वो वक्त भी था जब देश के सबसे लोकप्रिय चेहरों में शामिल थे पीके बनर्जी

पीके बनर्जी भारतीय फुटबॉल टीम (Indian Football Team) के सबसे अच्छे दौर के खिलाड़ी रहे थे. 1956 में भारतीय टीम ओलंपिक (Olympic Games) खेली तो वो उस टीम का हिस्सा थे. उस ओलंपिक में भारतीय टीम ने चौथा स्थान हासिल किया था.

  • Shivendra Kumar Singh
  • Publish Date - 3:59 pm, Sat, 21 March 20

पीके बनर्जी नहीं रहे. पीके बनर्जी यानी महान फुटबॉलर प्रदीप कुमार बनर्जी. लंबी बीमारी के बाद शुक्रवार को उनका निधन हो गया. उनके जाने के बाद फुटबॉल के खेल में उनकी उपलब्धियों से अलग मुझे कुछ और ही याद आ रहा है. 80 के दशक की बात है. दूरदर्शन का दौर था. देश में कांग्रेस की सरकार थी. राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने के लिए दो बहुत ही खूबसूरत वीडियो बनाए गए थे. ये दोनों ही वीडियो एक से बढ़कर एक थे.

दोनों शास्त्रीय राग पर आधारित थे. दोनों में जानी मानी हस्तियां स्क्रीन पर दिखाई देती थीं. एक से बढ़कर एक कलाकारों को उसमें ‘फीचर’ किया गया था. फर्क सिर्फ एक था- एक में लिपसिंक (किसी और की आवाज पर होठ हिलाना) का सहारा लिया गया था जबकि दूसरा उन्हीं कलाकारों पर फिल्माया गया था जो स्क्रीन पर दिखाई दे रहे थे. इन्हीं में से एक गीत था-मिले सुर मेरा तुम्हारा.

वो समय जब लोकप्रिय चेहरों में शुमार थे पीके बनर्जी

याद कीजिए उस गीत को जो भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी की गायकी से शुरू होता था. उसमें एक के बाद एक जाने माने चेहरे दिखते थे. लता मगेंशकर, अमिताभ बच्चन, कमल हासन, तनुजा, वहीदा रहमान, शबाना आजमी से लेकर तमाम परिचित चेहरे. इसी वीडियो में एक सीन था, जिसमें देश के जाने माने खिलाड़ी एक ट्रेन से उतरते हैं.

इन्हीं चेहरों में से एक थे-पीके बनर्जी. मेरा पीके बनर्जी से पहला परिचय इसी वीडियो का है. इस वीडियो में उनका होना ही इस बात का सबूत था कि 80 के दशक में वो देश के सबसे लोकप्रिय चेहरों में शामिल थे.

बचपन में देखे गए इस वीडियो की लोकप्रियता ही थी कि इसका एक-एक चेहरा बड़े होने तक याद रहा. बाद में जब टेलीविजन में खेल पत्रकारिता से जुड़ा तो भारतीय खेल में इन महान खिलाड़ियों के योगदान को जाना. पीके बनर्जी के बारे में जाना. एशियाड में उनके स्वर्ण पदक की कहानी जानी. इसके बाद कोलकाता में एक बार उनसे मुलाकात का मौका भी मिला.

एक क्रिकेट मैच की कवरेज के सिलसिले में कोलकाता गया था. कोलकाता में फुटबॉल का क्रेज हर किसी को पता है. कुछ साथी दोस्तों के साथ बनर्जी दा से मुलाकात का अवसर मिला था. मेरे साथ गए दोस्तों में से कुछ ने उनसे उस वक्त की फुटबॉल की ताजा तरीन खबरों पर चर्चा की. कुछ ने इंटरव्यू भी किए.

जब मैं पहली बार उनसे मिला…

मैंने इंटरव्यू करने की बजाए उन्हें बताया कि मैं उन्हें तब से पहचानता हूं जब मेरी उम्र 9-10 साल रही होगी. वो कोई सवाल करते इससे पहले ही मैंने उन्हें बताया कि मैं उन्हें ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ की वजह से पहचानता हूं. उनके लिए भी ये एक अलग अनुभव था. आज उनके जाने की खबर पता चला तो मुझे वो मुलाकात याद आ रही है.

दरअसल, भारत में कोलकाता और केरल जैसी कुछ जगहों को छोड़ दें तो फुटबॉल की चर्चा कम ही होती है. एक खेल पत्रकार के तौर पर कई बार हमें इस सवाल का जवाब देना पड़ता है कि हम खेलों की कवरेज में सबसे ज्यादा तवज्जो क्रिकेट को क्यों देते हैं. लेकिन पिछले 20 साल में इस माहौल में थोड़ा बदलाव तो हुआ है.

अब क्रिकेट के अलावा और भी कई खेल हैं जिनको लेकर खेल प्रेमियों में जबरदस्त क्रेज बढ़ा है. फुटबॉल निसंदेह उनमें से एक है. लेकिन मैं तब की बात कर रहा हूं जब फुटबॉल की खबरों को टीवी पर कम ही जगह मिलती थी. तब भी पूरा देश जिन फुटबॉलरों को पहचानता था, नाम से जानता था उसमें बनर्जी दा एक थे. फुटबॉल की किसी भी बड़ी खबर पर उनके ‘रिएक्शन’ आते रहते थे.

इसकी बड़ी वजह ये थी कि पीके बनर्जी भारतीय फुटबॉल टीम के सबसे अच्छे दौर के खिलाड़ी रहे थे. 1956 में भारतीय टीम ओलंपिक खेली तो वो उस टीम का हिस्सा थे. उस ओलंपिक में भारतीय टीम ने चौथा स्थान हासिल किया था. आज भारतीय फुटबॉल के लगातार सुधरते स्तर के बाद भी ये स्वीकार करना मुश्किल है कि ओलंपिक में कभी हमारी टीम ने चौथी पायदान भी हासिल की होगी.

पीके बनर्जी की टीम जीती थी एशियाई खेलों में गोल्ड

इसके बाद अगले ओलंपिक में उन्होंने देश का प्रतिनिधित्व भी किया. दो साल बाद ही यानी 1962 में भारतीय टीम ने एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता था. पीके बनर्जी उस टीम का भी हिस्सा थे. ये सब कुछ मेरे जन्म से पहले हुआ इसलिए उस दौर के अखबार तो मैंने नहीं पढ़े लेकिन मैंने खेल पत्रकारिता की किताबों में ये जरूर पढ़ा है कि ये वो दौर था जब फुटबॉल की खबरों को अच्छी खासी जगह मिलती थी.

खैर, इसी दशक के आखिरी सालों में फुटबॉल से संन्यास लेकर उन्होंने कोचिंग शुरू की. वो एक कामयाब कोच भी रहे. 90 के दशक में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया. वो अपना भरा पूरा जीवन जीकर गए. बावजूद इसके उनका जाना इसलिए खलेगा क्योंकि फुटबॉल के सवर्था चर्चित और लोकप्रिय चेहरों में से एक बनर्जी दा अब कभी नहीं दिखेंगे, रहेंगे तो बस खेल प्रेमियों की यादों में…