IND vs AUS : बेंगलुरू में बादशाहत का ‘विराट’ अहसास!

टीम इंडिया, ऑस्ट्रेलिया जैसी टीम को 2-1 से कूटकर सीरीज जीत चुकी है. सवाल उठाने वालों की पलटियों पर नजर रखिए. साथ ही, एंजॉय कीजिए सामने दिख रही बादशाहत के उस अहसास को, जो बेहद सुखद है.
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तीन मैचों की सीरीज का पहला ही मुकाबला हम 10 विकेट से हार गए. शर्मनाक हार. करारी हार. चारों खाने चित. ऑस्ट्रेलिया ने धो डाला. बगैरह-बगैरह. विशेषणों की लंबी फेहरिस्त. मेन स्ट्रीम मीडिया के सौजन्य से. बाकी रही-सही पूरी कसर सोशल मीडिया पर. धुलाई ऐसी कि सामने वाला पानी भी न मांगे. एक तरफ कोहली और उनकी टीम. दूसरी तरफ उनकी क्षमता पर उठ रही करोड़ों ऊंगलियां. अब अपनी यही टीम ऑस्ट्रेलिया जैसी टीम को 2-1 से कूटकर सीरीज जीत चुकी है. सवाल उठाने वालों की पलटियों पर नजर रखिए. साथ ही, एंजॉय कीजिए सामने दिख रही बादशाहत के उस अहसास को, जो बेहद सुखद है.

काबिलियत पर भरोसा हो तो अपमान और आलोचनाएं पानी भरती हैं

कोहली और उनके साथियों के पास ये विकल्प भी नहीं था कि वह अनर्गल प्रलाप करने वाले ‘स्वयंभू क्रिकेट एक्सपर्ट्स’ को उन्हीं के अंदाज में जवाब दे सकें. शायद विकल्प होता, तो भी उसका इस्तेमाल नहीं करते. तभी तो वह विराट कोहली हैं. तभी तो उनकी टीम अपराजेय होती जा रही टीम इंडिया है. अनहोनी को होनी बनाने का माद्दा रखती है. अपमान और आलोचनाओं का जवाब अपने काम और अपनी क्षमताओं से देना जानती है. और जब टीम ने ऐसा किया, तो ऑस्ट्रेलिया के सबसे सफल कप्तान रिकी पोंटिंग की आंखें फटी-की-फटी रह गई होंगी.

पोंटिंग ने शायद दिल की बात कह दी थी

रिकी पोंटिंग क्रिकेट के एक बेहतरीन दिमाग हैं. मैदान पर खेल के बड़े रणनीतिकार और खेल से जुड़े तमाम पहलुओं के बेहद समझदार (बुरा न मानें तो शातिर कह सकते हैं). तो फिर उनकी भविष्यवाणी गलत क्यों हो गई? उन्होंने तो 2-1 से ऑस्ट्रेलियाई टीम की जीत की बात कही थी! क्या पोंटिंग भूल गए कि क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है? नहीं. पोंटिंग क्रिकेट की इस सबसे बड़ी सच्चाई को कैसे भूल सकते हैं? लेकिन शायद उन्होंने अपने दिमाग से ऊपर दिल को तरजीह दे दी. क्योंकि सामने उनके देश की टीम थी.

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सीरीज का नतीजा पोंटिंग की भविष्यवाणी से उल्टा रहा, क्योंकि पोंटिंग के जमाने की ऑस्ट्रेलियाई टीम और तब की भारतीय टीम का रोल पलट गया है. वैसे ही जैसे नतीजे पलट गए. मौजूदा भारतीय टीम वैसी ही मशीनी रूप ले चुकी है, जैसा उनके जमाने में कंगारु थे. चढ़कर खेलने वाली टीम. पलटकर जवाब देने वाली टीम. हार का हिसाब चक्रवृद्धि ब्याज समेत वसूलने वाली टीम. तभी तो विराट की टीम वानखेड़े का बदला राजकोट में जीत हलक से निकालकर लेती है, तो बेंगलुरू में छाती पर चढ़कर.

जीत का श्रेय आलोचना करने वालों को भी !

एक हार पर उठने वाली करोड़ों ऊंगलियां क्या टीम को नुकसान करती हैं? उनका मनोबल तोड़ती है? बिल्कुल नहीं. अगर नुकसान करती, तो टीम इंडिया वानखेड़े की हार से निकलकर यूं नहीं निखर और चमक रही होती. दरअसल, हार पर मचने वाला हाहाकार भी है, जो टीम को उसकी जिम्मेदारियों के दबाव में वापस लेकर आता है. उन्हें अहसास कराता है कि फैंस उनसे कितनी ज्यादा उम्मीदें रखने लगे हैं?

कौन रोक सकता है हमारी बादशाह को

 

स्टीव वॉ और रिकी पोंटिंग वाली ऑस्ट्रेलियाई टीमों को जिन्होंने देखा और जिया है, वो समझ सकते हैं कि कैसे हम उसी तर्ज पर बादशाहत हासिल करने के करीब हैं. बेंच स्ट्रेंथ से लेकर खिलाड़ियों के मेंटल स्ट्रेंथ तक. गेंदबाजी में पेस से खौफ पैदा करने से लेकर स्पिन का जाल बुनने तक. बल्लेबाजी में पहली गेंद से कूटने से लेकर मैच फिनिश करने तक. ये टीम विरोधियों को लेकर बड़ी बेदर्द है.

मगर काम बाकी है

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तो क्या काम हो गया? बिल्कुल नहीं. कुछ ही महीने पहले की बात है. हम विश्व कप के सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड से हार कर मुकाबले से बाहर हो गए. ऐसा तब हुआ जबकि लीग मैचों में हम सबसे बेहतर खेले थे. बिल्कुल चढ़कर खेले थे. तो कहां अभी काम बाकी है? काम ये बाकी है कि हम बड़े मुकाबलों में मुकाबले के दौरान टीम बनाते और खड़े करते हुए न दिखें. निर्णायक मौके और मोड़ पर कॉम्बिनेशन बनाते हुए अपनी कमजोरियों को उजागर न करें. यानी युद्ध के मैदान में ये तय करते हुए न दिखें कि कौन योद्धा कहां लड़ेगा?

ऐसा ही तो 50-50 वाले पिछले विश्व कप में हुआ था. 20-20 विश्व कप के लिए यही गलती हम फिर से करते नजर आ रहे हैं. विकेटकीपर के स्लॉट पर दो दमदार और पक्के विकल्प अभी से तय होने चाहिए थे. एक भी तय नहीं है. हां, पिछले विश्व कप के सबसे बड़े दर्द यानी नंबर-4 स्लॉट पर केएल राहुल, श्रेयस अय्यर मजबूत होते जरूर दिख रहे हैं.

एक कदम दूर बादशाहत !

ऑस्ट्रेलिया की टीम इसी वजह से बादशाहत के शिखर पर लंबे वक्त तक टिक पाई थी, क्योंकि बड़े मुकाबलों से पहले उनका आखिरी इलेवन चाक-चौबंद होता था. उस इलेवन के हर खिलाड़ी के पीछे बैकअप के तौर पर उतना ही मजबूत विकल्प परफॉर्म करने के लिए तैयार खड़ा होता था. अब हमारे पास भी वह सबकुछ है. बस सही योद्धा को सही जगह फिट रखने की जरूरत है. इस सीरीज में हमने कंगारुओं को उन्हीं के अंदाज में बेदर्दी से पीटकर उसी अव्वल दर्जे की क्रिकेट खेली है.

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