बीजेपी-शिवसेना अध्याय: दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे…

शिवसेना जिसके सामना में सालों साल एनसीपी और कांग्रेस की जमकर आलोचना की गई है, वही कांग्रेस-एनसीपी के गुण गाती पाई गई.
Maharashtra cm politics, बीजेपी-शिवसेना अध्याय: दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे…

मशहूर शायर बशीर बद्र का एक बेहद ही मशहूर शेर है कि दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे/जब कभी हम दोस्त हो जाएंतो शर्मिंदा न हों. मगर महाराष्ट्र में पिछले दिनों में जो कुछ भी हुआ, बीजेपी और शिवसेना दोनों ने ही इस शेर के मायने बदल डाले. ढाई दशक की दोस्ती कड़वाहट के घूंट में बदल गई. देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का ऐलान करते हुए भी सिर्फ शिवसेना को ही कोसा.

इस्तीफे का ऐलान करने से पहले देवेंद्र फडणवीस ने सूबे में अस्थिरता का ठीकरा शिवसेना पर फोड़ा. उन्होंने कहा कि हमने साथ मिलकर चुनाव लड़ा और बहुमत हासिल किया था और हमें जनता ने 105 सीटें देकर ज्यादा समर्थन दिया. लेकिन, शिवसेना ने यह देखते हुए कि उसके बगैर सरकार नहीं बन सकती है तो वह सीएम की मांग पर अड़ गई, जबकि ऐसी कोई बात तय नहीं हुई थी. शिवसेना ने सरकार गठन के लिए हमसे बात करने की बजाय एनसीपी से बात की. यही नहीं, शिवसेना पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि जिनके बारे में हमने सुना था कि वे मातोश्री से बाहर नहीं निकले, वे निकल-निकलकर तमाम लोगों से मिल रहे थे.

देवेंद्र फडणवीस  शिवसेना पर लगातार हमलावर रहे. उन्होंने कहा कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था, उसके बाद तीनों पार्टियां चर्चा करते-करते 10 दिन तक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम तक तय नहीं कर पाईं. इनका मकसद बस बीजेपी को हटाकर सत्ता पाना था. उनकी वैचारिक भूमिका एक-दूसरे से मेल नहीं खाती थी. शिवसेना का हिंदुत्व अब सोनिया जी के चरणों में नतमस्तक है. जब ये सरकार नहीं बना पाए, ऐसे समय में अजित पवार ने हमें समर्थन देने की चर्चा की. उन्होंने कहा कि हम समर्थन देकर सरकार बनाना चाहते हैं. उनके समर्थन से हमने सरकार बनाई. 

उधर शिवसेना भी बीजेपी पर खासी तल्ख रही. उसने अपने मुखपत्र सामना के जरिए बीजेपी और राज्यपाल पर जमकर निशाना साधा तो वहीं एनसीपी चीफ शरद पवार की जमकर तारीफ की. सामना के जरिए शिवसेना ने कहा है कि अजित पवार का सारा खेल खत्म हो गया है. अजित ने राज्यपाल को झूठा पत्र दिया था. उन्होंने बीजेपी को चेतावनी भरे लिहाजे में कहा है कि तुमने 25 साल की दोस्ती देखी है, अब दुश्मनी देखो.

सामना के जरिए शिवसेना ने महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस से पूछा कि अगर उनके पास बहुमत है तो ऑपरेशन लोटस क्यों चलाया जा रहा है? उन्होंने कहा कि विधायकों का अपहरण कौन सी चाणक्य नीति है. उन्होंने राज्य की जनता से कहा है कि वह चिंता ना करें. कांग्रेस-शिवसेना-एनसीपी ने 162 विधायकों का पत्र राजभवन को दिया है.

बड़ी बात यह थी कि शिवसेना जिसके सामना में सालों साल एनसीपी और कांग्रेस की जमकर आलोचना की गई है, वही कांग्रेस-एनसीपी के गुण गाती पाई गई.

