Bihar Election Special: इमरजेंसी के दौर से निकली बिहार चुनाव की कहानी इतनी खास क्यों है?

आज के अंक में आप 1977 के लोकसभा और उसके बाद किस तरह बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Election) ने करवट ली, उस पूरी कहानी बारे में जानेंगे.

(प्रतीकात्मक फोटो)

इमरजेंसी के काले दिनों के बाद मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव संपन्न हुआ और आशा के अनुरूप केंद्र में पहली बार कांग्रेस पार्टी को सत्ता से हाथ धोना पड़ा. 1977 के चुनाव ने यह साफ़ कर दिया कि नेता कितने भी बड़े कद या हैसियत का क्यों ना हो, देश और संविधान से बड़ा नहीं हो सकता. इंदिरा गांधी ने यही समझने में भूल कर दी और ना सिर्फ कांग्रेस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा, बल्कि खुद इंदिरा गांधी रायबरेली से और उनके बेटे संजय गांधी को अमेठी चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. लोकनायक जयप्रकाश नारायण के अथक प्रयासों से सभी बड़े विपक्षी दलों से हाथ मिलाया, राजा कामाख्या नारायण सिंह की जनता पार्टी में कांग्रेस (O), सोशलिस्ट और भारतीय जनसंघ का विलय हुआ और जनता पार्टी को 245 सीटों पर सफलता मिली.

आनन-फानन में बनी जनता पार्टी को कामाख्या नारायण सिंह की पार्टी का नाम तो मिल गया पर चुनाव, उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह के भारतीय लोकदल के चुनाव चिह्न पर लड़ना पड़ा. कांग्रेस (O) के दिग्गज और 81 साल के बुजुर्ग मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री का पद संभाला. मोरारजी देसाई को 1967 से 1969 के बीच इंदिरा गांधी की सरकार में उप-प्रधानमंत्री के तौर पर काम करने का अनुभव था.

चौधरी चरण सिंह उप-प्रधानमंत्री बने.

उत्तर प्रदेश और बिहार की केंद्र में जनता पार्टी सरकार बनाने में अहम भूमिका रही. जनता पार्टी ने जहां उत्तर प्रदेश की सभी 85 सीटों पर सफलता हासिल की, बिहार में 54 में से 52 सीटें जनता पार्टी के खाते में गई. बिहार के भी कई बड़े नेता केंद्रीय सरकार में मंत्री बने. फिर बारी आई विधानसभा चुनावों की. मोरारजी देसाई सरकार ने 15 राज्यों में विधानसभा भंग कर के फिर से चुनाव कराने का निर्देश दिया, जिसमें बिहार भी एक था. पर बिहार की शुरू से अपनी एक अलग ही सोच रही है. लग तो यही रहा था कि बिहार विधानसभा में कांग्रेस पार्टी का सफाया हो जाएगा, जैसा कि लोकसभा चुनाव में हुआ था. पर हुआ कुछ अलग ही. बिहार विधानसभा में 6 सीटों का इजाफा हुआ और 318 के बजाय 324 सीटों पर चुनाव हुआ. जनता पार्टी को 214 सीटों पर सफलता मिली पर कांग्रेस पार्टी का अस्तित्व बना रहा. कांग्रेस पार्टी ने 57 सीटों पर विजय हासिल की और उसके सहयोगी सीपीआई 21 सीटें जीतने में कामयाब रही. एक बार फिर से बड़ी तादाद में निर्दलीय विधायक जीत कर आए. उनकी संख्या 24 थी जो इस बात को दर्शाता है कि बिहार में जाति समीकरण चुनाव जीतने में हमेशा से सफलता की अहम कुंजी रहती आई है.

कांग्रेस पार्टी के पूर्ण सफाया नहीं होने का एक और कारण था कि लोगों ने इंदिरा गांधी के खिलाफ अपने गुस्से का इजहार लोकसभा चुनाव में कर दिया जाना. शायद लोकसभा चुनाव के बाद बिहार की जनता का गुस्सा थोड़ा शांत हो गया था. इमरजेंसी के दिनों में सरकारी दफ्तरों में सभी ऑफिसर और कर्मचारी समय से आते थे और लोगों का काम होता था, पर जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद फिर उसी पुरानी प्रथा की शुरुआत हो गई थे – दफ्तर खुले पर कर्मचारी नदारद, और अगर हों भी तो बिना रिश्वत के काम का नहीं होना. लोगों की निराशा बढ़ती जा रही थे और कांग्रेस पार्टी के पास थोड़ी सी ज़मीन बची रही जिस पर पार्टी फिर से बागबानी करने की सोच सकती थी.

