Rajasthan राजनीतिक संकट: जानें कब से पायलट के दिल में पल रही थी बगावत! इस वज़ह से आई बाहर

दिक्कत शुरू हुई दिसंबर 2018 विधानसभा चुनावों के बाद जहां पर कांग्रेस नेतृत्व के सामने यह समस्या खड़ी हुई कि वह युवा सचिन (Sachin Pilot) पर दांव लगाए या अनुभवी अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) को प्रदेश की कमान सौंपें. सीटों के बंटवारे से लेकर कैंपेन तक दोनों के बीच में मतभेद उभर कर सामने आई.
reason behind rift between Ashok Gehlot and Pilot, Rajasthan राजनीतिक संकट: जानें कब से पायलट के दिल में पल रही थी बगावत! इस वज़ह से आई बाहर

राजस्थान में चल रहा घटनाक्रम (Rajasthan Political Crisis) ना केवल सरकार बचाने की कवायद है, बल्कि कांग्रेस पार्टी के अंदर चुपचाप चल रहे बदलाव को भी दर्शाता है. पायलट और अशोक गहलोत का झगड़ा जग जाहिर है. दरअसल जनवरी 2014 में 36 साल के सचिन पायलट को कांग्रेस (Congress) लीडरशिप ने राजस्थान कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया, उस समय सचिन पायलट (Sachin Pilot) कॉर्पोरेट अफेयर्स मंत्री थे. राजस्थान में कांग्रेस को करारी शिकायत मिली थी और 36 साल के सचिन पायलट (Sachin Pilot) को प्रदेश की कमान सौंप दी गई.

सचिन पायलट ने राजस्थान (Rajasthan) में कमान संभालने के बाद तेज तर्रार तरीके से प्रदेश का मोर्चा संभाला और जमीनी स्तर पर काम करना शुरू किया. अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) को कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली बुला लिया और उन्हें ऑर्गेनाइजेशन के महासचिव की कुर्सी थमा दी. सचिन प्रदेश में वसुंधरा सरकार के खिलाफ मोर्चा संभाल के लड़ते रहे वहीं दूसरी ओर अशोक गहलोत दिल्ली में बैठकर संगठन की रणनीतियां बनाते रहे.

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यहां से शुरू हुई दिक्कत

दिक्कत शुरू हुई दिसंबर 2018 विधानसभा चुनावों के बाद जहां पर कांग्रेस नेतृत्व के सामने यह समस्या खड़ी हुई कि वह युवा सचिन पर दांव लगाए या अनुभवी अशोक गहलोत को प्रदेश की कमान सौंपें. सीटों के बंटवारे से लेकर कैंपेन तक दोनों के बीच में मतभेद उभर कर सामने आई. तीन बार सचिन पायलट ने गहलोत की कुर्सी हिलाने की कोशिश की, लेकिन तीनों बार भारतीय राजनीति में जादूगर के रूप में पहचाने जाने वाले अशोक गहलोत मजबूती से प्रदेश की कमान संभाले बैठे रहे.

सरकारी नियुक्तियों से लेकर पीडब्ल्यूडी मंत्रालय में पॉलिटिकल अप्वाइंटमेंट्स और संगठन में भी बदलाव को लेकर गहलोत और पायलट के बीच तकरार उभरकर 2018 से 2020 तक खुलकर सामने आई. दरअसल सचिन का कहना था कि उनसे पार्टी आलाकमान ने वादा किया था कि 2019 के चुनाव के बाद उनको मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा.

ज्यादातर विधायकों ने गहलोत को पसंद किया

दूसरी ओर जानकारों का कहना है कि राजस्थान में ज्यादातर विधायकों ने अशोक गहलोत के नाम पर मोहर लगाई जिसके चलते सचिन को मुख्यमंत्री बनाने में दिक्कत सामने आ रही थी. बात इतनी बड़ी की गहलोत ने साफ कर दिया कि प्रदेश में एक नया प्रदेश अध्यक्ष होना चाहिए, जिससे सचिन काफी नाराज हो गए. पायलट की नाराजगी के लिए आखिरी नेल ऑफ कॉफिन रहा अशोक गहलोत सरकार का वो फैसला जिसमें उन्होंने एक FIR दर्ज करवाई जिसमें विधायकों की खरीद-फरोख्त को लेकर सचिन पायलट को राजस्थान पुलिस ने नोटिस भेजा.

दरअसल नोटिस तो अशोक गहलोत के अलावा 15 अन्य लोगों को भी आया था, लेकिन सचिन पायलट को यह बात काफी चुभ गई और उन्होंने जयपुर से दिल्ली का रुख कर लिया. सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच में तनातनी जगजाहिर है दोनों कई मौकों पर एक दूसरे के ऊपर टिप्पणी करते हुए सुनाई और दिखाई दे चुके हैं. कोटा में जब 107 बच्चों की मृत्यु हुई थी तब सरकारी अस्पताल में सचिन पायलट ने अपनी ही सरकार के कामकाज के ऊपर सवालिया निशान उठा दिया था.

दोनों की तनातनी के पीछे एक पहलू ये भी

सचिन पायलट और अशोक गहलोत की तनातनी के पीछे एक और पहलू है. दरअसल राजस्थान की राजनीतिक सिचुएशन, कर्नाटक और मध्य प्रदेश से काफी अलग है. कर्नाटक में कांग्रेस की गठबंधन सरकार थी और मध्य प्रदेश में सरकार के पास बॉर्डर लाइन नंबर थे. कांग्रेस पार्टी के सूत्रों के मुताबिक अशोक गहलोत एक पॉपुलर नेता है, उनका जनाधार है.