सामना में शरद पवार की तारीफ करते हुए शिवसेना ने लिखा है कि उन्होंने बड़ी हिम्मत के साथ पार्टी खड़ी की है. 50 साल तक संसदीय राजनीति में टिके रहना आसान नहीं है. उन्होंने कहा कि राज्यपाल भगत सिंह ने अंधेरे में लोकतंत्र को सूली पर चढ़ा दिया. 

महाराष्ट्र की राजनीति में यह बेहद अप्रत्याशित घटनाक्रम है. हालांकि शिवसेना पिछले 5 सालों से सरकार में होने के बावजूद केंद्र पर हमला करती आई है. मगर दोनों पार्टियां राह अलग कर लेंगी, यह किसी ने नहीं सोचा था. सियासी हितों के टकराव ने स्थिति को यहां तक पहुंचा दिया. देवेंद्र फडणवीस ने इस्तीफा देने के साथ नई सरकार के गिरने की भविष्यवाणी भी कर दी.

फडणवीस ने कहा कि जो भी सरकार बनाएगा, उसे शुभकामनाएं. शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन पर हमला करते हुए उन्होंने कहा कि तीन पहियों वाली सरकार ज्यादा दिन नहीं टिकेगी क्योंकि सभी पहियों की दिशाएं अलग-अलग होंगी, उनकी विचारधाराएं अलग-अलग हैं.

यह हाल तब है जब वीर सावरकर को भारत रत्न देने के मुद्दे पर शिवसेना और भाजपा दोनों एक साथ थे  जबकि एनसीपी और कांग्रेस  ने अलग राह पकड़ी थी. यही हाल राम मंदिर के मुद्दे पर भी था. मगर सत्ता के लिए सारे समीकरण बदल गए. इस बीच शिवसेना की शरद पवार ने खुलकर मदद की.

शरद पवार ने शिवसेना के चीफ उद्धव ठाकरे के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की और अपने पास नंबर होने का दावा किया. शनिवार शाम तक ही शरद पवार ने भतीजे अजित पवार के साथ माने जा रहे उन करीब एक दर्जन विधायकों में से आधे लोगों को अपने खेमे में बुला लिया था. इसके अलावा, सोमवार को शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने जब मुंबई के एक होटल में 162 विधायकों की परेड कराई तो अजित पवार को छोड़ कर एनसीपी के सभी विधायक मौजूद थे.

विरोधाभास देखिए एक और शिवसेना और बीजेपी एक दूसरे पर बेहद तीखा वार किए जा रहीं थीं, वहीं दूसरी ओर एनसीपी अजित पवार को मनाने की कोशिशों में जुटी हुई थी. अजित पवार ने भले ही शनिवार को डेप्युटी सीएम की शपथ लेकर एनसीपी को झटका दिया था, लेकिन शरद पवार और परिवार के अन्य लोग उनसे लगातार वापसी की अपील करते रहे. एक तरफ शरद पवार अपने विधायकों को एकजुट कर रहे थे तो दूसरी तरफ अजित पवार से मिलने के लिए दूत भी भेज रहे थे. कहा जा रहा है कि मंगलवार को शरद पवार की पत्नी और सुप्रिया सुले के पति सदानंद ने अजित पवार से बात की और उन्हें वापसी के लिए राजी किया.

शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अपने विधायकों को संबोधित करते हुए भी बेहद तीखे तेवर दिखाए. उन्होंने कहा, “हमारे गठबंधन की ताकत को किसी कैमरे में कैद नहीं किया जा सकता है. हम लोग यहां आये हैं और हमारे रास्ते स्पष्ट है. आपको नहीं पता है कि शिव सेना क्या है, तो हमारा रास्ता काटने का प्रयास करें, हम आपको दिखायेंगे कि शिव सेना क्या है? हम महाराष्ट्र से इसकी शुरुआत कर रहे हैं और फिर आगे बढ़ेेंगे.”

यानि भगवा राजनीति के दो सिरे एक दूसरे के जानी दुश्मन चुके हैं. आने वाले वक्त में यह दुश्मनी और भी गहरा सकती है पर राजनीति संभावनाओं का खेल है. मगर इतना तय है कि दोबारा साथ होने की सूरत में कटुता का ये इतिहास दोनों ही पार्टियों का पीछा जरूर करेगा.

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