Bihar Election 2020: बिहार में गरीबी की ‘बहार’, सरकारें बदलती रहीं लेकिन नहीं बदली लोगों की दशा

bihar poorer than india: लालू-राबड़ी के शासन में राष्ट्रीय स्तर और बिहार के स्तर पर प्रति व्यक्ति आय में बड़ा अंतर देखने को मिला. आय की यह खाई दिनों दिन और बढ़ती गई, यानी कि राष्ट्रीय स्तर पर लोगों की आय में इजाफा हुआ लेकिन बिहार के लोग इससे वंचित रहे.

  • TV9 Hindi
  • Publish Date - 12:50 pm, Fri, 16 October 20
प्रतीकात्मक तस्वीर

बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारियां लगभग अंतिम फेज में हैं. पहले चरण का मतदान 28 अक्टूबर को है और दूसरे और तीसरे फेज का चुनाव क्रमश: 3 और 7 नवंबर को होगा. 10 नवंबर को वोटों की गिनती होगी. वोटों की गिनती के साथ ही यह तय हो जाएगा कि बिहार की कमान इस बार किसके जिम्मे जा रही है. वोटों की गिनती से साफ हो जाएगा कि बिहार का मुख्यमंत्री कौन होगा. बिहार में अब तक कई मुख्यमंत्री हुए जिन्होंने शासन चलाया लेकिन प्रमुखता से नाम लालू यादव और नीतीश कुमार का होता रहा है. दोनों मुख्यमंत्री ने 15-15 साल बिहार पर राज किया. लालू यादव के राज में एक टर्म राबड़ी देवी ने भी मुख्यमंत्री का पद संभाला. इन 30 वर्षों का इतिहास देखें तो पता चलेगा कि बिहार की दशा में कोई बहुत बड़े परिवर्तन नहीं हुए जिसकी लोगों ने उम्मीद की थी. इन 30 वर्षों के पहले बिहार यूं ही बदहाल था और आज भी इसमें आमूल-चूल परिवर्तन नहीं देखा जा रहा है.

राजनीति में यह तथ्य भी उठता रहा है कि किसी प्रदेश की विकास यात्रा इस बात पर ज्यादा निर्भर करती है कि वहां की सरकार कितनी स्थिर या मजबूत है. इस लिहाज से देखें तो लालू राज हो या नीतीश कुमार का शासन, दोनों को मजबूत व्यवस्था मिली और सरकार में स्थिरता भी रही. लेकिन इसका असर बिहार की हालत पर कितना पड़ा? जवाब होगा कि बिहार की आर्थिकी को मजबूत करने में इन सरकारों का रोल बहुत बड़ा नहीं रहा. बात सबसे पहले लालू-राबड़ी के 15 साल की. लालू यादव पहली बार 1990-1997 तक मुख्यमंत्री रहे. इस दौरान बिहार के लोगों की दशा में कितना सुधार हुआ, इसे समझने के लिए उस दौर की प्रति व्यक्ति आय को समझ सकते हैं. 1990-91 में बिहार में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय स्तर की आय का 42.4 फीसद था यानी रुपये में देखें तो यह 2660 रुपये था.

तेजी से बढ़ता गया अंतर
लालू-राबड़ी शासन में प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा देखें तो यह 2660 रुपये से बढ़कर 8223 रुपये तक पहुंचा. राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़ा देखें तो 1990-91 में यह 42.4 फीसद था जो 1997-98 में 27.4 फीसद और 2005-06 में 27.5 फीसद हो गया. इसी दौर में प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय देखें तो यह 1990-91 में 6270 रुपये था जो 1997-98 में 14,649 रुपये हो गया. इसमें लगातार वृद्धि देखी गई लेकिन बिहार के संदर्भ में इसमें बड़ी तेजी देखने को नहीं मिली. समाचार पत्र टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट बताती है कि लालू-राबड़ी-नीतीश का 30 साल का इतिहास देखें तो यह पिछले 30 से बुरा दौर कहा जाएगा. बता दें, यहां बात बिहार की अर्थव्यवस्था के संदर्भ में कही जा रही है. इन 30 वर्षों में अर्थव्यवस्था उतनी मजबूत नहीं हुई जितनी होनी चाहिए जबकि इस दौर की सरकारें स्थिर और मजबूत थीं.

