Bihar Election Special: जिस PM ने लालू को बनाया CM, उसी ने लालू के कारण गंवा दी सत्ता

ये कहानी है 1990 के विधानसभा चुनाव (Bihar Election) और उसके बाद के 5 सालों की. इतिहास की नजर में कुर्सी का ये किस्सा, राजनीति का 'मास्टरस्ट्रोक कहा जा सकता है.

पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह को श्रद्धांजलि देते बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव.

विश्वनाथ प्रताप सिंह की कांग्रेस पार्टी से बगावत, बोफोर्स सौदे में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनके निकट सहयोगियों के हाथ होने का आरोप, विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुवाई में चल रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी आन्दोलन, दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी पार्टी और वामपंथी लेफ्ट फ्रंट का समर्थन, 1989 के लोकसभा चुनाव के पहले एक बार फिर से देश को लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्णक्रांति के दिनों की याद ताज़ा हो गई थी. विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में जनता दल का गठन हुआ. और फिर 1989 का चुनाव.

परिणाम सभी को पता था. कांग्रेस पार्टी ने पांच साल पहले जहां 400 से भी अधिक सीटें जीती थीं, लोकसभा में पार्टी का आंकड़ा 197 पर रुक गया. कागजों पर तो कांग्रेस पार्टी अभी भी लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी थी, विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुवाई में बने राष्ट्रीय मोर्चा (नेशनल फ्रंट) के साथ था लेफ्ट और राइट. जनता दल के 143 सांसद थे, बीजेपी के 85 और वाम मोर्चा (लेफ्ट फ्रंट) के 52. विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने और फिर आया 1990 के विधानसभा चुनावों का दौर. उस समय बिहार समेत 10 राज्यों के चुनाव हुए.

जैसा कि केंद्र में हुआ था, ठीक वैसी ही स्थिति बिहार में दसवें विधानसभा की थी. कांग्रेस पार्टी को 125 सीटों का नुकसान हुआ और पार्टी 71 सीटों पर सिमट गई. जनता दल को 122 सीटों पर विजय हासिल हुई, बीजेपी को 23 सीटों का फायदा हुआ और अब पार्टी के 39 विधायक थे, और वाम मोर्चा के 42 विधायक चुने गए. 324 सदस्यों वाली विधानसभा में जनता दल के पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन था. पर अब सवाल था कि कौन बनेगा बिहार का मुख्यमंत्री? रामविलास पासवान के मुख्यमंत्री बनने पर सभी सहमत थे और पासवान का सपना था डॉ. भीमराव अम्बेडकर के बाद दलितों के सबसे बड़ा नेता बनने का. बिहार के मुख्यमंत्री का पद उस सपने को पूरा करने के लिए काफी छोटा रंगमंच था, लिहाजा उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में कैबिनेट मंत्री बने रहने का फैसला किया. बात अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न सिन्हा की भी चली पर विश्वनाथ प्रताप सिंह का सिन्हा के प्रति रुख नकारात्मक रहा. सिंह पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास के पक्ष में थे और चंद्रशेखर रघुनाथ झा को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे. विवाद पंहुचा उप-प्रधानमंत्री देवीलाल के पास. देवीलाल ने दूसरी बार सांसद बने लालू प्रसाद यादव के नाम का प्रस्ताव रखा. फिर विधायक दल का चुनाव हुआ और लालू प्रसाद यादव जीत कर मुख्यमंत्री बन गए.

