1985 के बिहार चुनाव में कांग्रेस ने दर्ज की थी रिकॉर्ड जीत, राजीव गांधी ने खेला था सीएम हटाने और बनाने का खेल

Bihar Election 2020: राजीव गांधी के लिए मुख्यमंत्री हटाना और बनाना मानो एक खेल था, जिसे वह बड़े चाव से खेलते दिखे. सत्येन्द्र सिंह मुख्यमंत्री पद पर करीब नौ महीने ही रहे और अब उनकी बारी थी जाने की

  • TV9 Hindi
  • Publish Date - 11:01 am, Fri, 16 October 20

वक्त हो चला था बिहार में नौवें विधानसभा चुनाव का. 324 सीटों वाली बिहार विधानसभा का चुनाव फरवरी-मार्च 1985 में हुआ, पर चुनाव के लगभग चार महीने पहले एक ऐसी घटना हुई जिससे पूरा देश दहल गया. 31 अक्टूबर 1984 की सुबह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indra Gandhi) की निर्मम हत्या हो गई. हत्यारे कोई और नहीं बल्कि उनके दो सिख समुदाय के अंगरक्षक थे, जिनपर उनकी सुरक्षा का दायित्व था. इससे पहले 23 जून 1980 को इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी का एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया था. कोई साढ़े चार साल की अवधि में गांधी-नेहरू परिवार के दो सदस्यों के निधन के बाद देश का माहौल और कांग्रेस पार्टी की स्थिति यकायक बदल सी गई थी.

राजीव गांधी की सियासत में एंट्री

इंदिरा गांधी के बड़े बेटे राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) एयर इंडिया में पायलट थे और राजनीति में कोई खास दिलचस्पी नहीं रखते थे. अपने छोटे भाई की मृत्यु के बाद इच्छा के विरुद्ध राजीव गांधी को राजनीति में आना पड़ा था. बताया गया कि वह अपनी मां की मदद के लिए राजनीति में आए हैं, पर सच्चाई यही है कि इंदिरा गांधी संजय के मरणोपरांत राजीव के रूप में अपने उत्तराधिकारी को स्थापित करना चाहती थी. राजीव गांधी संजय के अमेठी से लोकसभा उपचुनाव जीत कर लोकसभा के सदस्य बन चुके थे और पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी के रूप में इंदिरा के बाद दूसरे सबसे बड़े नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे.

31 अक्टूबर की शाम में ही राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई, और उसी रात सिखों का नरसंघार शुरू हुआ गया. बिहार भी इससे अप्रभावित नहीं रहा. हालांकि लोकसभा चुनाव में अभी समय था, पर देश का घाव अभी भरा नहीं था. राजीव गांधी ने दिखा दिया की वह राजनीति के कच्चे खिलाडी नहीं हैं, बल्कि मौके पर चौका मारने में विश्वास रखते हैं. इंदिरा गांधी के निधन के दो महीनों के अन्दर ही लोकसभा चुनाव हुआ और सहानुभूति की नैया पर सवार कांग्रेस पार्टी ने 514 में से 404 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर एक तरफा जीत का नया रिकॉर्ड बना डाला. पंजाब और असम में लोकसभा चुनाव अगले वर्ष हुआ.

बिहार में एकतरफा कांग्रेस की जीत

1985 के शुरुआती महीनो में 10 राज्यों में विधानसभा चुनाव हुआ, जिसमें बिहार भी एक था. बिहार विधानसभा में भी कांग्रेस पार्टी की एकतरफा जीत हुई. 324 सीटों में से 196 पर जीत. अगर आंकड़ों के आईने से देखें तो 1951-52 तथा 1957 चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी की बिहार में यह सबसे बड़ी जीत थी. इससे पहले की चंद्रशेखर सिंह दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते, राजीव गांधी ने उन्हें केंद्र में मंत्री बनने का आमंत्रण देकर बिहार के राजनितिक दलदल से बहार निकाल लिया और सूबे की कमान बिन्देश्वरी दुबे को सौंप दी.

