Bihar Election 2020: क्या अतिपिछड़े और दलितों के सहारे नैया पार लगाने की फिराक में है आरजेडी ?

Bihar Election 2020: आरजेडी (RJD) इस बार के चुनाव में अपने कोटे से 34 फीसदी अतिपिछड़ों को टिकट देकर उन्हें अपने साथ जोड़ने की कवायद में जुट गई है.

तेजस्वी और तेजप्रताप यादव

सत्ता के शिखर तक पहुंचने के लिए आरजेडी (RJD) अपने आधार वोट के अलावा अतिपिछड़े (EBC) और दलित (SC) समाज को साधने में लग चुकी है. आरजेडी (RJD) द्वारा बांटे गए टिकट वितरण पर नजर डालें तो 24 अतिपिछड़ों को टिकट देकर पार्टी ने अपनी रणनीति साफ कर दी है . दरअसल बिहार में चुनाव जीतने के लिए 26 फीसदी अतिपिछड़ों का वोट अति महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिसके दम पर लालू प्रसाद 15 साल तक राज करते रहे थे.आरजेडी इस बार के चुनाव में अपने कोटे से 34 फीसदी अतिपिछड़ों को टिकट देकर उन्हें अपने साथ जोड़ने की कवायद में जुट गई है.

अतिपिछड़े को जोड़ने के पीछे की असली वजह
वैसे आरजेडी महागठबंधन का सबसे बड़ा घटक दल है और आरजेडी ने इस चुनाव में अतिपिछड़ा (EBC) समाज के 24 लोगों को टिकट देकर मैदान में उतारा है वहीं महागठबंधन ने कुल 29 अतिपिछड़े समाज के प्रत्याशियों को टिकट देकर इस चुनाव में उनकी महत्ता साबित की है. दरअसल, लालू प्रसाद जब अपनी लोकप्रियता के चरम पर थे तब उन्हें ओबीसी समाज का पूर्ण समर्थन प्राप्त था, लेकिन साल 2007 में नीतीश कुमार ने अति पिछड़ों के लिए अलग से कोटा तैयार कर लालू के राजनीतिक हैसियत को जोरदार झटका पहुंचाया.

यही वजह है कि साल 1990 से साल 2005 तक बिहार में सत्ता पर कब्जा जमाए बैठे लालू दोबारा सत्ता का सुख प्राप्त नहीं कर पाए, क्योंकि ओबीसी का एक बड़ा वर्ग ईबीसी के तौर पर चिह्नित हो गया जिसकी आबादी 26 फीसदी बताई जाती है और यह समाज यादव जाति के विरुद्ध चुनाव में मतदान करने लगा. इतना ही नहीं ओबीसी के कुर्मी, क्वोइरी समेत अतिपिछड़ों का बड़ा समूह लालू के मज़बूत पकड़ से बाहर निकल गया और नीतीश कुमार और बीजेपी(BJP) के पाले में जा उन्हें सत्ता की बागडोर लगातार सौंपने लगा.

वैसे साल 2015 में एकबार फिर नीतीश और लालू का गठजोड़ उन्हें सत्ता तक पहुंचाने में कामयाब रहा लेकिन यह गठजोड़ डेढ़साल में ही टूट गया और लालू का साथ छोड़ नीतीश एक बार फिर बीजेपी के साथ गठबंधन कर सरकार बनाने में कामयाब रहे.

लोकसभा चुनाव में एमवाई समीकरण हुआ पूरी तरह फेल
साल 2017 में आरजेडी को सत्ता से बाहर होने के बाद साल 2019 के लोकसभा चुनाव में खाता खोलने से वंचित रहने के बाद पार्टी को अपने सपोर्टबेस को बढ़ाने की चिंता सताने लगी. जाहिर है पार्टी ने इस कड़ी में प्रयास करने तेज कर दिए जिससे प्रदेश का नेतृत्व आरजेडी(RJD) के हाथों 90 के दशक की तरह आ सके.

आरजेडी (RJD) के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी कहते हैं कि हमारी पार्टी ने फरवरी में होने वाले संगठन के चुनाव में ही साफ कर दिया था कि आरजेडी सभी वर्गों की पार्टी है और इसे केवल यादव और मुस्लिमों की पार्टी बताकर बदनाम नहीं किया जाना चाहिए. आरजेडी ने जो संगठन के चुनाव में किया उसका स्वरूप अब टिकट बंटवारे में साफ दिखाई पड़ रहा है.