सचिन पायलट ने भी काफी मेहनत की है. उनकी लोकप्रियता युवाओं के बीच में काफी है, लेकिन सचिन की यह पॉपुलर छवि वोटों में तब्दील ना हो सकी. दूसरा पहलू यह भी है कि जहां सचिन मीडिया मैनेजमेंट में ध्यान देते हैं वहां अशोक गहलोत इतना मीडिया मैनेजमेंट में ध्यान नहीं देते हैं. यह भी जगजाहिर है की अशोक गहलोत के बीजेपी के कुछ नेताओं के साथ काफी अच्छे रिश्ते हैं. इस मुश्किल समय में कांग्रेस को गहलोत जैसे जादूगर की राजस्थान में बहुत जरूरत है.

गहलोत जानते थे पायलट चुनौती देंगे

गहलोत पहले ही जानते थे कि सचिन पायलट उनको कड़ी चुनौती देंगे , इसलिए उन्होंने पहले से ही अपना किला मजबूत करना शुरू कर दिया था. वही राजस्थान में कांग्रेस के पास ज्यादा विधायक हैं. साथ ही अशोक गहलोत ने अपने कई सारे समर्थकों को इंडिपेंडेंट लड़ाया और वह जीत कर भी आए थे. उन इंडिपेंडेंट विधायकों का भी समर्थन अशोक गहलोत के पास है. इसी के चलते अशोक गहलोत के साथ-साथ कांग्रेस के नेतृत्व ने भी कहीं ना कहीं संगठन में एक संदेश देने की कोशिश की कि अब पार्टी में आर्म ट्विस्टिंग टैक्टिक नहीं चलेगी.

कांग्रेस पार्टी के कई नेता, सचिन पायलट को मनाने में जुटे रहे. कई फोन किए गए ताकि उनसे बात की जा सके और पता चल सके कि उन्हें आखिर किस बात की ज्यादा नाराजगी है और किस तरीके से इस सिचुएशन को सुलझाया जाए. लेकिन सूत्रों के मुताबिक पायलट ने कांग्रेस के आला अधिकारियों का फोन नहीं उठाया. उन्होंने एक मैसेज अपने ऑफिशियल व्हाट्सएप ग्रुप में डाला कि उनके पास 40 विधायक हैं और अशोक गहलोत की सरकार अल्पमत सरकार है. जानकारों के मुताबिक इसके बाद कहीं ना कहीं पार्टी लीडरशिप ने एक रेखा खींच दी कि अब सचिन को और नहीं मनाया जाएगा.

कांग्रेस बदलाव की तरफ बढ़ रही

इसके पीछे दो मुख्य वजह थी एक अशोक गहलोत का ये विश्वास की उनके साथ 109 विधायकों का लिखित समर्थन है. कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि अगर राजस्थान का खेल समझना है तो एक नजर उसके पड़ोसी राज्य, गुजरात पर डालनी होगी. यहां हाल ही में 26 साल के हार्दिक पटेल को पार्टी की कमान सौंपी गई है.

राजस्थान में भी प्रदेश अध्यक्ष बदलने की चर्चा शुरू हो गई थी इसके साथ-साथ नए अध्यक्ष के लिए कैंडिडेट ढूंढा जा रहा है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बताते हैं कि राहुल गांधी धीरे-धीरे संगठन के अंदर बदलाव कर रहे हैं. इसके मुताबिक 50 साल से कम उम्र के लोगों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी जा रही है.

जो परफॉर्म नहीं कर रहे उन्हें हटाने की तैयारी

पार्टी के अंदर एक राय यह भी है कि जिन युवा नेताओं को अवसर दिया गया और वह परफॉर्म नहीं कर पाए उनकी जगह अब अन्य नेताओं को मौका दिया जाना चाहिए. 2019 के चुनाव के बाद से राहुल गांधी ने जमीन से जुड़े हुए नेताओं और कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियां देना शुरू कर दिया है. पार्टी के अंदर बहुत सारे नेता हैं जिनको अपने भविष्य पर खतरा नजर आ रहा है.

हाल ही में हुए राज्यसभा चुनावों के अंदर भी राहुल गांधी ने एक युवा टीम को भेजा है, कांग्रेस के इतिहास में पहली बार ही हुआ है जब 40 साल से कम उम्र के लोगों को भी राज्यसभा का सदस्य बनाकर पार्टी ने संसद में भेजा है. जहां एक ओर पार्टी के अंदर एक तबके की यह राय है कि सचिन पायलट को ना केवल अध्यक्ष पद पार्टी ने दिया बल्कि डिप्टी सीएम भी बनाया और इसके साथ साथ पांच-पांच महत्वपूर्ण मंत्रालय भी दिए.

राजस्थान में चल रही नूरा कुश्ती के जरिए कहीं ना कहीं पार्टी का शीर्ष नेतृत्व एक संदेश नेताओं और काडर को देना चाहता है कि कांग्रेस अब बदलने वाली है. इसमें जहां एक और गहलोत जैसे सीनियर नेताओं की जरूरत है, वहीं युवाओं की भी जरूरत है और सब को एक साथ मिलकर चलना होगा और पार्टी को अपनी पर्सनल महत्वाकांक्षा से ऊपर रखना होगा.

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