‘नाम बदलने’ जैसे तीर छोड़ने बंद कर दीजिए, सरकारें आएंगी-जाएंगी पर ये देश रहना चाहिए

ताजमहल (Taj Mahal) के ईस्‍ट गेट पर बन रहे मुगल म्‍यूजियम (Mughal Museum) का नाम बदल दिया गया है. जी हां, अब इसे छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम से ही जाना पहचाना जाएगा.

आइए आपको अग्रवन (Agravan) ले चलते हैं. बोलिए चलेंगे कि नहीं. माथे में ज्‍यादा जोर देने की जरूरत नहीं है. यह कोई हिमालय (Himalaya) की कंदराओं में नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्‍ली (Delhi ) से कोई दो सौ किलोमीटर दूरी पर बसा आपका आगरा ही है.

नाम बदलने की सियासत चरम पर है. दरअसल ये चलन ही पुराना है. बस दौर नया है. सब कुछ ठीक ठाक रहा तो वो दिन दूर नहीं जब आप मोहब्‍बत की नगरी और जहां से दिल को छू लेने वाली वाह ताज जैसी लाइनें निकली हैं उस खूबसूरत शहर आगरा को अग्रवन के नाम से जानेंगे. इस आर्टिकल को लिखने की खुराफात यहीं बन रहे एक म्‍यूजियम के हाल में नाम बदलने से ही हुई है. ताजमहल के ईस्‍ट गेट पर बन रहे मुगल म्‍यूजियम का नाम बदल दिया गया है. जी हां, अब इसे छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम से ही जाना पहचाना जाएगा.

राष्ट्रवादी विचारों को पालने पोसने की इसे एक तरह की कवायद का हिस्‍सा ही माना जा रहा है. इस म्‍यूजियम का नाम मुगल रहे या शिवाजी, इस सबसे आज की पीढ़ी को कोई फर्क नहीं पड़ता. फर्क पड़ता है तो इससे कि किसी की भूख से मौत न हो. हर सर पर छत हो और न्‍याय सबके लिए बराबर हो. ऐसा करके आप क्‍यों किसी को बांटने पर तुले हो जो सालों से साथ रहते आ रहे हैं. आप अपनी हरकतों से किसी को सोचने को मौका ही क्यों देते हो. बताओ?

किसी के दिमाग में आखिर क्‍यों ऐसे बीज रोपे जा रहे हैं, जिसके फल आगे चलकर जहरीले हो जाएं. अपने तरकश से ऐसे तीर निकालने बंद कर दीजिए, जिससे कोई भी धर्म या समुदाय या लोग आहत हो. अगर प्रतीकों को हटाने पर ही आमादा हो जाया जाएगा तो ताजमहल, कुतुबमीनार, चार मीनार जैसी धरोहर खोजते ही रह जाएंगे. अति सर्वत्र वर्जयेत्. इस बात की क्‍या गारंटी है कि 150 करोड़ के इस प्रोजेक्‍ट का नाम आगे चलकर 150 बार न बदला जाए?

राइट हो या लेफ्ट…नाम बदलने के खेल से दूर ही रहना चाहिए

ऐसे फैसले करके आखिर क्‍यों अतिवादियों को हम आग के गोले जैसे धधकते बयान देने या हरकतें करने का मौका देते हैं. जैसे ही वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग के जरिए यह तीर छोड़ा गया वैसे ही कई बयानवीर भी सामने आ गए. सोशल मीडिया में कोई कह रहा है कि मुगल अब गूगल में भी नहीं मिलेंगे तो वहीं कोई कह रहा है कि इन ‘आतंकियों’ पर क्‍यों कोई आंसू बहा रहा है? विकास की दुहाई देकर आप नाम बदलने की सियासत नहीं खेल सकते. चाहे राइट हो या लेफ्ट…नाम बदलने के खेल से दूर ही रहना चाहिए.

उस शख्स का क्या जिसने अपने नाम के आगे इलाहाबादी लगा रखा हो. हर पल वो उस नाम को जीता हो, सीना चौड़ा करके घूमता हो और कहता फिरता हो हां मैं इलाहाबादी हूं. पहले भी यही कहता था और आज भी यही कहता है, भले ही अब उसका नाम प्रयागराज हो गया हो. उस बंदे का क्या जिसने अपनी मेल का पता किसी शहर किसी निशानी से जोड़ रखा हो. भावनाओं पर काबू रखें, क्योंकि अब ये बहने लगी हैं.

स्‍व. अटलजी की लाइन अचानक ही याद आ गई. सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए. देश के लोग रहने चाहिए. जो हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबका है. किसी को नीचा दिखाने से कुछ हासिल नहीं होगा. परहेज करना है तो बस सरकारों के आने जाने से होने वाली नाम बदलने की सियासत से. बेनाम को ही नाम दिया जाए…

बस आखिर में बशीर बद्र साहब की कलम से….

सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें.
आज इंसां को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत.

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