Lockdown: ठहरी हुई 1000 बसों पर सरपट दौड़ी सियासत

मजदूर पहले भी पैदल चल रहा था, अब भी चल रहा है. वैसे मजदूर और गरीब तो जीवन भर ‘चलने’ और ‘चलाए जाने’ के लिए ही होता है. कभी इस मालिक के इशारे पर, कभी उस मालिक के इशारे पर. तो कभी देश-प्रदेश के मालिकों के इशारे पर.
Politics on buses of migrant labourers, Lockdown: ठहरी हुई 1000 बसों पर सरपट दौड़ी सियासत

1000 बसें सड़कों पर तो नहीं दौड़ीं, लेकिन राजनीति के एक्सप्रेस-वे पर खूब चलीं. बसें राजस्थान-यूपी बॉर्डर पर ठहरी रहीं, दिल्ली-यूपी सीमा पर भी शांत खड़ी रहीं, लेकिन इन बसों ने यूपी की राजनीति को अशांत कर दिया. ‘कांग्रेसी बसें’ खबरिया चैनल्स की सुर्खियों में दौड़ीं.

छोटी-छोटी खिड़कियों से अपनी बात कहने को लपलपाते नेताओं और विश्लेषकों की बिना किसी निष्कर्ष वाली चर्चाओं में दौड़ी. आखिरकार बसें सड़कों पर चलीं तो नहीं, अलबत्ता जहां से आईं थीं वापस वहीं चली जरूर गईं. मजदूर पहले भी पैदल चल रहा था, अब भी चल रहा है. वैसे मजदूर और गरीब तो जीवन भर ‘चलने’ और ‘चलाए जाने’ के लिए ही होता है. कभी इस मालिक के इशारे पर, कभी उस मालिक के इशारे पर. तो कभी देश-प्रदेश के मालिकों के इशारे पर.

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बसों की वापसी के बाद हिसाब का वक्त

अब कांग्रेसी बसें लौट चुकी हैं और हिसाब लगाने की बारी है. कांग्रेस और बीजेपी हिसाब लगाएगी कि कितना नफा और नुकसान हुआ? समाजवादी और बसपाई भी हिसाब लगाएंगे कि यूपी में बीजेपी और कांग्रेस के खेल में उन्होंने क्या पाया और क्या खोया? बस हिसाब वो मजदूर नहीं लगाएंगे, सवाल वो मजदूर नहीं पूछेंगे, जो सैकड़ों-हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा पर हैं. उनसे उनकी गरीबी पहले ही कई सवाल पूछ रही है. सच यही है कि बसों के इस खेल में गलती कांग्रेस और प्रियंका गांधी ने भी की है और उत्तर प्रदेश सरकार ने भी.

कांग्रेस के ऑफर में कितनी सेवा कितनी सियासत?

कांग्रेस को पता है कि अपने घरों तक पहुंचने के लिए परेशान मजदूर हर राज्य में हैं. कांग्रेस शासित राज्यों में भी. लोकसभा में 52 सीटों वाली राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को पता होना चाहिए कि उसकी जिम्मेदारी यूपी से बाहर भी कई जगहों में बनती है. प्रियंका गांधी योगी के नाम मार्मिक ट्वीट करती हैं कि- “आप चाहें तो बसों पर भाजपा के बैनर लगा दीजिए, बेशक अपने पोस्टर लगा दीजिए, लेकिन हमारे सेवा भाव को मत ठुकराइए. देशवासी सड़कों पर चलते हुए दम तोड़ रहे हैं.”

महामारी के इस आपातकाल में यूपी की सरकार को 1000 बसों के ऑफर में सेवा का भाव जितनी मात्रा में भी हो, शायद ही कोई मानेगा कि इसमें सियासी लाभ की कामना नहीं रही होगी. वैसे कांग्रेस चाहे, तो ये कह सकती है कि एक राजनीतिक पार्टी अपने कामों से राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश क्यों न करे?

योगी की हां गैर जरूरी…ना भी गैर वाजिब

प्रियंका गांधी ने यूपी के प्रवासी मजदूरों के लिए 1000 बसों का ऑफर दिया. यूपी सरकार इस पेशकश को ये कहकर चुपचाप हल्के में निकल जाने दे सकती थी कि राज्य के पास रोडवेज बसों और परिवहन के साधनों की किल्लत नहीं है. क्योंकि समाधान सिर्फ मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचा कर छोड़ देने में नहीं है. गांवों-कस्‍बों में उनके लिए क्वारंटीन समेत दूसरे जरूरी इंतजाम भी करने हैं.

