क्या विचारधाराओं में बंटी फिल्म इंडस्ट्री तो नहीं उत्तर प्रदेश में नई फिल्म सिटी के निर्माण का कारण?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ ने कहा कि हम सब की मानसिकता में भारतीयता होनी चाहिए. हमें भारतीयता से विमुख होने की जरूरत नहीं है. चर्चा का विषय है कि सीएम योगी ने फिल्म सिटी के संदर्भ में भारतीयता की बात क्यों की?

  • Vishnu Shankar
  • Publish Date - 5:10 pm, Thu, 24 September 20
फिल्म शूटिंग (FILE)

उत्तर प्रदेश (UP) में इस बात को लेकर काफी उत्साह है कि यहां नोएडा के पास एक फिल्म सिटी (Film City) या उससे भी ज्यादा महत्वाकांक्षी इंफोटेनमेंट सिटी का निर्माण होने वाला है. इस संबंध में 22 सितंबर को लखनऊ में एक बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने कहा कि यह फिल्म सिटी भारत की पहचान बन जाएगी और विगत में इस विषय में पिछली राज्य सरकारों द्वारा किए गए, लेकिन अधूरे रह गए वादों की पूरी भरपाई हो जाएगी. सीएम योगी का कहना था कि उत्तर प्रदेश भारत का सांस्कृतिक केंद्र है.

ध्यान देने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री ने कहा कि हम सब की मानसिकता में भारतीयता होनी चाहिए. हमें भारतीयता से विमुख होने की जरूरत नहीं है. अगर इस सोच के साथ काम करेंगे, तो उत्तर प्रदेश सरकार फिल्मकारों को पूरा समर्थन देगी.

आज चर्चा का विषय है कि सीएम योगी ने फिल्म सिटी के संदर्भ में भारतीयता की बात क्यों की? और इस प्रोजेक्ट में क्या-क्या होगा?

भारत में स्वाधीनता के बाद 2014 तक, जो भी सरकारें रहीं, उन्होंने शिक्षा, इतिहास, समाज और मीडिया में होने वाली सोच और चर्चा में वाम यानी लेफ्ट या वाम मध्य यानी सेंटर लेफ्ट विचारधारा का समर्थन किया. सिर्फ वाजपेई सरकार इसका अपवाद थी, लेकिन चूंकि वह एक मिली जुली सरकार थी, इसलिए वो भी इसी फॉर्मूले का अनुसरण करती रही.

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में दक्षिणपंथी तबके का हाल  

भारत के दक्षिणपंथी तबके ने हमेशा इस बात को रेखांकित किया है कि उसको अपनी बात कहने का मंच और अवसर गाहे-बगाहे ही मिलता है. दक्षिणपंथियों का तो कहना है कि जो लोग उनकी विचारधारा मानते हैं या उनसे हमदर्दी रखते हैं, उन्हें मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री निशाने पर लेकर उनका बहिष्कार करती है.

इसका ताजा उदाहरण कंगना रनौत हैं, जिन्होंने जब मोदी सरकार के समर्थन में बोलना शुरू किया, तो लेफ्ट विचारधारा के समर्थकों ने उन्हें निशाना बनाना शुरू कर दिया. अभिनेता अनुपम खेर और लेखक एवं कवि प्रसून जोशी भी इसी श्रेणी में आते हैं, जो अपनी विचारधारा के चलते इस समय हाशिये पर हैं.

फिल्म इंडस्ट्री का लेफ्ट विचारधारा की तरफ ज्यादा झुकाव! 

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का लेफ्ट विचारधारा के प्रति झुकाव एक लंबे समय से रहा है और यह फिल्मों में भी दिखता रहा है. 1950 और 60 के दशक में राज कपूर और बलराज साहनी की फिल्में हों या बीआर चोपड़ा और मोतीलाल की, सभी इसका उदाहरण हैं. हालांकि, ये सब क्या वाकई लेफ्ट विचारधारा में विश्वास करते थे? इस पर बहस की जा सकती है.

लेफ्ट विचारधारा में विश्वास करने वाली हस्तियों में ख्वाजा अहमद अब्बास, उत्पल दत्त, ऋत्विक घटक, सलिल चौधरी, कैफी आजमी और शौकत आजमी आदि के नाम लिए जा सकते हैं. वर्तमान समय में जावेद अख्तर, शबाना आजमी, फरहान अख्तर, स्वरा भास्कर, अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज, हंसल मेहता, नसीरुद्दीन शाह और अनुराग बासु आदि के नाम प्रमुख हैं.

यहां यह साफ करना जरूरी है कि हम यह बिलकुल नहीं कह रहे कि लेफ्ट या राइट की विचारधाराओं में एक सही और दूसरी गलत है. हम सिर्फ यह बतला रहे हैं कि पहले क्या होता था और अब क्या करने की कोशिश की जा रही है.

