शिवसेना को याद आया वाजपेयी का समय, कहा- तब NDA के सभी दलों का होता था सम्मान

शिव सेना (Shiv Sena) ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार हवाई अड्डों, एयर इंडिया और रेलवे के निजीकरण की ओर बढ़ रही है. साथ ही किसानों के जीवन का नियंत्रण व्यापारियों और प्राइवेट प्लेयर्स के हाथों में दे रही है.

Shiv Sena
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किसानों से जुड़े तीन अध्यादेशों को विधेयक के रूप में पास कराने के बाद से केंद्र सरकार पर विपक्ष, किसान और खुद उसके सहयोगी काफी नाराज हैं. कभी NDA की साथी रही शिव सेना ने भी अर्थव्यवस्था, व्यापार और कृषि पर मोदी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाया है.

शिव सेना ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार हवाई अड्डों, एयर इंडिया और रेलवे के निजीकरण की ओर बढ़ रही है. साथ ही किसानों के जीवन का नियंत्रण व्यापारियों और प्राइवेट प्लेयर्स के हाथों में दे रही है.

पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र ने अपने सहयोगियों, किसानों के संगठनों या विपक्षी दलों के साथ बातचीत किए बिना ही कृषि पर बिल पेश किए. पार्टी ने आगे कहा कि केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल के इस्तीफे ने इस मुद्दे को सामने ला दिया है.

मुखपत्र सामना के जारिए साधा सरकार पर निशाना

दरअसल अपने मुखपत्र सामना के जरिए शिवसेना ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के समय में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की बात अलग थी, क्योंकि तब वे एनडीए के घटक दलों का सम्मान और हर मुद्दे पर उनके साथ परामर्श करते थे.”

“शिवसेना के बाद अब अकाली दल ने भी उठाया ऐसा ही कदम”

लेख में आगे कहा गया कि शिरोमणि अकाली दल (SAD) की सदस्य हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया है. मोदी सरकार दो किसान विरोधी बिल संसद में लाई और उन्होंने विरोध में इस्तीफा दे दिया. उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है. शिवसेना पहले ही एनडीए से बाहर निकल चुकी है और अब अकाली दल ने भी ऐसा ही कदम उठाया है.

हालांकि, बता दें कि शिरोमणि अकाली दल ने अभी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए से नाता नहीं तोड़ा है.

“वाजपेयी और आडवाणी के समय शब्दों का मूल्य होता था”

शिवसेना ने कहा “वाजपेयी और आडवाणी के समय में एनडीए के सहयोगियों का सम्मान, स्नेह और विश्वास के साथ व्यवहार किया जाता था. नीतिगत फैसलों पर परामर्श हुआ करता था और बीजेपी के नेता सहयोगी दलों के विचारों को सुनते थे. उस समय बोले गए शब्दों का मूल्य हुआ करता था. ”

इसमें आगे कहा गया कि महाराष्ट्र की तरह, पंजाब एक कृषि अर्थव्यवस्था है. इसलिए किसानों के विधेयकों को पेश करने से पहले, सरकार को किसान संगठनों, कृषि विशेषज्ञ, महाराष्ट्र, पंजाब और देश के बाकी हिस्सों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करनी चाहिए थी.

“इस सरकार का संवाद या परामर्श जैसे शब्दों से कोई लेना-देना नहीं”

सामना में आगे लिखा गया “सरकार का कहना है कि नए सिस्टम से किसानों को लाभ होगा. अब अगर कोई इसे सच मान भी ले, तो भी देश के कुछ प्रमुख किसान नेताओं के साथ विचार-विमर्श करने में हर्ज क्या था? इसमें कम से कम NCP प्रमुख शरद पवार के साथ तो बातचीत होनी चाहिए थी, लेकिन इस सरकार का ‘संवाद’ या ‘परामर्श’ जैसे शब्दों से कोई लेना-देना नहीं है.”

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