हालांकि, राजीव गांधी के पास आपनी मां की तरह असुरक्षित महसूस करने का कोई ठोस कारण नहीं था, पर राजीव गांधी भी अपनी मां के पदचिन्हों पर चलते हुए बार बार मुख्यमंत्री बदलते रहे. दुबे पद पर तीन साल से थोड़े दिन कम रहे. चंद्रशेखर सिंह की तरफ उनकी भी पदोन्नति हो गई. 13 फरवरी 1988 को बिन्देश्वरी दुबे ने बिहार के मुख्यमंत्री पद को त्यागा और अगले दिन नई दिल्ली में वह केंद्रीय मंत्री पद की शपथ लेते दिखे.

कांग्रेस से नाराज हुए मैथिल ब्राह्मण

फिर बारी आई भागवत झा आजाद की. आजाद, जो इंदिरा गांधी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे थे, को दुबे की जगह बिहार का मुख्यमंत्री मनोनीत किया गया. पद पर 1 साल और 23 दिन रहे और फिर उनकी भी छुट्टी हो गई. आजाद को मुख्यमंत्री पद से हटाना उतना ही अचरज भरा था जितना कि उनका मुख्यमंत्री बनना. राजीव गांधी ने भगवत झा आजाद को बेवजह मुख्यमंत्री पद से हटा कर ब्राह्मण जाति के लोगों को, खास तौर पर मैथिल ब्राह्मणों को नाराज जरूर कर दिया, जिसका फायदा आने वाले वर्षों में बीजेपी उठाने वाली थी.

जगन्नाथ मिश्र की वापसी

फिर बारी आई सत्येन्द्र नारायण सिंह की जो बिहार के पहले उप-मुख्यमंत्री डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह के बेटे थे. सत्येन्द्र नारायण सिंह जाने-माने घराने के तो थे ही, दबंग राजपूत जाति के अग्रणी नेताओं में भी उनकी गिनती होती थी. पर राजीव गांधी के लिए मुख्यमंत्री हटाना और बनाना मानो एक खेल था, जिसे वह बड़े चाव से खेलते दिखे. सत्येन्द्र सिंह मुख्यमंत्री पद पर करीब नौ महीने ही रहे और अब उनकी बारी थी जाने की. ब्राह्मण जाति के वोटरों को खुश करने के लिए, 1990 के विधानसभा चुनाव से ठीक तीन महीने पहले डॉ. जगन्नाथ मिश्र की वापसी हुई.

म्यूजिकल चेयर का चला खेल

कांग्रेस पार्टी की एकतरफा जीत का सीधा मतलब था विपक्ष का कमजोर होना. सोशलिस्ट नेता कर्पूरी ठाकुर का 1988 में निधन हो गया था. बचे हुए समाजवादी नेताओं ने लोकदल में शरण ली, जो 46 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी. बीजेपी को 21, जनता पार्टी को 13, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को 9, सीपीआई, सीपीएम और इंडियन कांग्रेस सोशलिस्ट को एक-एक सीट मिली, जबकि हमेशा की तरह बड़ी तादाद में, 29, निर्दलीय चुने गए.

बिहार से कांग्रेस विदाई हुई तय
राज्य में पांच साल तक चला कांग्रेस पार्टी का म्यूजिकल चेयर का खेल और पांच मुख्यमंत्रीयों का हुआ आना जाना, वहीं केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह का राजीव गांधी सरकार से इस्तीफा देना, बोफोर्स सौदे में राजीव गांधी पर आरोप लगना और विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में चला भ्रष्ट्राचार विरोधी आन्दोलन. 1989 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हार हुई. बिहार में भी भ्रष्ट्राचार के खिलाफ काफी आक्रोश था और 1990 में हुए अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को मुहं की खानी पड़ी. जगन्नाथ मिश्र कांग्रेस की डूबती नैया को बचा नहीं पाए.

लालू की पीठ पर सवार कांग्रेस

तीन दशक हो गया सत्ता गंवाए और कांग्रेस का ग्राफ बिहार में लगातार नीचे ही गिरता जा रहा है. आखिरी कांग्रेसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र थे और अब कांग्रेस पार्टी लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल की पीठ पर सवारी करने को मजबूर हैं. लालू प्रसाद यादव 1985 में एक बार फिर से सोनपुर क्षेत्र से विधायक बने थे और पांच साल बाद 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री पद संभालने वाले थे. कभी लालू यादव बिहार में कांग्रेस के दुश्मन नंबर 1 होते थे और अब कांग्रेस की मजबूरी का आलम यह है कि अगर लालू का साथ ना हो तो कांग्रेस पार्टी का बिहार विधानसभा में खाता खोलना मुश्किल होगा.