मानवाधिकार आयोग ने की लिव-इन रिलेशनशिप के खिलाफ कानून बनाने की अनुशंसा

'किसी महिला का रखैल जीवन किसी भी दृष्टि से महिला का सम्मानपूर्वक जीवन नहीं कहा जा सकता है. रखैल अपने आप में ही अत्यंत गंभीर चरित्र हनन करने वाला और घृणित संबोधन है.'

नई दिल्ली: मौजूदा दौरा में लिव-इन रिलेशन शिप को सुप्रीम कोर्ट की मान्यता भले ही मिल गई हो लेकिन समाज में अभी भी इसे स्वीकार नहीं किया गया है. इसका विरोध करने वाले हमेशा यहा तर्क देते हैं कि रिलेशन टूटने के बाद लड़कियों को ज़्यादा परेशानी झेलनी पड़ती है. राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग ने बुधवार को राज्य सरकार से लिव-इन रिलेशनशिप की बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोकने के लिए और समाज में महिलाओं के सम्मानपूर्वक जीवन के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए कानून बनाने की अनुशंसा की है.

आयोग के अध्यक्ष न्यायाधीश प्रकाश टाटिया और न्यायाधीश महेश चंद्र शर्मा की एक खंडपीठ ने बुधवार को राज्य के मुख्य सचिव और गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को एक पत्र लिखकर राज्य सरकार से अनुशंसा की है कि इस मामले में कानून बनाएं.

आयोग ने केंद्र सरकार से भी कानून बनाने का आग्रह किया है. उल्लेखनीय है कि आयोग के समक्ष लिव-इन रिलेशनशिप के कुछ मामले सामने आने के बाद कुछ महीने पूर्व सभी हितधारकों से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही महिलाओं की सुरक्षा के संबंध में कानून बनाने के लिए सुझाव मांगे गए थे. सभी हितधारकों के सुझावों और उनकी कानूनी राय के बाद आयोग ने पाया कि हर व्यक्ति को सम्मान पूर्वक जीवन जीने का अधिकार है, जो कि भारतीय संविधान में मूल अधिकारों में शामिल है.

खंडपीठ ने अपनी अनुशंसा में कहा, ‘किसी महिला का रखैल जीवन किसी भी दृष्टि से महिला का सम्मानपूर्वक जीवन नहीं कहा जा सकता है. रखैल अपने आप में ही अत्यंत गंभीर चरित्र हनन करने वाला और घृणित संबोधन है.’

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिश्तों को अब न्यायालय की मान्यता देता है. इसे महिलाओं की सुरक्षा के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत कानून में जगह दी गई है.