नई राजनीति के तीन संदेश देती स्मृति ईरानी की एक तस्वीर

अमेठी में अपनी जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सुरेंद्र सिंह की अर्थी को कंधा देकर स्मृति ईरानी ने नए पैमाने सेट किए.

सोशल मीडिया पर एक तस्वीर तैर रही है. तस्वीर में स्मृति ईरानी हैं, उनके कंधे पर एक अर्थी है. अर्थी अमेठी में जामो गांव के पूर्व प्रधान सुरेंद्र सिंह की है. सुरेंद्र सिंह के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने स्मृति ईरानी की जीत के लिए जान लड़ा दी. अपने घर पर उस जीत का जश्न मनाया. जश्न के बाद बाइक से आए बदमाशों ने उन पर गोलीबारी की जिसमें उनकी जान चली गई. स्मृति ईरानी ने दिल्ली में रहकर सुरेंद्र को श्रद्धांजलि नहीं ट्वीट की, खुद अर्थी देने अमेठी गईं. इस तस्वीर में स्मृति ने तीन उदाहरण सेट किए हैं.

औरत होकर अर्थी को कंधा? राम राम राम

भारतीय समाज में अर्थी को कंधा देती महिला अब भी अचरज का विषय है. पिछले पांच दस साल में उंगलियों पर गिनने वाले उदाहरण मिलेंगे. जिन महिलाओं ने ऐसा किया वो कुछ भी रही हों, देश की सबसे बड़ी पार्टी की वो नेत्री नहीं थीं जिसने हाल ही में खुद को साबित किया है. उनकी तरफ आश्चर्य से देखा जाता था, स्मृति ईरानी की तरफ उम्मीद से देखा गया. ऐसा लगा कि एक टैबू धराशायी हो गया है. स्मृति ने अपने कंधों पर सिर्फ सुरेंद्र सिंह की नहीं, एक वर्जना की अर्थी भी उठा रखी थी.

हार में या जीत में

स्मृति ईरानी की ये तस्वीर दिखाती है कि उनका यही अंदाज उन्हें जीत की दहलीज तक लाया है. ये अंदाज जीतने के बाद नहीं बना. 2014 हारने के बाद भी वो अमेठी में उतना ही बनी रहीं जितना राहुल गांधी जीतने के बाद. अधिकतर उम्मीदवारों की ये हालत होती है कि वो जीत-हार जाने के बाद अपने संसदीय क्षेत्र में मुंह नहीं दिखाते. मथुरा की जनता ने भले हेमा मालिनी को जिता दिया लेकिन ये शिकायत हमेशा बनी रही. स्मृति ईरानी ने जैसे मन में गांठ बांध ली थी कि अब अमेठी में ही रहना है. लोगों से वो जुड़ना हार के बाद शुरू हुआ और जीतने के बाद लगातार जारी है. ये तस्वीर उसी की बानगी भर है. राहुल गांधी ने जो खाली जगह वहां पैदा की थी, वो स्मृति ईरानी भर रही हैं.

मानवीय प्रतीकों की राजनीति

Smriti Irani, नई राजनीति के तीन संदेश देती स्मृति ईरानी की एक तस्वीर

कहते हैं इंसान के सुख में शामिल होने को सब आ जाते हैं, जो हाथ दुख में बढ़े होते हैं वो हमेशा याद रहते हैं. ये बात हमारे पुराने राजनीतिज्ञ खूब समझते थे. अगस्त 1977 की एक रात याद की जाए. जब बिहार के एक छोटे से गांव बेलछी में 11 लोगों की नृशंस हत्या हो गई थी. केंद्र में कांग्रेस की बुरी तरह हार और मोरार जी देसाई को प्रधानमंत्री बने कुछ ही समय हुआ था. घर पर बैठी इंदिरा गांधी तुरंत फ्लाइट पकड़कर पटना और वहां से कार पर बैठकर बिहार शरीफ गईं. वहां शाम हो गई और बाढ़ की स्थिति थी. हर तरफ पानी भरा हुआ था. लोगों ने इंदिरा को वहां रोका लेकिन वो पहले जीप पर, फिर ट्रैक्टर पर और उसके भी कीचड़ में फंस जाने पर हाथी पर बैठकर बेलछी पहुंची. उस तस्वीर ने कांग्रेस का भविष्य बदल दिया था. वैसे ही स्मृति ईरानी की ये ऐतिहासिक तस्वीर भविष्य बदलती हुई दिख रही है.

ये तस्वीर अभी अमेठी के जनमानस पर चढ़ गई है. अगर अगले पांच साल इसका असर रहा तो राहुल गांधी के लिए वायनाड ही ठीक रहेगा.

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