सेकुलरिज्म पर खास ध्यान देते हैं फिल्मकार

लेफ्ट की सोच से प्रेरित फिल्मकार अपनी कृतियों में सेकुलरिज्म पर खास ध्यान देते हैं. इसका ताजा उदाहरण देखने को मिलता है अनुराग बासु द्वारा निर्देशित काबुलीवाला में, जिसमें नन्ही बच्ची मिनी को नमाज पढ़ते दिखाया गया है क्योंकि काबुलीवाला कई दिनों से उससे मिलने नहीं आया है.

इस सीक्वेंस का जिक्र गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की मूल कहानी में है ही नहीं और दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों ने इस पर आपत्ति जताई है और इसे फेक सेकुलरिज्म की संज्ञा दी है.

कितनी साफ सुथरी होती है फिल्मों में होने वाली फंडिंग?

फिर, यह तथ्य किसी से भी अछूता नहीं है कि मुंबई में बनने वाली हिंदी फिल्मों, खास कर बड़े बजट वाली फिल्मों में होने वाली फंडिंग हमेशा साफ सुथरी नहीं होती. इसमें इन्वेस्ट करने में गल्फ यानी खाड़ी क्षेत्र के कई ऐसे लोग शामिल हैं, जिनका अंडरवर्ल्ड से घनिष्ठ नाता है. कहा तो यहां तक जाता है कि ये फाइनेंसर्स न सिर्फ एक एजेंडे के तहत काम करते हैं, बल्कि यह भी तय करते हैं कि कौनसे अभिनेता या अभिनेत्री ऐसी फिल्मों में काम करेंगे.

अब उत्तर प्रदेश में सरकार का प्रयास है कि न सिर्फ राज्य में एक वैकल्पिक फिल्म सिटी बने, बल्कि अभी तक मुंबई में निर्मित फिल्मों में जिस नैरेटिव यानी वृत्तांत को आगे किया जाता रहा है, उसका भी एक विकल्प तैयार हो.

गौर कीजिए कि योगी आदित्यनाथ द्वारा 22 सितंबर को बुलाई गई मीटिंग में बॉलीवुड का एक भी ‘A’ लिस्टर फिल्मी शख्सियत नहीं था, क्योंकि दक्षिणपंथी विचारधारा के समर्थक इन सब को लेफ्ट विचारधारा का हामी मानते हैं.

उत्तर प्रदेश में फिल्म सिटी के प्लान में क्या-क्या शामिल है?

राज्य के अधिकारियों का कहना है कि योजना सिर्फ फिल्म सिटी की नहीं है, बल्कि एक वर्ल्ड क्लास इलेक्ट्रॉनिक सिटी के निर्माण का प्लान है और एक फाइनेंशियल सिटी भी योजना का हिस्सा है. यह सब जानते ही हैं कि नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे के पास जेवर में एक अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट को बनाने के पहले चरण का काम तो शुरू भी हो चुका है.

स्थानीय अधिकारियों ने राज्य सरकार को दो योजनाएं भेजी हैं. एक ग्रेटर नोएडा में 500 एकड़ में स्थित है और दूसरी यमुना एक्सप्रेसवे पर 1000 एकड़ में.

पिछले कई सालों से उत्तर प्रदेश में फिल्मों के शूट होने में भी उत्तरोत्तर बढ़त हुई है. इसकी एक वजह उत्तर प्रदेश और बिहार की पृष्ठभूमि में लिखी गई कहानियां हैं और दूसरी वजह मनोरंजन कर में छूट और राज्य सरकार की 2 करोड़ रुपए तक की सब्सिडी है, जो फिल्मकारों को मिलती है. बशर्ते वो अपनी फिल्म का 75% हिस्सा उत्तर प्रदेश में शूट करें.

यूपी में फिल्म सिटी बनाने का राजनीतिक पहलू

उत्तर प्रदेश में वैकल्पिक फिल्म सिटी के निर्माण की एक और बड़ी वजह राजनीतिक है. सब जानते है कि महाराष्ट्र-मुंबई की क्षेत्रीय पार्टियां समय-समय पर भाषा और घरेलू और बाहरी लोगों की सियासत करती हैं और आप्रवासी होने के कारण उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को इसका निशाना बनाया जाता है.

अब उत्तर प्रदेश की सरकार यह संदेश भी दे रही है कि उसके और बिहार के बाशिंदों को भविष्य में काम की तलाश में मुंबई की राह पकड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

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यहां यह बताना जरूरी है कि उत्तर प्रदेश में पहले भी ऐसी घोषणाएं हुई हैं, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा है. योगी आदित्यनाथ का यह महत्वाकांक्षी प्लान कैसी शक्ल लेगा, इसे लोग ध्यान से देखेंगे.

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