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लालू-राबड़ी के शासन में राष्ट्रीय स्तर और बिहार के स्तर पर प्रति व्यक्ति आय में बड़ा अंतर देखने को मिला. आय की यह खाई दिनों दिन और बढ़ती गई, यानी कि राष्ट्रीय स्तर पर लोगों की आय में इजाफा हुआ लेकिन बिहार के लोग इससे वंचित रहे. आंकड़ों की बात करें तो लालू-राबड़ी सरकार के जाने तक बिहार के किसी व्यक्ति की कमाई किसी सामान्य भारतीय की कमाई का चौथाई हिस्सा था. लालू-राबड़ी सरकार के जाने के बाद बिहार में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनाए गए. उनका प्रमुख नारा था कि वे बिहार के लोगों की आर्थिक दशा में सुधार करेंगे और लालू-राबड़ी राज से ज्यादा सुखमय जिंदगी प्रदान करेंगे. लेकिन ऐसा होता नहीं दिखा और बात वही ढाक के तीन पात वाली साबित हुई. अगर उनके 10 साल का शासन देखें तो बिहार का व्यक्ति आय के मामले में उसी दौर में खड़ा है जो दौर 1993-94 का था.

1960-90 में बिहार की आर्थिकी
लालू-राबड़ी दौर में अगर बिहार की अर्थव्यवस्था नहीं सुधरी तो पहले की हालत क्या थी? इस सवाल का जवाब ढूंढना जरूरी है क्योंकि इससे पता चल पाएगा कि पहले और अब की सरकार में कितना अंतर है. 1960 से 1990 का दौर देखें तो यह बिहार की राजनीति में अस्थिरता का दौर था. समय-दर-समय मुख्यमंत्री बदले जाते रहे. कोई अपना पूरा टर्म नही बीता पाया. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1960 से 90 तक बिहार ने 25 मुख्यमंत्री देखे और 5 बार राष्ट्रपति शासन लगा. इसका असर बिहार की अर्थव्यवस्था पर कितना पड़ा, इससे समझना आसान है कि हर साल मुख्यमंत्री बदलने से नीतियों पर कितना असर पड़ता होगा. शासन में हर वक्त उछाल देखा जाता रहा लेकिन यह उछाल प्रति व्यक्ति आय के मामले में फिसड्डी साबित हुई. राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो यह बढ़ने की बजाय घट गया. पहले जो 55 फीसद था वो 42 फीसद पर पहुंच गया.

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औद्योगिकीकरण में पिछड़ा बिहार
इसी दौर में देश के उत्तर पूर्वी राज्य मणिपुर का आंकड़ा देख सकते हैं. 1961 में बिहार से ज्यादा गरीब प्रदेश मणिपुर हुआ करता था लेकिन आज नहीं है. बिहार के किसी व्यक्ति से मणिपुर के व्यक्ति की आय 62 फीसद ज्यादा है. बिहार की तुलना में देखें तो राष्ट्रीय स्तर पर किसी व्यक्ति की तिगुना कमाई है जबकि दिल्ली का व्यक्ति आठ गुना ज्यादा कमाता है. समय गुजरता गया और बिहार कमाई के मामले में पिछड़ता गया. इसका कारण जानें तो राजनीति एक बड़ी वजह बनकर उभरेगी. विकास और अर्थव्यस्था के मुद्दे पर कम बात हुई और जाति और संप्रदाय में लोगों को बांटकर सरकारें बनती रहीं. नतीजा यह हुआ कि बिहार की तुलना में अन्य राज्य तेजी से मजबूत होते चले गए. 1960-61 में बिहार की प्रति व्यक्ति आय केरल का 83 फीसद थी जो 2019-20 में 23 फीसद हो गई. दिल्ली समेत कुछ 18 राज्यों के आंकड़ों से पता चलता है कि ये प्रदेश बिहार की तुलना में कई गुना ज्यादा तेज गति से आगे बढ़ते चले गए. 1990 के बाद देश के बाकी राज्यों में तेज गति से औद्योगिकीकरण हुआ लेकिन बिहार इसमें भी पिछड़ गया. आज की तारीख में बिहार में प्रति व्यक्ति आय हरियाणा, कर्नाटक और तमिलनाडु से 5 गुना कम है.