Birth Day Special: उस भारतीय कप्तान की कहानी, जिसने इंग्लैंड में वसूला था असली लगान

आजादी के दो दशक बीतने के बाद भी भारत क्रिकेट में अपनी अलग पहचान नहीं बना पाया था, उसे अब भी बड़ी कामयाबी की तलाश थी. हर विदेशी दौरे पर भारत को हार ही नसीब होती थी. ऐसे में कुछ खिलाड़ियों को भारतीय टीम की पहचान बदलने का श्रेय जाता है. उन्हीं में से एक थे अजीत वाडेकर.
Ajit Wadekar, Birth Day Special: उस भारतीय कप्तान की कहानी, जिसने इंग्लैंड में वसूला था असली लगान

ये 24 अगस्त 1971 की बात है. आज़ादी के क़रीब 24 साल बाद की. भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड के दौरे पर थी. कप्तान हुआ करते थे अजीत वाडेकर. इस वक्त तक भारत को टेस्ट क्रिकेट खेलते क़रीब चालीस साल बीत चुके थे. लेकिन इस बीच उसे अंग्रेजों से आज़ादी मिल चुकी थी. अब भारत की अलग पहचान थी, लेकिन क्रिकेट के मैदान में भारतीय टीम अब भी बड़ी कामयाबी के लिए इंतज़ार ही कर रही थी.

विदेशी दौरों में उसे हार का सामना ही करना पड़ता था. कैरिबियन देशों में तो उनके तेज गेंदबाज़ों के सामने भारतीय बल्लेबाज़ी कई बार लाचार दिखाई देती थी. ऐसे में कुछ खिलाड़ियों को भारतीय टीम की इस पहचान को बदलने का श्रेय जाता है. अजीत वाडेकर उन्हीं में से एक हैं. 1 अप्रैल 1941 को मुंबई में ही जन्मे अजीत वाडेकर ने क़रीब 17 साल की उम्र में फ़र्स्ट क्लास करियर की शुरुआत की थी.

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इसके बाद 1966 में उनका अंतरराष्ट्रीय करियर शुरू हुआ. जिस दौरे का ज़िक्र हमने इस लेख की शुरुआत में किया तब तक वो टीम इंडिया की कमान संभाल चुके थे. बतौर कप्तान और खिलाड़ी अजीत वाडेकर के नाम तमाम उपलब्धियां हैं, लेकिन उनका नाम लेते ही सबसे पहले याद आती है ओवल टेस्ट मैच की वो ऐतिहासिक जीत.

कैसे हासिल की थी भारत ने ऐतिहासिक जीत

भारत के उस इंग्लैंड दौरे में पहले दोनों टेस्ट मैच ड्रॉ रहे थे. पहला टेस्ट मैच लॉर्ड्स में खेला गया था. जबकि दूसरा मैन्चेस्टर में. दोनों मैच का नतीजा नहीं निकला. इसके बाद तीसरा टेस्ट मैच 19 अगस्त से ओवल में था. इंग्लैंड ने पहले बल्लेबाज़ी की. पहली पारी में उन्होंने 355 रन बनाए. जवाब में भारतीय टीम 284 रन ही बना पाई. यानी 70 से ज़्यादा रनों की बढ़त इंग्लिश टीम को मिल गई.

Ajit Wadekar, Birth Day Special: उस भारतीय कप्तान की कहानी, जिसने इंग्लैंड में वसूला था असली लगान

इंग्लैंड को पता था कि चौथी पारी में भारत को बल्लेबाज़ी करनी है. चौथी पारी में बल्लेबाज़ी का दबाव क्या होता है, ये हर किसी को पता था. इंग्लैंड की टीम दूसरी पारी में बल्लेबाज़ी करने उतरी, लेकिन जल्दी ही ऐसा लगने लगा कि चौथी पारी का दबाव उसने तीसरी पारी में खुद पर ही ले लिया है. भारतीय स्पिनर भगवत चंद्रशेखर के सामने इंग्लिश बल्लेबाज़ घुटने टेकते गए और पूरी टीम सिर्फ़ 101 रन पर ही सिमट गई.

चंद्रशेखर ने अकेले 6 विकेट लिए. अब भारत के सामने 173 रनों का लक्ष्य था. लक्ष्य बड़ा नहीं था, लेकिन चौथी पारी का दबाव था. इसी दबाव में सुनील गावस्कर बिना खाता खोले पवेलियन लौट आए. इसके बाद ये लक्ष्य मुश्किल लगने लगा. वाडेकर ने कप्तानी ज़िम्मेदारी को समझते हुए क्रीज़ पर वक्त बिताया. आउट होने से पहले उन्होंने 45 रन बनाए. जो दूसरी पारी में भारत की तरफ़ से सर्वाधिक स्कोर था. आख़िरकार छोटी-छोटी साझेदारियों की बदौलत भारत ने 6 विकेट पर 174 रन बना लिए. भारत ने ओवल के मैदान में इतिहास रच दिया.

वाडेकर की कप्तानी में और भी हैं उपलब्धियां

अजीत वाडेकर की कप्तानी में भारत के खाते में और भी उपलब्धियां हैं. इसमें वेस्टइंडीज़ को उन्हीं के घर में हराने का कारनामा भी शामिल है. उस सीरीज़ में सुनील गावस्कर करिश्माई फ़ॉर्म में थे. वाडेकर ने 1974 तक देश के लिए टेस्ट क्रिकेट खेला. इसके बाद भी वो अलग-अलग तरह से क्रिकेट से जुड़े रहे.

वो टीम के मैनेजर रहे. कोच रहे. चीफ़ सेलेक्टर रहे. रिटायरमेंट के पहले उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से भी सम्मानित किया था. क़रीब दो साल पहले उनका निधन हुआ. अपने सहज स्वभाव और बेमिसाल कप्तानी के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा.

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