए ऐसी घरबंदी..! अंतिम इच्छा यही है वरना अश्वत्थामा की तरह भटकूंगा

यह पुरानी बात है कि ‘काश्यां मरणान् मुक्ति.’ यानी काशी में मरने में मुक्ति है, लेकिन अब दुनिया बदल गयी है।दिल्ली में मरने से प्रसिद्धि है, जलवा है।मेरे सामने दुविधा बड़ी थी, किधर जाएँ. दोनों में से एक चुनना था.दिल्ली में आप चाहे कितने ही ‘झंडू’ या ‘चिरकुट’ आदमी हों, मरने के साथ ही दुनिया को पता चलता है कि आपके साथ एक बड़े युग का अंत हो गया.आपकी कमी पूरी नहीं हो सकती .पत्रकार हैं तो पराड़कर के बाद आप ही थे.कहानी, उपन्यास लिखते हैं तो प्रेमचंद की परंपरा की आप आखिरी कड़ी थे.कवि हैं तो जान लीजिए आपके साथ उत्तर-आधुनिक कविता का युग खत्म हो गया, यानी जो काम आप जीते-जी नहीं कर पाए, वह जलवा मरने के बाद होगा.

फिर अगर बनारस में ही मरना है तो मरो ‘धूमिल’ और ‘मुक्तिबोध’ की मौत. कुछ लोग जानेंगे, कुछ नहीं.आपकी मौत गुमनामी के अँधेरे में खो जाएगी, क्योंकि काशी में न लोग जीवन को महत्त्व देते हैं न मृत्यु को.सबको ठेंगे पर रखते हैं.इसी तर्क-वितर्क में मित्रों का दबाव दिल्ली और जड़ें बनारस की ओर खींच रही थीं. सो फॉर्मूला बना. मरना दिल्ली में है और अंतिम संस्कार बनारस में होगा. यह विचार करते-करते जाने कब मेरे प्राण-पखेरू उड़ गए. चैनलों पर खबर चली. एकाध जगह खबर मेरी लगाई और फोटो किसी दूसरे की. बड़े-बड़े अखबारों में छोटी-छोटी फोटो छपी. राजनेताओं ने कहा—वे कलम के धनी थे, उनकी कमी पूरी नहीं हो सकेगी.कुछ मन-ही-मन बुदबुदा भी रहे थे—अच्छा हुआ, चले गए. नाक में दम कर रखा था. हर फटे में टाँग अड़ाते थे. चलो पिंड छूटा. हर रोज़ किसी का काम लगाते थे.

किसी ने कहा, दोस्त अच्छा था.पर ऐसी दोस्ती का क्या मतलब कि लिखने में कोई मुरव्वत नहींं करता था. मेरे दफ्तरवाले कुछ मित्रों का कहना था—“अच्छा हुआ, यहीं मर गए, बनारस में मरते तो पैसे और समय दोनों की बरबादी होती.” मेरा पड़ोसी बोला, “आदमी तो अच्छे थे, मददगार थे, पर उनके यहाँ इतने लोग आते थे कि पार्किंग की समस्या हर रोज होती थी.अब इससे छुटकारा मिलेगा.” रिश्तों पर शेर पढ़ने के माहिर मित्र आलोक ने मेरी फोटो के साथ मेरे और अपने रिश्ते पर शेर ट्वीट किया—“घर के बुजुर्ग लोगों की आँखें क्या बुझ गईं/अब रोशनी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा.”

मुझे अपने कई मित्रों को लेकर उत्सुकता थी.वे मेरी मौत के बाद क्या करते हैं? कैसे शोक मनाते हैं? क्या कहते हैं? कैसा व्यवहार रहता है उनका? मैं चुपचाप सुबह के अखबार झाँक रहा था.कहाँ क्या छपा है? किसी ने फोटो छापी, किसी ने नहीं.तभी देखा कि तमाम बंदिशों के बावजूद मित्र लोग मास्क लगाकर आने लगे.मुझे पहचानने में दिक्कत हो रही थी.शिवेंद्र सिंह जीवन की नश्वरता का बखान कर रहे थे.कह रहे थे कि जीवन में क्या रखा है? दो वक्त की रोटी और एक वक्त की दारू, यही तो चाहिए.रोटी का इंतजाम खुद करता था.दारू का वे कर देते थे.अब दोनों मुझे करना पड़ेगा.

