केंद्र के तीन विधेयकों के खिलाफ सड़कों पर किसान, अन्नदाताओं को सता रहा बड़ी कंपनियों के एकाधिकार का डर

भारत सरकार का कहना है कि ये विधेयक किसानों का काम आसान करने के लिए लाए गए हैं. इनके पास हो जाने के बाद किसानों को मंडियों के बाहर बेरोकटोक अपनी फसल बेचने की आजादी होगी.
Farmers on streets against three bills of Center, केंद्र के तीन विधेयकों के खिलाफ सड़कों पर किसान, अन्नदाताओं को सता रहा बड़ी कंपनियों के एकाधिकार का डर

पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना में हजारों की तादाद में किसान धरने पर बैठे हैं. इसकी वजह- ये किसान भारत सरकार की तरफ से जून महीने में लाए गए तीन अध्यादेशों यानी ऑर्डिनेंस का विरोध कर रहे हैं, जो सरकार कृषि उत्पाद को बेचने में होने वाली कई परेशानियों को दूर करने के लिए लाई थी.

आज हम जानने की कोशिश करेंगे कि किसान क्यों नाराज हैं? और भारत सरकार अपनी सफाई में क्या कह रही है. सोमवार 14 सितंबर को इन अध्यादेशों से संबधित विधेयक को संसद में पेश किया गया.

इन विधेयकों के नाम हैं:

  • किसानों के उत्पाद, व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक
  • मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा विधेयक पर किसानों (सशक्तीकरण और संरक्षण) समझौता विधेयक
  • आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक

इनमें से तीसरा बिल तो लोक सभा में 15 सितंबर को पास भी हो गया.

भारत सरकार का कहना है कि ये विधेयक किसानों का काम आसान करने के लिए लाए गए हैं. इनके पास हो जाने के बाद किसानों को मंडियों के बाहर बेरोकटोक अपनी फसल बेचने की आजादी होगी. इसके साथ ही किसान प्राइवेट प्लेयर्स के साथ बुवाई के पहले ही अपनी फसल बेचने का कॉन्ट्रैक्ट भी कर सकेंगे.

किसानों को कृषि उत्पाद कंपनियों पर आश्रित होने का डर

दूसरी ओर किसानों को डर है कि इन विधेयकों के कानून बन जाने से MSP यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस की व्यवस्था को खत्म करने का रास्ता खुल जाएगा और किसान बड़ी कृषि उत्पाद कंपनियों के रहमो करम पर आश्रित हो जाएंगे.

पंजाब की कांग्रेस सरकार ने तो इन बिलों को संविधान की संघीय व्यवस्था पर हमला बताया है और विधानसभा में एक प्रस्ताव पास कर इनको अस्वीकार कर दिया है.

इन चार मुद्दों पर सबसे ज्यादा नाराज हैं किसान

किसान सबसे ज्यादा नाराज हैं, पहले बिल के प्रावधानों को लेकर. खासतौर पर “ट्रेड एरिया”, “ट्रेडर”, “डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन” और “मार्केट फी” वाले सेक्शंस को लेकर.

ट्रेड एरिया से APMC मंडियों को बाहर रखने पर नाराजगी

असल में पहले बिल में “ट्रेड एरिया” की परिभाषा में से राज्यों की एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी यानि APMC एक्ट के अंतर्गत
अभी चल रही मंडियों को बाहर रखा गया है. भारत सरकार का कहना है कि मंडियों के बाहर अतिरिक्त ट्रेड एरिया के प्रावधान से किसानों को
अपना माल, वो जिसको चाहें उसे बेचने की आजादी मिलेगी.

बिल का विरोध कर रहे किसानों के अनुसार “ट्रेड एरिया” की नई परिभाषा से APMC मंडियां अपनी जमीन की सीमा की हद से बंध जाएंगी. इससे कृषि उत्पाद के बड़े खरीदारों यानी कॉर्पोरेट्स को किसानों का माल खरीदने में आसानी हो जाएगी. इन किसानों का कहना है कि APMC मंडी व्यवस्था अच्छे से काम कर रही है. साथ ही ये अपने आसपास के 200 से 300 गांवों के किसानों को अपना माल बेचने की सुविधा देती है.

पैन कार्ड के सहारे ट्रेडर पर किसान कैसे करें विश्वास?

