1995 के चुनाव में बाहुबलियों को खूब मिले टिकट, बूथ कैप्चरिंग की सुर्खियों के साथ बिहार में बरकरार रहा लालू राज

Bihar Election 2020: जब दबंग लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) के साथ थे तो फिर चाहे चुनाव में हेराफेरी हो या बूथ कैप्चरिंग, सभी लालू प्रसाद के पक्ष में ही होता नजर आया.

जब दबंग लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) के साथ थे तो फिर चाहे चुनाव में हेराफेरी हो या बूथ कैप्चरिंग, सभी लालू प्रसाद के पक्ष में ही होता नजर आया.

बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव 1990-1995 के बीच अंगद की तरह अपनी पांव जमा चुके थे, देश में इस बीच बहुत कुछ हुआ, पर लालू इनसे बेअसर रहे. केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार जाती रही, जिसमें लालू का भी बहुत बड़ा योगदान रहा. इतिहास ने फिर से एक बार अपने को दोहराया, या यूं कहें कि कुछ नेताओं ने इतिहास से कोई सबक नहीं सिखा था. 10 नवंबर 1990 को विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री पद इस्तीफा दे दिया और उसी दिन जनता दल का विभाजन हो गया. चंद्रशेखर ने चौधरी चरण सिंह के पदचिन्हों पर चलते हुए जनता दल के 64 सांसदों के साथ अपनी अलग पार्टी बना ली.

राजीव गांधी भी इसी प्रतीक्षा में थे. उनके पास अपनी मां इंदिरा गांधी का 1979 का उधाहरण था. आननफानन में उन्होंने चंद्रशेखर के समाजवादी जनता पार्टी को कांग्रेस पार्टी का समर्थन दे दिया और कुछ ही घंटों बाद राष्ट्रपति आर वेंकटरमण ने चंद्रशेखर की अल्पसंख्यक सरकार को शपथ दिला दी. शायद सभी दल यही चाहते थे और इतनी जल्दी लोकसभा चुनाव के लिए तैयार नहीं थे.

चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री पद छोड़ा

चंद्रशेखर की सरकार चार महीने भी नहीं चली थी कि कांग्रेस पार्टी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया. कारण हास्यास्पद था. राजीव गांधी के 10 जनपथ बंगले के बाहर एक सुबह हरियाणा पुलिस का एक कांस्टेबल दिखा. आरोप लगाया गया कि चंद्रशेखर सरकार राजीव गांधी की जासूसी करवा रही थी. चंद्रशेखर को सफाई देने का मौका भी नहीं मिला और लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बोलने के दौरान उन्होंने त्यागपत्र देने की घोषणा कर दी. चंद्रशेखर ने 6 मार्च 1991 को राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र सौंप दिया और कार्यकारी प्रधानमंत्री के तौर पर 21 जून 1991 तक पद पर काबिज रहे.

इसका नतीजा यह हुआ कि चंद्रशेखर सरकार बजट भी पेश नहीं कर पाई. भारत आर्थिक कठिनाइयों में उलझ गया और चंद्रशेखर सरकार को देश का सोना गिरवी रख कर विदेशी लोन चुकाने की नौबत आ गई, जो 1991 के लोकसभा चुनाव में एक प्रमुख मुद्दा बन गया था. 1991 के आम चुनाव के बीच ही कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी की 21 मई को तमिलनाडु के श्रीपेरुम्ब्दुर में LTTE के सुसाइड बॉम्बर ने हत्या कर दी. इसका कांग्रेस पार्टी को थोड़ा चुनावी फायदा हुआ और बीजेपी को नुकसान झेलनी पडी.

आडवाणी बनाम लालू

देश के कई हिस्सों में मतदान हो चूका था और बांकी के बचे क्षेत्रो में कांग्रेस पार्टी को सहानुभूति वोट मिला. 21 जून 1991 को पी वी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में केंद्र में कांग्रेस पार्टी की अल्पसंख्यक सरकार बनी. अयोध्या में 6 दिसम्बर 1992 में बाबरी मस्जिद गिरा दिया गया, देश के कई हिस्से में दंगे शुरू हो गए, पर लालू प्रसाद मुस्लिम सम्प्रदाय के हिमायती और एक सेक्युलर नेता के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करते रहे. अब उनके सीधे निशाने पर होती थी बीजेपी. धीरे-धीरे बीजेपी बनाम कांग्रेस की लड़ाई आडवाणी बनाम लालू बनती जा रही थी.

