Bihar Election: पति की हत्या के आरोपी के खिलाफ चुनाव लड़ रहीं ये महिला, दोनों ही बड़े नाम

इस सीट का नाम है दानापुर, जिस पर फिलहाल BJP का कब्जा है. लेकिन लोग कहते हैं कि दोनों उम्मीदवारों के बीच इस बार की लड़ाई दिलचस्प हो सकती है.

(प्रतीकात्मक तस्वीर)

बिहार के चुनाव हों और आपको ‘बाहुबली’, ‘दबंग’ और ‘डॉन’ जैसे शब्द पढ़ने-सुनने को न मिलें, ऐसा हो ही नहीं सकता. हां, एक बात और जितने भी कैंडिडेट चुनाव आयोग के सामने नॉमिनेशन फाइल कर रहे हैं, उन्हें देखकर तो लगता है कि जिस पर जितने ज्यादा अपराध हैं, वो उतना ही बड़ा नेता है. खैर, आज हम बात कर रहे हैं एक ऐसा नेता की, जिन्हें इलाके के लोग ‘डॉन’ कहते हैं. इनका नाम है रीतलाल यादव. RJD के टिकट पर दानापुर चुनाव लड़ रहे हैं. करीब 33 मामले इनके खिलाफ दर्ज हैं. लेकिन सबसे बड़ी बात इनके खिलाफ जो महिला नेता BJP की टिकट से खड़ी हैं, खुद उनके पति की हत्या का आरोप भी रीतलाल पर है. रीतलाल को लालू यादव का करीबी माना जाता है और कहा तो यहां तक जाता है कि 90 के दशक में पटना से लेकर दानापुर तक रीतलाल का सिक्का चलता था.

BJP नेता के बारे में
इस सीट पर जो BJP की उम्मीदवा हैं, उनका नाम है आशा देवी. आशा देवी चार बार विधायक रह चुकी हैं और मौजूदा सीट से BJP की विधायक हैं. आशा देवी के पति सत्यनारायण सिन्हा की 30 अप्रैल, 2003 को कथित तौर पर दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. रीतलाल, आशा देवी के पति की हत्या के मुख्य आरोपी हैं.

थोड़े दिन पहले ही जेल से छूटे हैं रीतलाल
रीतलाल के जेल आना-जाना लगा रहता है. रीतलाल 18 अगस्त को ही मनी लॉन्ड्रिंग केस में जेल से बाहर आए हैं. रीतलाल ने 2010 में जेल में बंद रहते हुए आशा देवी के खिलाफ निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था, हालांकि वह हार गए थे. रीतलाल को लोग ‘डॉन’ कहते हैं. वह पहली बार पूरी तरह चर्चा में 2014 के दौरान आए थे, जब RJD प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने उन्हें पार्टी का महासचिव घोषित किया था, ताकि उन्हें पाटलिपुत्र से चुनाव लड़ने से रोका जा सके. क्योंकि उस वक्त लालू की बेटी मीसा भारती इस सीट से चुनाव मैदान में थीं.

ठेकेदार रहे हैं रीतलाल
दानापुर, पटना का एक शहर है. रीतलाल यादव पेशे से ठेकेदार रहे हैं. दानापुर में सड़क और रेल सेवाओं का अच्छा नेटवर्क है. कहा जाता है कि रेलवे के ठेकों ने ही रीतलाल को इतना बड़ा बना दिया कि पूरे इलाके में लोग उन्हें जानने लगे. 90 के दशक में एक समय तो ये था कि उनके रहते रेलवे के टेंडर किसी और को नहीं मिल सकते थे. फिर उनका नाम अपराधों में भी आने लगा. इसी तरह धीरे-धीरे रीतलाल पर मुकदमों की संख्या बढ़ती चली गई.

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