चुनाव में जीत हासिल तो हुई पर बिहार विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी ने किसी भी नेता को अपने मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रस्तुत नहीं किया था. सोशलिस्ट पार्टी तो वैसे ही अंदरूनी कलह के लिए बदनाम थी जिसकी वजह से पूर्व में उनकी सरकार भी जाती रही थी. जनता पार्टी विधायक दल का नेता कौन हो इसका फैसला करने के लिए बाकायदा चुनाव का सहारा लेना पड़ा. मैदान में पूर्व मुख्यमंत्री और लोकनायक जयप्रकाश के करीबी सहयोगी कर्पूरी ठाकुर और कांग्रेस (O) ने नेता और वर्तमान में बिहार जनता पार्टी के अध्यक्ष सत्येन्द्र नारायण सिन्हा थे. कर्पूरी ठाकुर 84 के मुकाबले 144 वोट लेकर जीते और दुबारा मुख्यमंत्री बनने का सम्मान प्राप्त किया.

कर्पूरी ठाकुर का समाजवादी बैकग्राउंड और दलितों और पिछड़ी जातियों का मसीहा बनने की जल्दबाजी का नतीजा यह हुआ कि शीघ्र ही पार्टी और सरकार में उनसे नाराज़ विधायकों की संख्या बढ़नी शुरू हो गई. कर्पूरी ठाकुर उच्च जातियों को साथ लेकर चलने की जगह कुछ ऐसा कर बैठे जिससे उच्च जाति के लोग उनसे खफा हो गए. ठाकुर ने जल्दबाजी में मुंगेरीलाल कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने का फैसला किया जिसके अंतर्गत सरकारी नौकरियों में पिछड़ी जातियों के आरक्षण का प्रावधान था. बिहार में मानो आग लग गई और आए दिन उच्च और पिछड़ी जातियों के बीच हिंसक घटनाएं होने लगीं. राजधानी पटना में आए दिन उच्च जातियों के छात्रों की कॉलेज में पिटाई की घटना घटने लगी. कर्पूरी ठाकुर नायक बनने की जल्दबाजी में समाज के खलनायक बन गए.

जुलाई 1977 में पटना जिले के बेलची गांव में 10 दलितों के निर्मम हत्या का दोषी भी कर्पूरी ठाकुर सरकार को ही ठहराया गया. इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर हुए 6 महीने ही हुए थे, पर वह हाथी की सवारी करते हुए घटनास्थल पर पहुंच गईं. उनकी हाथी की सवारी का चित्र, जो सभी अख़बारों के फ्रंट पेज पर छपा था, आज भी लोगों को याद है. लिहाजा जनता पार्टी को एक ठोस कदम लेना पड़ा और 22 महीनों के बाद ही कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया. उनकी जगह दलित नेता राम सुंदर दास मुख्यमंत्री बने और 22 महीनों तक सत्ता में रहे.

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जयप्रकाश नारायण बीमार रहने लगे थे और जनता पार्टी में विवाद को रोक नहीं पाए. मोरारजी देसाई सरकार गिर गई और चौधरी चरण, सिंह इंदिरा गांधी के समर्थन के साथ प्रधानमंत्री बने, पर मात्र 7 महीनों के लिए ही. कांग्रेस पार्टी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया जिसका नतीजा हुआ केंद्र में पहली बार मध्यावधि चुनाव. अक्टूबर 1979 में जयप्रकाश का निधन हो गया और उनके जाने के साथ ही टूट गया एक सपनों का सफ़र जो संपूर्ण क्रांति से शुरू हो कर जनता पार्टी की केन्द्र और बिहार में सरकार के गठन पहुंच गया था.

जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुआ. इंदिरा गांधी की प्रधानमंत्री के तौर पर अभूतपूर्व वापसी हुई. अब इंदिरा गांधी सरकार की बारी थी गैर-कांग्रेसी सरकारों को बर्खास्त करने की. राम सुंदर दास सरकार को भी फरवरी 1980 में बर्खास्त कर दिया गया, बिहार में एक बार फिर से राष्ट्रपति शासन लागू हुआ और तैयारी शुरू हो गई अगले विधानसभा चुनाव की. कर्पूरी ठाकुर और चौधरी चरण सिंह, जिन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री के तौर पर इंदिरा गांधी को इमरजेंसी के दौरान कथित भ्रष्टाचार के आरोपों में अक्टूबर 1977 में जेल भेजा था, दोनों ने मिलकर अपने ही अंदाज़ में कांग्रेस पार्टी की वापसी का रास्ता साफ़ कर दिया था. अगले लेख में देखेंगे की क्या हुआ 1980 के विधानसभा चुनाव में और क्या हश्र हुआ जयप्रकाश नारायण के सपनों की जनता पार्टी का उनके ही प्रदेश बिहार में.

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