रामविलास पासवान ने देखा था बेटे में भविष्य का सीएम, क्या पिता के सपने को पूरा कर पाएंगे चिराग?

Bihar election 2020: लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) शायद इतने प्रसिद्ध और चर्चित नेता नहीं होते अगर रामविलास पासवान (Ram Vilas Paswan) ने 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का ऑफर नहीं ठुकराया होता. पासवान ने बिहार का मुख्यमंत्री बनने से इनकार कर दिया और केंद्र में मंत्री बने रहना पसंद किया.

Ramvilas-paswan, Chirag Paswan
Ramvilas-paswan, Chirag Paswan

केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के संस्थापक रामविलास पासवान (Ram Vilas Paswan) के असामायिक निधन से बिहार विधानसभा चुनाव में एक नया मोड़ आ गया है. पासवान पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थे और पिछले हफ्ते ही उनकी हार्ट सर्जरी हुई थी. बिहार के एक छोटे से गांव के दलित परिवार में पैदा हुए पासवान का राजनीतिक सफर काफी महत्वपूर्ण रहा. वह काफी महत्वाकांक्षी थे. छोटी उम्र में ही शादी हो गई, पर परिवार की बेड़ियां उन्हें ज्यादा समय तक जकड़ कर रख नहीं सकीं. एमए और लॉ की पढ़ाई की और यह उनकी महत्वाकांक्षा ही थी कि पुलिस की खाकी वर्दी को ठुकरा कर उन्होंने सफेद कुर्ता-पायजामा चुना, और कभी पलट कर नहीं देखा.

रिकॉर्ड मतों से जीता चुनाव

कम उम्र में ही उन्हें भविष्य के नेता के रूप में जाना जाने लगा था और 1977 के लोकसभा चुनाव में पासवान ने सबसे अधिक मतों से जीतने का रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज कर दिखाया. 1989 में पहली बार केंद्रीय मंत्री बने, 6 प्रधानमंत्रियों के मंत्रिमंडल के सदस्य रहने का भी रिकॉर्ड अपने नाम किया और आखिरी सांस भी एक मंत्री के रूप में ही ली.

लोकप्रिय और मिलनसार थे पासवान 

12 जनपथ का सरकारी बंगला दशकों से नई दिल्ली में पासवान का आवास रहा था. हमेशा वहां मानो मेला लगा होता था. पासवान लोकप्रिय और मिलनसार थे. अन्य राजनेताओं के तरह वह झूठे आश्वासन नहीं देते थे. जो आश्वासन देते थे, उसे पूरा भी करते थे. बात सन 2000 की है. एक परेशान पत्रकार उनके पास पास पहुंचा. एक विदेशी अखबार ने उन्हें अपना दिल्ली ब्यूरो प्रमुख बनाया था, पर ऑफिस में टेलीफोन के बिना उन्हें काम करने में काफी परेशानी हो रही थी.

पासवान उस समय सूचना और प्रसारण मंत्री होने के साथ-साथ अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में संचार मंत्री भी थे. पासवान ने फोन उठाया और MTNL के एक बड़े अधिकारी को एक पता नोट करने को कहा. साथ में यह निर्देश भी दिया कि अगले दिन सुबह वह उस पते पर लगे फोन पर उस पत्रकार से बात करना चाहेंगे. रातो रात उस ऑफिस में दो फोन लग गए और अगली सुबह पासवान उस पत्रकार से फोन पर बात कर रहे थे.

जनपथ का यह 12 नंबर वाला बंगला पड़ोस वाले 10 जनपथ वाले बंगले से कम प्रसिद्ध नहीं है. 10 जनपथ कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) का निवास है. फर्क सिर्फ इतना ही है कि 10 जनपथ पर सिर्फ वीआईपी लोगों का मजमा होता रहा है और 12 जनपथ पर जनता का. पर शायद अब वो मजमा ना दिखे और वह मेले वाला माहौल भी शायद अब ना ही नजर आए.

लालू के लिए साफ किया सीएम का रास्ता

लालू प्रसाद यादव शायद इतने प्रसिद्ध और चर्चित नेता नहीं होते अगर रामविलास पासवान ने 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का ऑफर नहीं ठुकराया होता. पासवान ने बिहार का मुख्यमंत्री बनने से इनकार कर दिया और केंद्र में मंत्री बने रहना पसंद किया. लालू प्रसाद को इसका सीधा फायदा हुआ और 1990 से 2005 तक लालू और उनके परिवार का ही बिहार में राज रहा.

2005 में पासवान के पास मुख्यमंत्री बनने का एक और अवसर आया. फरवरी के महीने में हुए चुनाव में किसी भी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए बहुमत नहीं मिला. लालू और नीतीश कुमार रामविलास पासवान को मुख्यमंत्री बनाने पर सहमत थे, पर पासवान ने पद ठुकरा दिया और किसी मुसलमान नेता को मुख्यमंत्री बनाने की अपनी मांग पर अड़ गए. नतीजा यह हुआ कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा और अक्टूबर में दुबारा चुनाव हुआ.

चिराग को देखना चाहते थे मुख्यमंत्री के पद पर 

पासवान खुद को राष्ट्रीय स्तर पर दलितों के सबसे बड़े नेता के रूप में देखना चाहते थे. वह डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अनुयायी थे और वही मुकाम हासिल करना चाहते थे. बिहार के मुख्यमंत्री का पद उनकी महत्वाकांक्षा के सामने काफी छोटा था. पर अपनी मृत्यु से पहले पासवान ने अपने सपने को छोटा कर लिया. उनकी आखिरी इच्छा बस अपने पुत्र और राजनीतिक उत्तराधिकारी चिराग पासवान को मुख्यमंत्री के रूप में देखने की थी.

नवंबर 2019 में पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी अध्यक्ष पद चिराग को सौंप दिया. शायद उन्हें इस बात का अहसास था कि उनका अंत बहुत दूर शायद नहीं है. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा भी कि वह चिराग में बिहार के भावी मुख्यमंत्री को देखते हैं. उन्होंने 2 से 5 साल के बीच चिराग के मुख्यमंत्री बनने की बात की और भविष्यवाणी की कि अगले 20 से 25 साल में चिराग को देश के सबसे बड़े नेताओं के गिना जाएगा.

चिराग के सामने चुनौती

पासवान ने बिहार के पहले चरण के चुनाव के ठीक 8 दिन पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह दिया. चिराग के नेतृत्व में एलजेपी अपने संस्थापक के सपनों को पूरा करने में जुट गई है. एनडीए में रहते हुए भी नीतीश कुमार के जनता दल (यूनाइटेड) से एलजेपी ने नाता तोड़ लिया है. चिराग ने सा कहा है कि वह बिहार में नीतीश कुमार की जगह किसी भाजपा नेता को मुख्यमंत्री के रूप में देखना पसंद करेंगे.

अगर चिराग की चली तो वह बिहार में किंग मेकर बन जाएंगे और शायद उप-मुख्यमंत्री भी. अगर ऐसा नहीं हुआ तो कम से कम वह केंद्र में अपने पिता की जगह केंद्रीय मंत्री बन सकते हैं. उससे पहले चिराग के सामने यह चुनौती होगी कि कैसे अपने पिता के नाम को भुनाएं और किस तरह पासवान के निधन के पश्चात अपेक्षित सहानुभूति को वोट में तब्दील करें.

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