लालू प्रसाद का सफ़र काफी रोमांचक रहा — 16 साल में पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष पद से बिहार के मुख्यमंत्री तक का. मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कुछ दिनों तक वह पटना वेटनरी कॉलेज के चपरासी वाले स्टाफ क्वार्टर में रहते थे. लालू के बड़े भाई वेटनरी कॉलेज में चपरासी थे और लालू भी 1977 में सांसद बनने के पहले यहां क्लर्क थे. अपने देशी लुक, हावभाव और बोलचाल के तरीके के कारण लालू देशी-विदेशी मीडिया में छा गए. ऐसा लगने लता था कि बिहार की जनता को उनके बीच का ही कोई मुख्यमंत्री मिल गया है. विश्वनाथ प्रताप सिंह को भी लालू यादव से कोई शिकायत नहीं थी, हां उन्होंने लालू को एक सुझाव ज़रूर दिया. मीडिया में खबर ज़ोरों से चल रही थी कि बिहार के नये मुख्यमंत्री नौ बच्चों के बाप हैं. सबसे छोटा बेटा तेजश्वी 10 मार्च 1990 को, जिस दिन लालू ने शपथ की थी, पूरे चार महीने का हो गया था. लालू और उनकी पत्नी राबड़ी देवी को 7 बेटियों के बाद दो पुत्रों को जन्म देने का सौभाग्य मिला था. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लालू को कहा बस करो, और नहीं. किस मुंह से आप जनता को परिवार-नियोजन की सलाह देंगे? लालू बात मान गए और वही पर पूर्ण विराम लगा कर अपने परिवार को नियोजित कर लिया.

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विश्वनाथ प्रताप सिंह लालू प्रसाद यादव को कतई मुख्यमंत्री नहीं बनने देते अगर उन्हें इस बात का ज़रा सा भी आभास होता की ठीक 8 महीने बाद उन्हें लालू प्रसाद के कारण ही प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ेगा. विश्वनाथ प्रताप सिंह केंद्र में वित्त मंत्री थे जब राजीव गांधी ने अयोध्या के विवादास्पद बाबरी मस्जिद के मुख्य द्वार से 36 सालों से जंग खुला हुआ ताला तोड़ने का आदेश दिया. जनता दल की अल्पमत सरकार पूर्णतया बीजेपी के समर्थन पर चल रही थी. बीजेपी को एक मौका मिला और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण अडवाणी निकल पड़े 1989 के अंत में सोमनाथ से अयोध्या के रथयात्रा पर. कहने को तो यह रथयात्रा बाबरी मस्जिद के स्थान पर एक भव्य मंदिर बनाने के लिए जनता के सहयोग के लिए थी, पर बीजेपी का असली इरादा था मंदिर-मस्जिद की आड़ में पार्टी का विस्तार. विश्वनाथ प्रताप सिंह लाचार थे और अडवाणी की रथयात्रा चलती रही. बिहार के समस्तीपुर में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने रथ को रोकने और अडवाणी की गिरफ्तारी का आदेश दिया, जो बीजेपी को मंज़ूर नहीं था. बीजेपी ने विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया और सिंह को प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा. वैसे बीजेपी आतंरिक रूप से विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार के अगस्त 1990 में मंडल कमीशन रिपोर्ट, जिसके अंतर्गत OBC यानी पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरी में 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था, को लागू करने के निर्णय से भी खुश नहीं थी.

बहरहाल, विश्वनाथ प्रताप सिंह लालू प्रसाद यादव के पिछड़ी जातियों के साथ-साथ मुस्लिम समुदाय के बड़े नेता बनने के सपने में कुर्बान हो गए. लालू को बिहार में बीजेपी के समर्थन की ज़रूरत थी भी नहीं, वाम मोर्चा और निर्दलियों का समर्थन पर्याप्त था लालू की सरकार को जिंदा रखने के लिए. जल्द ही लालू प्रसाद पिछड़ी जातियों के बड़े नेता के साथ-साथ भारतीय रणनीति सेक्युलर पॉलिटिक्स के पोस्टर बॉय भी बन गए. शुरुआती दौर में लालू सरकार की काफी तारीफ हुई पर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के चक्कर में आने वाले दिनों में लालू प्रसाद ने बिहार को जाति के नाम पर टुकड़ों में बांट दिया. अपनी राजनितिक और आर्थिक स्थिति मजबूत करके के लिए लालू को अपराधियों का भी सहारा लेना पड़ा. अगले लेख में देखेंगे कि कैसे 1995 विधानसभा चुनाव के बाद बिहार में जंगल राज और अपराधियों के राजनीतिकरण की शुरुआत हुई.

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