व्यंग्य: भारतीय पाकशास्त्र की राजनीति में घुसपैठ, जानिए जलेबी की महिमा

दरियागंज के सांसद ने इंदौर जाकर जलेबी खाई तो पूरे ट्विटर के पेट में मरोड़ उठने लगे.
Satire: Gautam Gambhir gives a new idea to connect politics with Jalebi, व्यंग्य: भारतीय पाकशास्त्र की राजनीति में घुसपैठ, जानिए जलेबी की महिमा

भारतीय राजनीति में कब क्या प्रासंगिक हो जाए, कोई नहीं कह सकता. मूर्ति, मंदिर, इतिहास, किताब, नारे, ट्रोलिंग से होते हुई बात कब जलेबी तक पहुंच गई, पता ही नहीं चला. राजनीति का स्वरूप जैसा है उस हिसाब से जलेबी पहले नंबर पर आनी चाहिए थी लेकिन न जाने क्यों इसका नंबर इतना लेट लगा.

फिल्म 3 इडियट्स में एक डायलॉग था- दोस्त फेल हो जाए तो दुख होता है, दोस्त फर्स्ट आ जाए तो ज्यादा दुख होता है. ऐसा सिर्फ दोस्तों के साथ नहीं है. यहां मौजूद हर इंसान में जलन इतनी ज्यादा भरी है कि किसी को खाते पीते नहीं देख सकता. अब देखिए दिल्ली से एक सांसद इंदौर में पोहा-जलेबी खाते हुए मिल गया तो पूरे देश के पेट में दर्द होने लगा. ट्विटर पर तो इतनी तेज सैलाब आया जैसे वो ‘बी’ से खतम होने वाली जलेबी नहीं, ‘बी’ से शुरू होने वाली कोई चीज खा रहे हों.

ऐसे नाजुक मौकों पर हमें खाने वालों के साथ खड़े होना चाहिए. जरा सोचकर देखिए, आपके सामने दो चॉइस रखी जाए. एक तरफ पॉल्यूशन पर थकाऊ-पकाऊ मीटिंग, दूसरी तरफ इंदौर की मशहूर जलेबी, तब आप क्या चुनेंगे. जो आप चुनेंगे वही सांसद ने चुना. अगर यहां कोई नैतिकता का मारा मीटिंग वाला ऑप्शन चुनता है तो उससे कहना चाहूंगा कि भगवान से डरो. खाने के नाम पर झूठ बोलना अच्छी बात नहीं है.

Satire: Gautam Gambhir gives a new idea to connect politics with Jalebi, व्यंग्य: भारतीय पाकशास्त्र की राजनीति में घुसपैठ, जानिए जलेबी की महिमा

जलेबी का नाश्ता इतना गंभीर हो गया कि सांसद को स्टेटमेंट जारी करना पड़ा, अफसोस कि वह स्टेटमेंट जलेबी से भी ज्यादा घुमावदार था. आप इसे उनके क्रिकेट करियर में संजोई कलाकारी कह सकते हैं लेकिन ये असल में जलेबी का पुण्य प्रताप है. वहीं से इतने घुमावदार आइडिया आ सकते हैं.

इंदौर में खाने वालों का टेस्ट दुनिया से अलग है, वे पानी में भी भुजिया मिलाकर खा सकते हैं. लेकिन ये पहली बार हो रहा है कि इंदौर जाकर कोई राजनीति में जलेबी मिलाकर खा जाए. इतना ज्यादा डेवेलप किस्म का टेस्ट धरती के किसी कोने में नहीं मिलेगा. अब पता चला कि ईस्ट इंडिया कंपनी को यहां से न मसाला चाहिए था न सोना चांदी, वो बस इस टेस्ट को उठाकर अपने वतन ले जाना चाहते थे.

जलेबी और पॉलिटिक्स का कॉम्बो परफेक्ट है. जलेबी नेताओं के बयानों की तरह घुमावदार होती है, दोनों में बड़ा स्वाद होता है. अंतर बस इतना है कि जलेबी से किसी इंसान का भला हो सकता है, नेता के बयान से किसी का नहीं. इनफैक्ट कई बार तो बयान से अपनी ही पार्टी का नुकसान हो जाता है.

जलेबी की महिमा अपरंपार है, नए भारत में जलेबी ने जैसा रूप दिखाया है कि अब चाय पर चर्चा छोड़कर लोग जलेबी पर चर्चा किया करेंगे. चुनावों के समय राजनैतिक रिपोर्टिंग के लिए चैनलों के फेवरेट अड्डे जलेबी की दुकानें हुआ करेंगी. एंकर ‘जीहां- जीहां’ करके बताएगा कि पिछली लोकसभा के गठन में इस जलेबी की दुकान का कितना योगदान है.

 

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