Bihar Election 2020: दागी तो बहुत हैं, लेकिन नीतीश का करीबी वो नेता जिसे लोग ‘पढ़ा-लिखा’ कहते हैं

Bihar Elections Ashok chaudhary profile: अशोक चौधरी मौके की ताक में थे और यह मौका आया 2017 में जब महागठबंधन से जेडीयू अलग हुई. महागठबंधन में रहते हुए अशोक चौधरी और नीतीश कुमार में अच्छी बनती थी. दोनों नेता एक दूसरे की राजनीति पसंद करते थे.

अशोक चौधरी

‘दलितों एवं वंचितों के नाम पर वर्षों तक सत्ता का सुख भोगने वाले नेताओं के समय दलितों के लिए बजट महज 40 करोड़ था. हमारे नेता ने 15 वर्षों में दलितों के बजट को 40 गुना बढ़ाकर 1700 करोड़ करने का काम किया. प्रदेश की विकास यात्रा को मजबूती देने के लिए अपने नेता को मजबूत करें.’ यह बयान है बिहार के नेता अशोक चौधरी का जो जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) का दलित चेहरा हैं. पूरे देश में दलित समुदाय के नाम पर राजनीति हमेशा से होती रही है. बिहार भी इससे अछूता नहीं है. चूंकि इस समुदाय की बड़ी तादाद बिहार में बसती है, लिहाजा हर पार्टी का अपना एक दलित चेहरा होता है. जेडीयू के इसी चेहरे का नाम है अशोक चौधरी.

अशोक चौधरी का व्यक्तित्व और राजनीतिक सफर विस्तृत रहा है. उनकी भूमिका जेडीयू में कैसी है इसे समझने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनसभाएं और रैलियों को देखा जा सकता है. मंच पर नीतीश कुमार के साथ अशोक चौधरी अक्सर मौजूद मिलेंगे. अशोक चौधरी पढ़े-लिखे नेता हैं और राजनीतिक परिवार से उनका नाता है. नीतीश कुमार के कहने पर ही जेडीयू के बिहार अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने अशोक चौधरी को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया. हालांकि जेडीयू में अशोक चौधरी की पारी बहुत लंबी नहीं है और वे 2017 में जेडीयू से जुड़े. उसके पहले अशोक चौधरी बिहार में कांग्रेस के जाने-माने नेता थे. यहां तक कि वे बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं.

काबिल नेताओं में नाम
नीतीश कुमार ने बिहार विधानसभा की तैयारियों के लिए जिन छह लोगों को नामित किया है, उनमें एक अशोक चौधरी भी हैं. नीतीश कुमार ने यह फैसला अशोक चौधरी की राजनीतिक सक्रियता और उनकी समझ-बूझ को देखते हुए लिया. साल 2015 का विधानसभा चुनाव याद करें तो पता चलेगा कि जेडीयू, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और कांग्रेस गठबंधन में हुए चुनाव में अशोक चौधरी ने प्रमुख निभाई थी. अशोक चौधरी के नेतृत्व में हुए इस चुनाव में कांग्रेस 27 सीटें झटकने में कामयाब रही थी. इससे पहले वे 2014 में बिहार विधान परिषद के सदस्य बने थे. महागठबंधन की सरकार बनने पर शिक्षा मंत्री बनाए गए. साल 2017 में जब नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू महागठबंधन से अलग हुए तो 1 मार्च, 2018 को अशोक चौधरी ने जेडीयू जॉइन कर ली. पिछले साल उन्हें भवन निर्माण मंत्री बनाया गया था. आज विधानसभा चुनाव की तैयारियों और जनसभाओं में उनकी महत्वपूर्ण देखी जाती है.

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लालू यादव का विरोध
जानकार बताते हैं कि अशोक चौधरी महागठबंधन में रहते हुए लालू यादव को पसंद नहीं करते थे. ऐसा भी कहा जाता है कि लालू यादव के इशारे पर ही सोनिया गांधी ने अशोक चौधरी को कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाया था. इसके बाद अशोक चौधरी का बागी होना लाजिमी था. अशोक चौधरी मौके की ताक में थे और यह मौका आया 2017 में जब महागठबंधन से जेडीयू अलग हुई. महागठबंधन में रहते हुए अशोक चौधरी और नीतीश कुमार में अच्छी बनती थी. दोनों नेता एक दूसरे की राजनीति पसंद करते थे. अशोक चौधरी पढ़े-लिखे होने के साथ महावीर चौधरी के बेटे हैं जिनका राजनीति में अच्छा खासा नाम है.

नीतीश कुमार को भी एक ऐसा दलित नेता चाहिए था जो एलजेपी के नेता चिराग पासवान और हिंदुस्तान अवाम मोर्चा (हम) के नेता जीतन राम मांझी की काट साबित हो सके. वैसे भी अशोक चौधरी जिस दलित जाति से आते हैं, उसका वोट कन्वर्जन रेट बहुत ज्यादा है. यानी कि प्रतिशत में कम होते हुए भी इस जाति के प्रभाव में अन्य लोग थोक में वोट देते हैं. जेडीयू ने इस अहमियत को भांप लिया जबकि कांग्रेस और आरजेडी से उकताए अशोक चौधरी को भी एक मोर्चे की तलाश थी. इन सभी फैक्टर को देखते हुए अशोक चौधरी को जेडीयू का साथ मिला और जेडीयू को अशोक चौधरी का.

 

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