योगी आदित्यनाथ ‘बैगपाइपर सोडा’ की तरह कर रहे हैं चुनाव प्रचार

भड़काऊ बयानों के चलते चुनाव आयोग ने चार लोगों के चुनाव प्रचार पर बैन लगाया. मायावती, मेनका गांधी, आजम खान और योगी आदित्यनाथ. तीन लोग तो चुप होकर बैठ गए लेकिन योगी आदित्यनाथ ने ऐसा जुगाड़ निकाला कि सांप भी मरा जा रहा है और लाठी भी नहीं टूटने वाली.

जून 2017 में भारत पाकिस्तान का क्रिकेट मैच था. मैच होने से पहले ही पूरा भारत दो हिस्सों में बंट गया था. एक तरफ के लोगों का कहना था कि मैच होना चाहिए. दूसरी तरफ वाले कह रहे थे कि पाकिस्तान हमारी पीठ में हर बार छुरा घोंप जाता है, इससे खेलने का सवाल ही नहीं उठता. उसी लव-हेट मोमेंट में एक चैनल पसोपेश में पड़ गया था. उसे मैच की रिपोर्टिंग भी करनी थी और मैच का बहिष्कार भी करना था.

उसने बहुत बढ़िया तरीका निकाला. सारा दिन मैच की कमेंट्री करता रहा और बताता रहा कि हम मैच की रिपोर्टिंग नहीं करेंगे. जैसे- पाकिस्तान ने खड़ा कर लिया है भारी भरकम स्कोर, भारत के लिए बड़ा चैलेंज. लेकिन हमें क्या, हम मैच की रिपोर्टिंग नहीं करेंगे. हार्दिक पंड्या का विकेट गया लेकिन हमें क्या लेना देना, हम तो मैच की रिपोर्टिंग कर ही नहीं रहे हैं.

election 2019, योगी आदित्यनाथ ‘बैगपाइपर सोडा’ की तरह कर रहे हैं चुनाव प्रचार

अभी वैसा मैच तो नहीं चल रहा लेकिन देश में आम चुनाव चल रहा हैं. लेकिन एक वैसा ही सीन देखने को मिल रहा है. दरअसल चुनाव आयोग ने एक के बाद एक 4 नेताओं के चुनाव प्रचार करने पर रोक लगा दी. मायावती, आजम खान, मेनका गांधी और योगी आदित्यनाथ. इनमें से तीन लोगों ने प्रचार रोक दिया और घर बैठ गए. ये है आम जिंदगी. योगी आदित्यनाथ ने प्रचार का तरीका बदल दिया. ये है मेंटॉस जिंदगी.

अब वो कहीं रैली कर रहे हैं, न स्पीच दे रहे हैं, न अली-बजरंग बली कर रहे हैं. वो तो बस भगवान की शरण में मंदिर-मंदिर घूम रहे हैं. लेकिन उनके पीछे कैमरे हैं और वो उनका हर एक काम जनता तक वैसे ही पहुंचा रहे हैं जैसे रैली और स्पीच पहुंचाते थे. जिस हिंदुत्व की ब्रांडिंग योगी आदित्यनाथ चुनाव प्रचार में कर रहे थे वही मंदिर-मंदिर घूमकर पूजा पाठ करके कर रहे हैं. इससे निपटने का शायद ही कोई रास्ता चुनाव आयोग के पास हो.

election 2019, योगी आदित्यनाथ ‘बैगपाइपर सोडा’ की तरह कर रहे हैं चुनाव प्रचार

प्रचार का ये आइडिया चुनाव में नया है, बिजनेस की दुनिया में पुराना है. इस तरीके को सरोगेट ऐडवर्टाइजिंग कहते हैं. 1995 में भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने पाया कि शराब और तंबाकू उत्पादों का प्रचार जनता के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालता है. वो ये प्रॉडक्ट्स प्रचार से प्रेरित होकर खरीदते हैं, इस्तेमाल करते हैं और बीमार होते हैं.

इन प्रॉडक्ट्स के प्रचार पर रोक लगा दी गई. कंपनियों ने नया तरीका निकाला. अब भी वो तरीका टीवी पर आप देख सकते हैं. बैगपाइपर सोडा की आड़ में शराब का प्रचार, रजनीगंधा इलायची की आड़ में पान मसाने का प्रचार होता है. ये घुमाकर कान पकड़ने जैसा मामला है.

वैसे तो चुनाव आयोग बहुत कुछ कर सकता है लेकिन जब नए नए तरीके सामने आ जाते हैं तो कैसे निपटा जाए. इससे पहले भी जरूर कुछ लोगों ने चुनाव आयोग के आदेश को ठेंगा दिखाया है लेकिन देश के सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री होते हुए, जिम्मेदार पद पर होते हुए ऐसा करने वाले योगी पहले हैं. योगी अब ‘धड़कन’ फिल्म के गाने के बोल बदलकर गा सकते हैं.

ना ना करते प्रचार हाय मैं कर गया…कर गया….कर गया.

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