BIHAR ELECTION 2020 : जीरादेई… जिसमें सिमटा है गर्व का इतिहास और बाहुबल का कलंक

एऩडीए (NDA) ने ये सीट जेडीयू (JDU)के हिस्से में डाल दी है, जिससे राजनीतिक कुश्ती और भी मजेदार हो गयी है. पिछली बार आरजेडी (RJD)और जेडीयू गठबंधन से रमेश सिंह कुशवाहा ने यहां जीत दर्ज की थी. इस बार जेडीयू से कमला कुशवाहा को टिकट मिला है.

सिवान की एक विधानसभा सीट है जीरादेई. इसके गर्भ में गर्व का इतिहास सिमटा है. लेकिन, बाहुबल का कलंक भी इसके माथे पर लगा है. यहां के एक आश्रम का नाम तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात है. कई बड़े डॉक्टरों ने तो यहीं से रिसर्च पूरी की है. कहने को तो पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का घर भी कह सकते हैं, लेकिन बाहुबली मोहम्मद शहाबुद्दीन की यह राजनीतिक धुरी रही है. भारत रत्न डॉ. राजेंद्र बाबू से प्रेरणा लेकर जगदीश दीन ने कुष्ठ रोगियों के लिए सेवाश्रम की स्थापना की थी. कुष्ठ पर यहां विदेश से भी कई चिकित्सकों ने रिसर्च की है. विधानसभा चुनाव को लेकर इस बार भी जीरादेई चर्चा में है.

माले-आरजेडी गठबंधन को लेकर यहां की राजनीति इस बार दिलचस्प हो चुकी है. बीजेपी नेता राजीव रंजन सिंह उर्फ बिट्टू सिंह की मतदाताओं के बीच पैठ भी लड़ाई को देखने लायक बना रही है. एऩडीए ने सीट जेडीयू के हिस्से में डाल दी है, जिससे राजनीतिक कुश्ती और भी मजेदार हो गयी है. पिछली बार आरजेडी और जेडीयू गठबंधन से रमेश सिंह कुशवाहा ने यहां जीत दर्ज की थी. इस बार जेडीयू से कमला कुशवाहा को टिकट मिला है.

कमला कुशवाहा की सफलता की ये वजह
जीरादेई की नौतन और मैरवा प्रखंड पर माले की मजबूत पकड़ है. जेडीयू की उम्मीदवार कमला कुशवाहा के पति संजय कुशवाहा भाकपा माले से जुड़े रहे हैं. मैरवा प्रखंड की सेमरा पंचायत की बरासो गांव के रहने वाले संजय कुशवाहा क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखते हैं. एक दौर था जब संजय माले के मजबूत कार्यकर्ता हुआ करते थे। माले कार्यकर्ताओं के बीच इसी वजह से उनकी गहरी पैठ है. इस चुनाव में आरजेडी और माले के बीच गठबंधन है. लेकिन, पुराने कार्यकर्ताओं के बीच आरजेडी विरोधी दल के रूप में अपनी छाप रखता है. ऐसे में इस गठबंधन को लेकर बड़ी संख्या में माले कार्यकर्ता और उनके सपोर्टर नाराज हैं. जाहिर है इस नाराजगी का सबसे ज्यादा फायदा कमला कुशवाहा को ही मिलने वाला है.

टिकट का ये है गुणा-भा
जीरादेई विधानसभा से कई नेता ताल ठोंक रहे हैं. पार्टी से बगावत कर मैदान में भी कुछ लोगों ने उतरने की तैयारी की है. बीजेपी के किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष बिट्टू सिंह भी प्रचार कर रहे हैं. आपराधिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले पूर्व जिला पार्षद विनोद तिवारी भी ताल ठोंक रहे है. बीजेपी के कुछ समर्थक आशा पाठक के पक्ष में गोलबंदी में जुटे थे. आरजेडी से अजय सिंह चौहान अपनी मजबूती साबित करने में जुटे हैं. लेकिन, माले से अरमजीत सिंह कुशवाहा का नाम सबसे आगे चल रहा है. राजनीतिक पंडितों की राय है कि अगर आरजेडी माले को यह सीट देती है तो रमेश सिंह कुशवाहा की राह आसान हो जाएगी.

परिसीमन का जाल
जीरादेई की भौगोलिक और सामाजिक संरचना में नए परिसीमन के तहत 2010 में बदलाव हुआ था. मैरवा और नौतन प्रखंड को इस विधानसभा में जोड़ा गया. बड़हरिया, हुसैनगंज और पचरुखी प्रखंड को हटा दिया गया. परिसीमन के इसी जाल की वजह से उस साल बीजेपी की आशा देवी ने माले के अमरजीत कुशवाहा को शिकस्त दी थी. ऐसे में इस बार भी परिसीमन का यह जाल गहरा असर छोड़ने वाला है.

2 बार यहां से विधायक रहा है शहाबुद्दीन
जीरादेई विधानसभा क्षेत्र का गठन 1977 में हुआ था. तब से अब तक इस सीट ने सभी दलों को सदन में भेजा है. कांग्रेस, जनता दल, जेडीयू और आरजेडी के प्रत्याशियों ने यहां से 2-2 बार जीत का स्वाद चखा है. बीजेपी और जनता पार्टी सेक्युलर के साथ ही निर्दलीय उम्मीदवार भी एक-एक बार जीते हैं. बाहुबली मोहम्मद शहाबुद्दीन 1990 में निर्दलीय चुनाव जीतकर यहीं से विधानसभा में पहुंचा था. अगले चुनाव में आरजेडी ने उस पर भरोसा जताया और टिकट दिया, जिस पर उसने जीत भी हासिल की थी. 2000 और 2005 में आरजेडी के एजाजुल हक ने बाजी मारी थी. 2005 में फिर हुए चुनाव में जेडीयू के श्याम बहादुर सिंह यहां से विधायक बने थे.

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