योगी सरकार उल्टे प्रियंका से सवाल पूछ सकती थी कि क्या सरकार अपनी इस जिम्मेदारी को भुला दे? क्या ये सारे काम मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचा देने से ज्यादा बड़े नहीं हैं? मजदूरों को जैसे-तैसे उनके घरों तक पहुंचाकर छोड़ देने से संक्रमण फैलने का जो खतरा बनेगा, उसकी जिम्मेदारी क्या कांग्रेस लेगी? टीम योगी ये भी पूछ सकती थी कि इन दो महीनों में केंद्र और यूपी सरकार ने कोरोना से निपटने के लिए जितने काम किए क्या वो मामूली हैं?

लेकिन प्रियंका की 1000 बसों की अनुमति देते ही योगी सरकार ने एक तरह से मान लिया कि मजदूरों को घर पहुंचाना ही आखिरी लक्ष्य है. उनके लिए उनके गांवों में जरूरी इंतजाम उतना मायने नहीं रखता. इसके बाद बसों को यूपी की सीमा से वापस लौटाने का फैसला गैर वाजिब रहा. कुछ बसों की जगह बाइक या ऑटो का नंबर होना बहाना नहीं हो सकता. यूपी रोडवेज के कर्ताधर्ता राजस्थान रोडवेज की तमाम बसों की फिटनेस को खारिज करते हुए कबाड़ कह दें, ये भी हजम होने वाली बात नहीं लगती.

राजस्थान सरकार की ‘यस बॉस’ वाली गलती

पूरे देश की जिम्मेदारी देखने के लिए केंद्र की सरकार है. राज्यों की सरकारें पहले अपने-अपने राज्यों की जरूरतें पूरी करें इसी में सबका भला है. लेकिन राजस्थान सरकार क्या कर रही थी? प्रियंका (आलाकमान कह सकते हैं) के एक आदेश पर सैकड़ों बसें यूपी को सौंपने के लिए तैयार हो गई. क्या राजस्थान की सीमा के अंदर वहां के मजदूर अपनी इच्छित जगहों पर पहुंचा दिए गए हैं? क्या इन बसों पर राजस्थान में फंसे मजदूर का हक पहले नहीं बनता था?

मजदूर भी चलते रहेंगे…और उनके नाम पर राजनीति भी

बसें लौट चुकी हैं. लेकिन राजनीति के दस्तावेजों में ये पूरा एपिसोड दर्ज हो चुका है. दोनों तरफ के सियासी योद्धा आधी-आधी रात तक जागते रहे. सोमवार की रात करीब बारह बजे यूपी सरकार ने प्रियंका से बसों का हिसाब मांगा. प्रियंका की तरफ से रात 2 बजकर 10 मिनट पर जवाब दिया गया. चिंता अपनी-अपनी राजनीति की थी, शायद तभी रतजगे हो रहे थे. मजदूरों के साथ आधी रात को हाईवे और एक्सप्रेस-वे पर कहां कोई नेता पैदल चल रहा होता है!

अलबत्ता हर रोज सुबह देश के किसी-न-किसी हिस्से से रात के अंधेरे पर मजदूरों के साथ हादसों की खबरें जरूर आती हैं. ये नतीजा है मजदूरों के लिए कुछ कहने और करने के बीच फर्क का. लेकिन सिर्फ सत्ता पक्ष को कोसना ही समाधान नहीं है. तभी तो कुर्सियों की अदला-बदली के बाद भी हालात कहां बदलते हैं?

ये वक्त गुमान पालने और आन पर लेने का नहीं था. लेकिन ऐसा होता रहा. हजार बसों की लिस्ट पूरी करने की हड़बड़ी में कांग्रेस ने गड़बड़ी कर दी. मानकर आगे बढ़ सकते थे कि गलती हो गई. मगर नहीं. राजस्थान के परिवहन मंत्री ने अपने तर्कों से कायल ही कर दिया. दलील देने लगे कि क्या फर्क पड़ता है अगर मजदूरों को कार्यकर्ताओं की बाइक से ही उनकी मंजिल पर पहुंचा दें? कमाल है. मंत्री जी कम से कम इतना तो सोच ही सकते थे कि फिलहाल बाइक पर दूसरी सवारी को बिठाने की मनाही है!

ध्यान रहे…देश को पक्ष-विपक्ष से बहुत उम्मीदें हैं

प्रियंका कहती हैं कि वह मजदूरों की सेवा करना चाहती थीं. उन्हें रोका गया. योगी आदित्यनाथ की सरकार कहती है ये प्रियंका की सेवा नहीं सियासत थी. आम दिन होता, तो हम देशवासी कह सकते थे कि- सब सियासत है. लेकिन इस मौके पर हम ऐसा नहीं कहेंगे. संकट का ये वक्त इतना गहरा है कि हमें ऐसे नाजुक मौके पर पक्ष और विपक्ष दोनों से काफी उम्मीदें हैं. जो कुछ 1000 बसों के नाम पर हुआ, उसे एक सियासी भूल मानकर फिर से दोनों पक्षों से जुटकर काम करने की उम्मीद देश को है.

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