28 साल बाद इस तरह पूरा हुआ था विश्व चैंपियन बनने का करोड़ों भारतीयों का सपना

2011 में टीम की कमान करिश्माई क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी (MS Dhoni) के हाथ में थी, जो इससे पहले अपनी कप्तानी में टी-20 विश्व कप (T20 World Cup) का खिताब भारत को जीता चुके थे.
Indian won World Cup after 28 years, 28 साल बाद इस तरह पूरा हुआ था विश्व चैंपियन बनने का करोड़ों भारतीयों का सपना

2 अप्रैल, 2011 ये सिर्फ तारीख नहीं बल्कि भारतीय क्रिकेट में इतिहास दर्ज करने वाली तारीख है. 25 जून, 1983 को जब भारत ने लॉर्ड्स के एतिहासिक मैदान में पहली बार विश्व कप जीता था तब देश के हर घर में टीवी नहीं था. क्रिकेट का इतना क्रेज नहीं था. भारतीय टीम से इस चमत्कार की उम्मीद नहीं थी, लेकिन 2011 आते-आते पूरी कहानी बदल चुकी थी. क्रिकेट में अरबों रुपये का कारोबार था. क्रिकेट, करोड़ों चाहने वालों का प्यार था. कईयों के लिए तो धर्म भी.

छोटे-बड़े हर टूर्नामेंट टीवी पर टेलीकास्ट होने लगे थे और हर वर्ग के लोगों के पास घर बैठे टीवी देखने की सहूलियत थी. लिहाज़ा करोड़ों भारतीय क्रिकेट फैंस का दवाब साल दर साल बढ़ता जा रहा था कि उन्हें अपनी टीम को विश्व चैंपियन बनते देखना था. इसी दबाव के साथ भारतीय टीम मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में 2 अप्रैल को श्रीलंका के खिलाफ विश्व कप के फाइनल में उतरी थी.

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देश के हर कोने में बड़े-बड़े पोस्टर्स के जरिए टीम इंडिया को शुभकामनाए दी गई थीं, क्योंकि 2003 में भी भारतीय टीम फाइनल में पहुंचने के बाद ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ हार गई थी. 2007 का तो हाल ही खराब था, जब टीम इंडिया को पहले ही दौर में टूर्नामेंट से बाहर का रास्ता देखना पड़ा था. खैर, 2011 में टीम की कमान करिश्माई क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी के हाथ में थी, जो इससे पहले अपनी कप्तानी में टी-20 विश्व कप का खिताब भारत को जीता चुके थे.

तमाम उतार-चढ़ाव के बाद मिली थी भारत को जीत

फाइनल के दवाब को समझते हुए श्रीलंका ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया. जयवर्धने के शानदार शतक की बदौलत श्रीलंका ने 274 रन बनाए. दिलचस्प बात थी कि इस मैच में धोनी ने सात गेंदबाजों को इस्तेमाल किया. मकसद था कि श्रीलंका की टीम के रनों की रफ्तार पर काबू लगाया जाए. 275 रनों के लक्ष्य का पीछा करने जब भारतीय टीम उतरी तो उसे शुरुआती झटके लगे.

पहले ओवर की दूसरी ही गेंद पर सहवाग आउट हो गए. इसके बाद स्कोरबोर्ड पर 31 रन ही जुड़े थे जब सचिन तेंदुलकर भी पवेलियन लौट गए. 275 रनों का लक्ष्य अब काफी बड़ा दिखने लगा. विराट कोहली और गौतम गंभीर ने मोर्चा संभाला. इन दोनों बल्लेबाजों की सूझबूझ से भारत का स्कोर 100 रनों के पार पहुंचा, लेकिन तभी विराट आउट हो गए. यहां धोनी ने एक बड़ा दांव खेला, जिसे बाद में उनका मास्टरस्ट्रोक भी कहा गया.

उन्होंने पूरे टूर्नामेंट में शानदार फॉर्म में चल रहे युवराज सिंह की जगह खुद क्रीज पर आने का फैसला किया. धोनी आए और उन्होंने गंभीर के साथ मिलकर लक्ष्य की तरफ बढ़ना शुरू किया. गंभीर की निगाहें तो पहले से ही जमी हुई थीं. धोनी भी जल्द ही क्रीज पर सेट हो गए. इन दोनों की मेहनत रंग लाई. लक्ष्य करीब दिखने लगा. गंभीर की बदकिस्मती थी कि वो 97 रन पर आउट हो गए.

इसके बाद युवी क्रीज पर आए और उन्होंने धोनी के साथ जीत की पटकथा को फाइनल टच दिया. धोनी ने जोरदार छक्के के साथ 28 साल का इंतजार खत्म किया. पूरा हिंदुस्तान जश्न में डूब गया, जिसमें नेता, अभिनेता हर खासो-आम शामिल था.

ये विश्व कप सचिन तेंदुलकर के लिए था

2011 विश्व कप की सबसे बड़ी खास बात थी- सचिन तेंदुलकर. सचिन का ये छठा विश्व कप था. 1989 से लेकर अब तक उन्होंने अपने करियर में हर मुकाम हासिल कर लिया था. क्रिकेट की रिकॉर्ड बुक पर उनका कब्जा था, लेकिन विश्व चैंपियन बनने का उनका सपना अधूरा था. यही वजह है कि 2011 में किसी भी खिलाड़ी से विश्व कप को लेकर बात कीजिए तो वो यही कहता था कि उसे सचिन के लिए विश्व कप जीतना है.

आखिरकार जब भारत चैंपियन बना तो सचिन खिलाड़ियों के कंधे पर थे. तिरंगा हाथ में था. टीम के खिलाड़ियों ने सचिन को दिया ये भरोसा पूरा किया था कि जिन कंधों पर वो कई साल तक करोड़ों क्रिकेट फैंस की अपेक्षाओं का बोझ उठाते आए हैं वो कंधे अब मजबूत हो गए हैं.

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