यूपी में पुलिस या विधायक पीट न दें, खुद को इन आसान टिप्स से बचाएं पत्रकार!

यूपी में पत्रकारों पर हमले जारी हैं. ये कुछ जरूरी उपाय हैं जिनकी मदद से पत्रकार खुद को बचा सकते हैं.
Journalists, यूपी में पुलिस या विधायक पीट न दें, खुद को इन आसान टिप्स से बचाएं पत्रकार!

उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के लिए परीक्षा का समय है. परीक्षा भी नहीं, अग्नि परीक्षा. ऊपर सूरत तप रहा है, नीचे पुलिस तप रही है. पिछले हफ्ते दिल्ली से एक पत्रकार को पुलिस दबोच ले गई क्योंकि उसने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर विवादित टिप्पणी की थी. पत्रकार के हाथ में पानी की बोतल जैसा खतरनाक विस्फोटक पदार्थ भी बरामद कर लिया.

सुप्रीम कोर्ट से जब तक उस पत्रकार की रिहाई होती, शामली में जीआरपी वालों ने एक पत्रकार को धुन दिया. उसके साथ जो अमानवीयता हुई उस पर अलग से क्राइम स्टोरीज लिखी गईं. जिनके ऊपर क्राइम रोकने की जिम्मेदारी है वही क्राइम कर रहे हैं. पत्रकार की गलती ये थी कि वो क्राइम की रिपोर्टिंग करने गया था और उसे क्राइम रोकने वालों ने कैमरा निकालते देख लिया.

ये खबर लिखी जा रही थी उसी वक्त एक और खबर आई कि एक चैनल के पत्रकार को बीजेपी विधायक ने तमाचा मारा और खबर चलाने पर गोली मार देने की धमकी दी. अब अगर मुख्यमंत्री पर टिप्पणी करने से पत्रकार अरेस्ट हो सकता है तो विधायक की खबर चलाकर गोली भी न खाए तो कितनी नाइंसाफी होगी. विधायक जी ने तो बस बताया है कि जैसे हमको हमारे लीडर से कमजोर न समझो.

यूपी में पत्रकारों के लिए आदर्श स्थिति है. अगर उन्हें बॉस से किसी काम को मना करना हो तो वो अपनी जुबान हिलाकर बस इतना कह दें ‘सर पुलिस उठा लेगी.’ पुलिस के उठाने और पीटने का खौफ पत्रकारों में घर कर गया है. शास्त्रों के अनुसार हमारे पहले पत्रकार नारद हैं और ये मार कुटाई देखकर नारद मुनि फिलहाल भारत का दौरा टाल रहे हैं.

Journalists, यूपी में पुलिस या विधायक पीट न दें, खुद को इन आसान टिप्स से बचाएं पत्रकार!

रात में 12 बजे तक बदले हुए नाम से फ्रीलांस लेखन करने वाले और सुबह 11 बजे उठने वाले पत्रकार भी आजकल सवेरे 6 बजे उठ जा रहे हैं ताकि पुलिस उठाने न आ जाए. अब सवेरे पत्रकार जब गले में प्रेस का बिल्ला लटकाकर निकलता है तो मां उसको रक्त तिलक लगाकर भेजती है और वापसी की शुभकामनाएं देती है.

अगर पत्रकार ऐसी ही बुरी परिस्थितियों में अपने काम पर डटे रहे तो जेपी दत्ता को अगली देशभक्ति फिल्म इन्हीं पर बनानी पड़ जाएगी. दो कौड़ी के ट्रोल भी ‘वहां सीमा पर जवान..’ की जगह ‘वहां पटरी पर पत्रकार कूटा जा रहा है तुम देश के लिए इतना भी नहीं कर सकते?’ कहा करेंगे. फ्री से लेकर 25-30 हजार रुपए कमाने वाला पत्रकार अपने पेशे को खून पसीना दे रहा है, बदले में पुलिस के लात घूंसे पा रहा है. इससे अच्छा नकद व्यवहार कहां हो सकता है.

बहरहाल स्थिति पहले से इतनी भयावह है, हम इस आग में घी नहीं डालना चाहते हैं. जब प्रधानमंत्री तक पत्रकारों की बजाय एक्टरों को इंटरव्यू दे रहे हैं तो पत्रकारों की जरूरत कहां रह जाती है. फिर भी पत्रकार इतनी जल्दी गायब तो हो नहीं सकते क्योंकि सीएम साब के पास बजाने के लिए थानोस वाली चुटकी नहीं है. फिर भी पत्रकारों को बचकर रहना है. उसके कुछ जरूरी टिप्स यहां दिए जा रहे हैं, ध्यान देंगे तो सुरक्षित रहेंगे:

1. गाड़ी पर PRESS न लिखवाएं. गले में मीडिया का पट्टा न डालें. ये आप अपनी पहचान के लिए लगाएंगे और पुलिस ने देख लिया तो गजब हो जाएगा.

2. बल्कि इन सब चीजों की बजाय गाड़ी पर बीजेपी का झंडा लगा लें. कमल के फूल वाला. कोई हाथ नहीं लगाएगा.

3. कहीं भी ‘स्टोरी’ दिखे तो कैमरा और फोन निकालकर शूट करने में न जुट जाएं. पहले आस पास अच्छे से देख लें कि कोई पुलिस वाला तो नहीं खड़ा है. पुलिस सादी वर्दी में भी हो सकती है इसलिए डबल चेक करें.

4. नेताओं, विधायकों, पुलिस वालों, बड़ी पहुंच वालों से भरसक दूर रहें.

5. अगले कुछ दिन शांत रहें और अपने अंदर के पत्रकार को किसी और काम में लगाएं. सूखे, पानी, एक्सीडेंट, करप्शन वगैरह से ध्यान हटाकर तैमूर की डायट पर लगाएं. सैफ अली खान ज्यादा से ज्यादा गाली दे देंगे लेकिन लात घूंसे नहीं चलाएंगे.

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