दो बार के मेडलिस्ट सुशील कुमार ने ठोकी ताल, कहा- अभी कहीं जाने वाला नहीं हूं मैं

एक इंटरव्यू में सुशील कुमार (Sushil Kumar) ने कहा है कि ओलंपिक के टलने से उन्हें एक साल का अतिरिक्त समय मिल गया है. इस समय का इस्तेमाल वो खुद को और चुस्त दुरुस्त करने और रंग में लाने के लिए करेंगे.
Sushil Kumar a two time medalist, दो बार के मेडलिस्ट सुशील कुमार ने ठोकी ताल, कहा- अभी कहीं जाने वाला नहीं हूं मैं

सुशील कुमार (Sushil Kumar) भारत के महानतम एथलीटों में शुमार हैं. उन्होंने भारत के लिए जो कारनामा किया है वो अब तक कोई नहीं कर पाया. उन्होंने भारत को एक नहीं बल्कि दो-दो बार ओलंपिक मेडल दिलाया है. सुशील ने 2008 में बीजिंग ओलंपिक में ब्रांज मेडल जीता था. इसके चार साल बाद उन्होंने लंदन ओलंपिक में अपने मेडल का रंग बदला. इस बार वो देश के लिए सिल्वर मेडल जीतकर आए. इन दो ऐतिहासिक उपलब्धियों के बाद भी सुशील कुमार अब भी जमकर पसीना बहाते हैं. अभी उनकी ख्वाहिश एक और ओलंपिक में देश की नुमाइंदगी करने की है. इसके लिए वो मेहनत भी कर रहे हैं.

हाल ही में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि ओलंपिक के टलने से उन्हें एक साल का अतिरिक्त समय मिल गया है. इस समय का इस्तेमाल वो खुद को और चुस्त दुरुस्त करने और रंग में लाने के लिए करेंगे. उनकी कोशिश होगी कि वो 2021 टोक्यो ओलंपिक (2021 Tokyo Olympics) में भी खेलें और देश के लिए मेडल जीतें. सुशील अगले महीने 37 साल के होंगे और जब तक ओलंपिक आएगा तब तक उनकी उम्र 38 पार हो चुकी होगी. बावजूद इसके उन्होंने इन सभी पहलुओं को छोड़ मेहनत का रास्ता अपनाया है.

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वर्ल्ड चैम्पियनशिप में हाथ लगी थी निराशा

सुशील कुमार (Sushil Kumar) ने पिछले साल वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी हाथ आजमाया था. वो मैट पर तो उतरे लेकिन उन्हें शुरुआती दौर में ही बाहर निकलना पड़ा. 2018 कॉमनवेल्थ खेलों में उन्हें गोल्ड मेडल जरूर मिला था, लेकिन कॉमनवेल्थ खेलों में प्रतिस्पर्धा का स्तर ओलंपिक और वर्ल्ड चैंपियनशिप के स्तर से कमजोर होता है. लिहाजा बात जब वर्ल्ड चैंपियनशिप की हुई तो सुशील को मायूसी हाथ लगी थी. हालाकि वो इस नाकामी को चैलेंज की तरह लेते हैं. सुशील कहते हैं कि उनके आलोचकों ने तो बीजिंग के बाद ही उन्हें पहलवानी छोड़ने की सवाल दे दी थी लेकिन वो ऐसी बातों पर ध्यान नहीं देते हैं. दरअसल सुशील के करियर का कड़वा सच कम ही लोग जानते हैं कि उन्हें शुरू से ही काफ़ी ‘रिजेक्शन’ का सामना करना पड़ा है. यहां तक कि जब वो पहली बार छत्रसाल स्टेडियम पहुंचे तो वहां के एक कोच ने कह दिया था कि सुशील कुमार पहलवानी के लायक नहीं हैं.

करियर की शुरुआत में भी लोगों ने नहीं पहचाना था हौसला

ये छत्रसाल स्टेडियम में सुशील कुमार के पहले दिन का किस्सा है. उस वक्त सुशील सातवीं क्लास में पढ़ते थे. उनके बड़े पापा उन्हें छत्रसाल स्टेडियम लेकर गए थे. वहां सुशील की ट्रायल हुई थी. उससे पहले सुशील के बड़े भाई यहां रहते थे. सुशील का ट्रायल लेने के बाद कोच ने उनसे बोला था कि तुम अच्छे पहलवान नहीं बन पाओगे. बड़े भाई संदीप के लिए उन्होंने जरूर कहा था कि वो अच्छा पहलवान बन जाएगा. बाद में संदीप इंटरनेशनल रेसलर बने. वो कुश्ती के बड़े जानकार भी थे. बाद में उनके घुटने में तकलीफ हो गई और कुछ उन्होंने सुशील के लिए अपना करियर छोड़ दिया. वो अब भी सुशील की ट्रेनिंग से लेकर खाने पीने तक का पूरा ध्यान रखते हैं.

खैर, जब कोच ने सुशील से कहाकि वो अच्छा पहलवान नहीं बन सकते तो उन्हें बड़ा दुख हुआ. उन्हें अजीब भी लगा क्योंकि वो तो पहलवानी में ही अपना करियर बनाने की सोच कर वहां गया था. खैर, सुशील ने भी हार नहीं मानी. वो कोच के कहने के बाद भी कहीं गए नहीं. वहीं छत्रसाल स्टेडियम में जमे रहे. वहीं ट्रेनिंग करते रहे और वहीं से भारत के सबसे कामयाब पहलवान भी बने.

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