फिर इस विधेयक में “ट्रेडर” की परिभाषा में सिर्फ किसान का माल खरीदने वाले को ही नहीं, बल्कि प्रोसेसर, एक्सपोर्टर, होलसेलर, मिलर और रिटेलर को भी शामिल किया गया है.

भारत सरकार के अनुसार कोई भी ट्रेडर, जिसके पास अपना पैन कार्ड हो ट्रेड एरिया में किसान का माल खरीद सकता है. इसका मतलब हुआ कि एक ट्रेडर APMC मंडी या ट्रेड एरिया दोनों में खरीदारी कर सकता है, लेकिन राज्य APMC एक्ट के अनुसार मंडी में खरीदारी करने के लिए ट्रेडर को लाइसेंस लेना पड़ता है या रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है. अभी मौजूद मंडी व्यवस्था में आढ़ती यानी कमीशन एजेंट्स लाइसेंस लेकर मंडी में खरीदारी करते हैं.

विधेयकों के विरुद्ध खड़े किसानों का कहना है कि आढ़तियों की माली हालत की विश्वसनीयता लाइसेंस लेते समय चेक की जाती है, लेकिन सिर्फ एक पैन कार्ड के सहारे खरीदारी करने आए ट्रेडर पर किसान कैसे विश्वास कर सकते हैं?

आढ़तियों का सवाल करने की एक वजह यह भी है कि यह किसान आंदोलन पंजाब और हरियाणा में सबसे तेज है, क्योंकि आढ़ती सबसे ज्यादा यहीं मजबूत हैं.

मार्केट फी को लेकर भी खफा हैं किसान

विरोध कर रहे किसान “मार्केट फी” को लेकर भी खफा हैं, लेकिन भारत सरकार के अनुसार यह प्रावधान खरीदारी और बिकरी का खर्च कम करेगा, जिससे किसान और खरीदार दोनों को फायदा होगा.

अभी मौजूदा व्यवस्था में पंजाब जैसे राज्यों में यह कॉस्ट ऑफ ट्रांजैक्शन लगभग साढ़े आठ प्रतिशत रहता है. इसमें तीन प्रतिशत मार्केट फी, तीन प्रतिशत ग्रामीण विकास चार्ज और आढ़ती का ढाई फीसदी कमीशन शामिल है.

सरकार कॉर्पोरेट्स को फायदा पहुंचाने की कर रही कोशिश

विरोधी किसानों का कहना है कि ट्रेड पर से मार्केट फी हटा कर भारत सरकार कॉर्पोरेट्स को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रही है. उनके अनुसार नए प्रावधान, APMC मंडियों को ट्रेड के समान अधिकार या लेवल प्लेइंग फील्ड नहीं दे रहे हैं. इन किसानों के अनुसार एक बार जब APMC मंडी सिस्टम ध्वस्त होने लगेगा, तो कॉर्पोरेट्स को भारी लाभ मिलेगा.

इसके विपरीत भारत सरकार का कहना है कि राज्यों को मंडियों में खरीदारी में आने वाले खर्च को कम करना चाहिए. सरकार के अनुसार अगर राज्य सरकारें मुफ्त बिजली और अन्य सब्सिडी दे सकती हैं, तो किसानों को भी अपनी फसल बेचने के लिए किसी खर्च की जरूरत नहीं होनी चाहिए.

किसानों के हितों की रक्षा नहीं करता डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन

विरोधी किसानों को डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन व्यवस्था से भी परेशानी है. उनके अनुसार डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन का सेक्शन 8 किसानों के हितों की रक्षा नहीं करता. नए प्रावधानों में डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन के लिए क्षेत्र के सब डिविजनल मजिस्ट्रेट एक कॉन्सिलिएशन बोर्ड के गठन की व्यवस्था करेंगे. ये किसान चाहते हैं कि अगर वे कॉन्सिलिएशन बोर्ड के आदेश से असंतुष्ट हों, तो उन्हें सिविल कोर्ट में अपील का अधिकार मिलना चाहिए, जो इस बिल में नहीं है.

किसानों का आंदोलन हो और उसमे राजनीति न घुसे. ऐसा हो नहीं सकता. सो, इस मामले में भी विरोधी पार्टियां असंतुष्ट किसानों की हिमायत कर रही हैं, जबकि सरकार अपने स्टैंड पर कायम है कि नए कानून से किसान, ट्रेडर, और उपभोक्ता, तीनों को लाभ होगा.

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