‘भारत में लिव-इन रिश्‍ते का मतलब शादी’, राजस्थान हाई कोर्ट ने आदेश में कहा

अदालत ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप को भारतीय समाज शादी के अलावा किसी और रूप में स्‍वीकार नहीं करता.

नई दिल्‍ली:राजस्‍थान हाई कोर्ट ने टिप्‍पणी की है कि “भारतीय समाज में लिव-इन रिश्‍ते को विवाह के बराबर देखा जाता है.” अदालत ने एक महिला द्वारा अपने लिव-इन पार्टनर को किसी और से शादी के लिए रोकने की याचिका पर फैसला सुनाते हुए यह बात कही. कोर्ट ने बलराम जाखड़ नाम के व्‍यक्ति के 7 मई को शादी करने पर रोक लगा दी. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, फैसला सुनाते समय जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने कहा, “भारत समाज में लिव-इन रिलेशनशिप शादी के बराबर है और समाज उसे केवल इसी रूप में स्‍वीकार करता है. ऐसे में बलराम को दूसरी शादी नहीं करने दी जा सकती क्‍योंकि इससे याचिकाकर्ता का भविष्‍य बर्बाद हो जाएगा.

अदालत ने बलराम और उसकी होने वाली दुल्‍हन को नोटिस जारी किए हैं. इसके अलावा प्रमुख सचिव (गृह) और झुंझुनू जिला कलेक्‍टर को भी नोटिस मिला है. बलराम को किसी और से शादी न करने के निर्देश दिए गए हैं.

क्‍या था मामला?

एक तलाकशुदा महिला ने अदालत में याचिका लगाई थी. याचिका में महिला ने दावा किया था कि बलराम ने गलत तरीके से बलपूर्वक उसके साथ संबंध बनाए. शादी का विश्‍वास दिलाकर साथ रहा. महिला का कहना है कि बलराम के आश्‍वासन के बाद उसने अपने पति को छोड़ दिया. याचिकाकर्ता के वकील के मुताबिक, बलराम ने जबरन महिला संग यौन संबंध बनाए. इस बारे में 6 फरवरी, 2018 को सदर पुलिस थाने में एक एफआईआर दर्ज कराई गई थी. आरोपी के बार-बार आश्‍वासन देने पर महिला ने ACJM कोर्ट में बयान दिया कि वह केस को आगे नहीं बढ़ाना चाहती.

दोनों की मुलाकात 2014 में हुई थी जब झुंझुनू के एक निजी स्‍कूल में दोनों साथ पढ़ाते थे. याचिकाकर्ता के वकील के अनुसार, जब आरोपी का इनकम टैक्‍स कमिश्‍नर के पद पर चयन हो गया तो वह अपने वादे से मुकर गया. वह 7 मई को शादी करने जा रहा था. तब याचिकाकर्ता ने गुहार लगाई कि बलराम को दूसरी शादी करने से रोका जाए.

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