संगठन स्तर पर किया भारी फेरबदल
जाहिर है आरजेडी प्रवक्ता फरवरी 2020 में संगठन में हुए फेरबदल की ओर इशारा कर रहे हैं, जिसमें 37 नए चेहरे शामिल किए गए थे. आरजेडी के नए जिला अध्यक्षों की सूचि में 14 अतिपिछड़ा 8 अनुसूचित जाति और जनजाति 13 यादव और 12 मुस्लिम समुदाय के लोगों का नाम शामिल किया गया था. जबकि इससे पहले की सूचि में 23 यादव और 16 मुस्लिम समुदाय के लोगों को जिला अध्यक्ष बनाया गया था.

दलितों में भी वंचित समाज को जोड़ने की कवायद
इतना ही नहीं आरजेडी (RJD) इस चुनाव में दलितों को भी जोड़ने के लिए पूरी तरह प्रयासरत दिखाई पड़ रही है. आरजेडी ने अपने कोटे के सीटों में 4 पासवान 2 मुसहर 2 आदिवासी और 7 रविदास को टिकट देकर दलित और महादलित को साधने की कोशिश की है.आरजेडी के प्रदेश सचिव अजय सिंह कहते हैं कि हाशिए पर धकेले गए समाज को जोड़ने के लिए आरजेडी पूरी तरह प्रयासरत है और इस कड़ी में शर्मा समाज जिन्हें जुलाहा समाज भी कहा जाता है के दो उम्मीदवारों को बनमनखी और सिंघेश्वर विधानसभा से टिकट देकर उन्हें मुख्यधारा में लाने की कोशिश की है.

दरअसल, जुलाहा समाज पहले अतिपिछड़े (EBC) समाज का हिस्सा था लेकिन अब उसे दलित समाज में समाहित किया गया है. इस समाज का प्रतिनिधित्व राजनीति में नहीं के बराबर कहा जाता है. इसलिए आरजेडी (RJD) जुलाहा समाज के दो लोगों को टिकट देकर उन्हें मांझी और पासवान समाज से इतर आरजेडी (RJD) से जोड़ने की फिराक में है .

आरजेडी (RJD) अब एमवाई (MY) समीकरण के अलावा उनको भी जोड़ने में लग गई है, जिन मतदाताओं के दम पर लालू राज करते रहे और इन्हें ” जिन्न” की संज्ञा देकर अपनी प्रचंड जीत से सबको चौंकाते रहे. लेकिन लालू की जीत के तिलिस्म को तोड़ने में नीतीश कुमार बखूबी कामयाब रहे और पिछड़े समाज से इतर अतिपिछड़ा समाज बनाकर उन्हें अपने साथ जोड़ने में कामयाब रहे. इस कड़ी में नीतीश कुमार को कुर्मी,क्वोइरी सहित अगड़ी जाति का भरपूर सहयोग मिला जो लालू प्रसाद के राज करने को तौर तरीकों से ऊब चुके थे.

तेजस्वी के नेतृत्व में आरजेडी वही सपोर्टबेस साल 1995 की तर्ज पर चाहती है ताकी प्रदेश में आरजेडी का शासन कायम हो सके. बिहार की राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले डॉ संजय कुमार कहते हैं कि नीतीश कुमार ने ओबीसी को तोड़कर ईबीसी (EBC) बनाया और लालू की लंका को इसी दम पर राख कर दिया. जाहिर है पिछले कई चुनावों में मिली हार की वजह तेजस्वी समझ चुके हैं इसलिए इस कड़ी में वो पार्टी का जनाधार बढ़ाने की फिराक में अतिपिछड़े और दलित को जोड़ने की फिराक में लग गए हैं.

साल 1995 की तर्ज पर जनाधार पाने की है कोशिश
आंकड़ों के मुताबिक 14 फीसदी यादव और 16.9 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं के अलावा आरजेडी 26 फीसदी अतिपिछड़ा और 16 फीसदी दलित समाज में भी अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है ताकी साल 1995 की तर्ज पर तेजस्वी अपने पिता की तरह बिहार की सत्ता तक पहुंचने में कामयाब हो सकें. इसलिए आरजेडी अब एमवाई समीकरण के अलावा ईबीसी, दलित और सवर्णों को भी साथ लाने की बात जोरशोर से करने लगी है.

बीजेपी के बिहार प्रदेश के प्रवक्ता डॉ रामसागर सिंह कहते हैं कि आरजेडी यह सपना देखना छोड़ दे क्योंकि उनके शीर्ष नेता लालू प्रसाद, कर्पूरी ठाकुर को कपटी ठाकुर कहकर बुलाया करते थे जबकि हाल में जीतनराम मांझी और मुकेश साहनी का अपमान अतिपिछड़ा और दलित समाज पूरी तरह देख चुका है.

Related Posts