देश में 6 महीने में इतना कुछ हो गया पर लालू प्रसाद पर इसका कोई असर नहीं हुआ. 1990 से 1995 के बीच देश में तीन प्रधानमंत्री और तीन पार्टियों सत्ता में आई और लालू लगे रहे बिहार में अपनी स्थिति मजबूत करने में.लालू की स्थिति इतनी मजबूत हो गई थी कि 1995 बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल 167 सीट जीतकर बहुमत जीत कर आई. लालू का ओबीसी-मुस्लिम कार्ड सफल रहा.

दबंगों को मिला लालू का साथ

बीजेपी को मंदिर-मस्जिद विवाद का बिहार में कोई फायदा नहीं हुआ और वह 39 से 41 सीटों पर ही पहुंच पाई. सीपीआई और सीपीएम को 21 और 6 सीटों पर सफलता मिली, और झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को 10 सीटें पर. चुनाव में 5674 निर्दलीय उम्मीदवार थे और पहली बार सबसे कम मात्र 12 निर्दलीय चुनाव जीत कर आए. कारण था दबंग और अपराधिक छवि के नेता का लालू प्रसाद यादव के साथ जुड़ जाना. लालू प्रसाद ने उनका जनता दल में स्वागत किया, टिकट दिया और उनमें से बहुतों ने चुनाव भी जीता.

राजनीति का अपराधीकरण कोई नई बात नहीं थी. इसकी शुरुआत तो स्वतंत्रता के बाद ही हो गई थी जबकि नेहरु सरकार पर जीप घोटाले का आरोप लगा था. पर लालू प्रसाद के राज में अपराधियों का राजनीतिकरण शुरू हो गया. उन्हें पार्टी का टिकट दिया जाता था और उनसे सिर्फ यही आशा नहीं होती थी कि वह स्वयं अपना चुनाव ही जीतें, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी अपने प्रभाव का इस्तेमाल लालू के पक्ष में करें.

बूथ कैप्चरिंग और रिजेक्टेड वोटों का खेल

जब दबंग लालू प्रसाद के साथ थे तो फिर चाहे चुनाव में हेराफेरी हो या बूथ कैप्चरिंग, सभी लालू प्रसाद के पक्ष में ही होता नजर अया. जहां दूसरी पार्टियों की स्थिति मजबूत दिखी वहां आम मतदाताओं के मतदान बूथ तक पहुंचने ही नहीं दिया गया. चुनाव का प्रतिशत 61.79 रहा जो 1990 के चुनाव से थोडा कम था, पर रिजेक्टेड वोटों के संख्या 5,65,851 से लगभग दोगुना हो कर 11,25,854 हो गई जो अपने आप में काफी रोचक है, और दर्शाता है कि जानबूझ कर गलत मतदान कराया गया.

लालू प्रसाद के राज में बूथ कैप्चरिंग साइंटिफिक तरीके से की जाने लगी. किसी पार्टी या किसी उम्मीदवार को किसी विशेष बूथ पर बहुत ज्यादा मत मिलने से चुनाव आयोग दुबारा मतदान का आदेश देता था. इसलिए जो वोट विपक्षी पार्टी को मिलना होता था, उसे जानबूझकर गलत तरीके से डाला जाता था ताकि वह रिजेक्ट हो जाए और लालू प्रसाद के पसंद के नेता आराम से चुनाव जीत जाए.

लालू ने रचा इतिहास

लालू प्रसाद यादव इस तरह बड़े आराम से 1995 में दोबारा मुख्यमंत्री बने और इतिहास भी रचा. बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह के बाद 38 साल बाद लालू प्रसाद पहले ऐसे नेता बने जो पुरे पांच साल तक शासन में रहे. श्री कृष्ण सिंह और लालू प्रसाद के बीच बिहार में 23 बार 18 नेताओं ने सरकार बनाई, पर पुरे पांच साल सरकार चलाने में कोई भी सफल नहीं रहा.

लालू प्रसाद एक और इतिहास रचने वाले थे, जब 1997 में चारा घोटाले में नाम आने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा और फिर लालू ने अपनी जगह बिहार को अपनी धर्मपत्नी राबड़ी देवी के रूप में पहली बार ऐसा एक मुख्यमंत्री दिया जिसने पद पर रहते हुए बड़ी मुश्किल से हस्ताक्षर करना सिखा था.

(अगली कड़ी में देखेंगे के लालू प्रसाद कैसे फंस गए चारा घोटाले में और क्या इसका कोई असर हुआ बिहार की राजनीति में, खास तौर पर 2000 के विधानसभा चुनाव पर.)

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