Bihar Election Special: एक ऐसा आंदोलन जिसने जमी-जमाई कांग्रेस को बिहार में उखाड़ दिया

आज के अंक में आप 1972 के बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Election) और उसके बाद के बिहार के बारे में जानेंगे.

बिहार विधानसभा चुनाव से जुड़ा प्रतीकात्मक फोटो.

बिहार विधानसभा चुनाव, 1972, कई मायने में अनोखा रहा. ठीक एक साल पहले 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने एक बड़े नेता के रूप में अपने को स्थापित कर किया था और इंदिरा गांधी की कांग्रेस (R) भारी बहुमत से जीती. 1969 में इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी से निष्काषित कर दिया गया था जिसका नतीजा हुआ पार्टी का विभाजन. 1971 चुनाव में कांग्रेस (O) हाशिए पर चली गई और चुनाव में भारी सफलता के बाद चुनाव आयोग ने कांग्रेस (R) को असली इंडियन नेशनल कांग्रेस के रूप में मान्यता दे दी. फिर आया, पाकिस्तान के साथ युद्ध जिसमें भारत ने ना सिर्फ पाकिस्तान को पराजित किया बल्कि भारत की मदद से बंगलादेश एक स्वतंत्र देश के रूप में स्थापित हुआ.

1972 में आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव हुआ, पर बिहार में पूरे देश के मुकाबले नज़ारा कुछ अलग ही दिखा. पूरा देश राष्ट्रप्रेम की भाव में ओतप्रोत था. गोवा को छोड़ कर बाकी सभी राज्यों में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत मिला, पर बिहार में एक बार फिर से पार्टी संघर्ष करते दिखी. 318 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में दो बार बहुमत से वंचित रहने के बाद कांग्रेस पार्टी को बहुमत तो मिला, पर बहुत ही मुश्किल से. पार्टी के कुल 167 विधायक चुन कर आए और केदार पांडेय के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार का गठन हुआ. पांच सालों में तीन मुख्यमंत्री बदले जो बाद के दिनों में इंदिरा गांधी की कार्यशैली का एक अहम हिस्सा बना.

केदार पांडेय मुख्यमंत्री पद पर 16 महीने से थोड़े कम समय तक काबिज़ रहे और फिर बारी आई अब्दुल गफूर की. अब्दुल गफूर 21 महीने पदासीन रहे और उनकी भी छुट्टी हो गई. गफूर की कुर्सी जाने का एक बड़ा कारण रहा राज्य प्रशासन की लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हो रहे सम्पूर्णक्रांति आन्दोलन से प्रभावशाली तरीके से निपटने में पूर्ण विफलता. बिहार से मार्च 1974 में शुरू हुआ आन्दोलन पूरे देश में फैलता जा रहा था और इंदिरा गांधी के अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही थी. गफूर के छुट्टी के बाद बारी आयी जगन्नाथ मिश्र की.
इंडिया गांधी को जगन्नाथ मिश्र से खतरा कम दिख रहा था. वह केंद्रीय मंत्री और इंदिरा गांधी के खास करीबी ललित नारायण मिश्र के छोटे भाई थे. इसी बीच एक ऐसी घटना घटी जो भारतीय राजनीति के इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो चुकी है — इलाहाबाद हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला.

1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी राय बरेली से चुनाव जीतीं, उनके चुनाव को समाजवादी नेता राजनारायण ने कोर्ट में चुनौती दी. उनका आरोप था इंदिरा गांधी के चुनाव में सरकारी तंत्र का दुरुपयोग किया, इसे कोर्ट ने को मान लिया और इंदिरा गांधी का चुनाव 12 जून 1975 के अपने फैसले से खारिज कर दिया. इंदिरा गांधी पर प्रधानमंत्री पद छोड़ने का दबाव बढ़ता जा रहा था. एक तरफ जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्णक्रांति का दबाव और दूसरी तरफ कोर्ट का फैसला. इसका जवाब इंदिरा गांधी ने अपने ही तरीके से दिया और कोर्ट का फैसला आने के 13 दिन बाद देश में इमरजेंसी लगा दी गई.

जगन्नाथ मिश्र पूरे इमरजेंसी के दौर में बिहार मुख्यमंत्री के पद पर आसीन रहे और उन्होंने वही किया जिसका उन्हें नई दिल्ली से आदेश मिलता था. 16 से 20 मार्च के बीच लोकसभा चुनाव हुआ और 23 मार्च 1977 को इमरजेंसी हटा ली गई. मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी. लगभग सारे देश में कांग्रेसी सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया और जगन्नाथ मिश्र सरकार की भी 30 अप्रैल को छुट्टी हो गयी. एक बार फिर से बिहार में राष्ट्रपति शासन लगा जो लगभग दो महीने तक चला.

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जहां तक बिहार के 1972 विधानसभा चुनाव की बात है, कांग्रेस पार्टी का सीपीआए के साथ गठबंधन था. सीपीआए 55 सीटों पर चुनाव लड़ी और 35 पर उसके विधायक चुने गए. कांग्रेस पार्टी और सीपीआई का गठबंधन इमरजेंसी के दिनों में भी चलता रहा. सीपीआई पर सोवियत यूनियन का दबाब था और पार्टी के पास कोई और विकल्प के आभाव में सीपीआई को कांग्रेस पार्टी को समर्थन देते रहने पड़ा. आने वाले दिनों में इमरजेंसी में कांग्रेस पार्टी को समर्थन सीपीआई के लिए भरी पड़ा और पार्टी ने प्रमुख वामपंथी पार्टी होने का अवसर सीपीएम को दे दिया.
भारतीय जनसंघ को 1972 में नौ सीटों का नुकसान उठाना पड़ा और भगवा झंडा 25 सीटों पर ही लहराया. कांग्रेस (ओ) को 30 सीटों पर विजय हासिल हुई, और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी आंकड़ा 52 से 33 सीटों पर आ गया.

1972 के चुनाव की सबसे अनोखी घटना ऐसी थी जिसका जिक्र करना ज़रूरी है. चाहे वह दौर इंदिरा गांधी का रहा हो, पर पहली बार बिहार विधानसभा में कोई भी महिला उम्मीदवार जीतने में सफल नहीं रहीं जब कि कुल मिला कर 45 महिला उम्मीदवार चुनावी मैदान में थीं.
और एक मजेदार बात रही चार सीटों पर सीधा मुकाबला, क्योकि चुनावी मैदान में सिर्फ दो ही उमीदवार थे. उसमें से उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का पारू विधानसभा क्षेत्र भी था जहां पांच मे से तीन उम्मीदवारों ने नामांकन वापस ले लिया, मैदान में रहे कांग्रेस के प्रत्याशी बीरेन्द्र कुमार सिंह और जनसंघ के राम देव ओझा. बीरेन्द्र कुमार सिंह को 91 प्रतिशत मत मिले और ओझा की जमानत जब्त हो गयी.
अगले लेख में हम देखेंगे कि क्या असर रहा जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्णक्रांति का बिहार के चुनाव पर और कैसे बिहार की जनता ने इमरजेंसी में हुए कथित ज्यादतियों का कांग्रेस पार्टी से बदला लिया?

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