पुष्पेश जी दुखी थे. किसी को दुखी हो मेरे आतिथ्य और खानपान की आदतों के बारे में बता रहे थे. तभी देखा एक लंबी मर्सडीज से हिंदी सिनेमा के हीरो सा कोई उतरा.अरे यह तो महाकवि हैं. दुखी महाकवि बोले, दिल्ली के भीतर से बनारस चला गया.वे फिर सूफियाना अंदाज़ में गुनगुनाने लगे, जो आता है, वह जाता है.तू किसका शोक मनाता है.बाबर, अकबर मिट जाते हैं, कबिरा फिर भी रह जाता है. अपने कंट्रीमॉउथ यशवन्त देशमुख वस्तुतः दुखी थे.कह रहे थे दुनिया मुझे बड़ा सेफोलाजिस्ट मानती है.बड़े भाई मेरा परिचय सेक्सोलाजिस्ट के तौर पर सबसे कराते थे.मेरी प्रोफ़ाईल ही बिगाड़ दी थी.सिर पर हाथ रखे यशवन्त बनारस जाने की तैयारी में थे.पहली बार मैं अशोक वानखेड़े को बहुत धीमी आवाज़ में बोलता सुन रहा था.कह रहे थे वो तो चले गए मुझे मक़दल कौन देगा.

Life And Death In Time of Corona, साठ साल के लोगों के लिए ऐसी घरबंदी..! अंतिम इच्छा यही है वरना अश्वत्थामा की तरह भटकूंगा

तभी मेरे एक मौलाना मित्र शमई साहब आते दिखे.मौलाना दोस्त हैं.मेरी उनसे उर्दू और संस्कृत पर काफी बहस होती रही है ।आठ बच्चों के पिता यह मौलाना आज भी यही समझते हैं कि बच्चे बुजुर्गों की दुआओं से होते हैं.उन्होंने दिल की गहराइयों से अफसोस जताया.दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मित्र बहुत दुखी थे.ये प्रोफेसर कवि भी हैं.इनकी कविता समझ में न आएं तो दुगना मज़ा देती हैं.दुखी थे वो भी.

आने वालों में वैदिक जी भी थे.कह रहे थे कि भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश-अफगानिस्तान की राजनीति और पत्रकारों से मेरा संबंध रहा है.यह आदमी बढ़िया था. मेरा ख़्याल रखता था. इस बीच योगेश लगातार परेशान दिख रहा था.उसकी चिंता थी कि शव यात्रा में कौन-कौन से गेस्ट होंगे? वीआईपी लोगों के लिए फूल और माला का आर्डर अभी तक नही हो पाया है.अब वे घर से फूल लेकर तो आएंगे नहीं! अयोध्या के राजकुवर यतींद्र मिश्र अयोध्या पर लिखी मेरी किताब का जिक्र कर रहे थे.इस किताब का अंग्रेजी संस्करण आना बाकी रह गया था.अगर समय से आ जाता तो एक और भव्य विमोचन समारोह का लुत्फ लिया जाता. पर होनी को कौन टाले वक्त से पहले चले गए.मित्र शीतल सिंह बार बार अपने सर पर हाथ फेर रहे थे.

कह रहे थे कि उनकी यादें मेरे सिर पर सवार हैं. जाने से पहले उन्होंने मेरे सर के बाल काटे थे. उनके साथ अपने छोटे वाले कमिश्नर राजकेश्वर थे.जो शरीर के अलग अलग हिस्सों से जीव के जाने के बाद निर्जीवता के पहलू पर प्रकाश डाल रहे थे. राहुल देव बेहद दुखी थे.उन्होंने कुछ दिन पहले ही मुझ पर यह कहते हुए गांडीव उठाया था, “हर तरह के बल से भरपूर, शिवगणों का यह गणाध्यक्ष अपने तीखे सींगों से राह चलते, जाने-अनजाने किसकी टोपी उछाल दे, धोती खींच दे, नाड़ा खोल दे, पतलून फाड़ दे, कोई नही जानता।” वे किसी को बता रहे थे कि मेरे बारे में फेसबुक पर जाने क्या क्या लिख गया था,पर लिखा जानदार था.उसके जाने का अफसोस है! जनसत्ताई साथी भी काफ़ी थे.पुराने दिनों की याद करते शम्भूनाथ जी जनसत्ता की बॉटम स्टोरियों के कुछ पुराने क़िस्से सुना रहे थे.

जारी… काशी की प्राणवायु हैं धूप, अगरबत्ती, गांजे, ठहरे पानी की गंध के साथ चिताओं से उठती चिरांध

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