बिहार: ओवैसी और देवेंद्र के साथ आने से चुनाव में बदलेगा सियासी गणित का फार्मूला!

बिहार (Bihar) में AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और देवेंद्र यादव (Owaisi and Devendra Yadav) के साथ आने के बाद तय है कि यादव और मुस्लिम वोट बैंक का बंटवारा होगा, जो RJD के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है.

  • IANS
  • Publish Date - 12:53 am, Wed, 23 September 20
AIMPLB Asaduddin Owaisi

ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और पूर्व सांसद देवेंद्र यादव की पार्टी समाजवादी जनता दल डेमोक्रेटिक (SJD) के मिलकर संयुक्त जनतांत्रिक सेकुलर गठबंधन (UDSA) बनाने और बिहार में चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद यह तय माना जा रहा है कि आने वाले राज्य विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) में लड़ाई अब रोचक होगी.

ओवैसी और SJD के साथ में, बिहार की राजनीति में प्रवेश करने को भले ही राजनीतिक दल खुले तौर पर परेशानी की वजह नहीं बता रहे हैं, लेकिन यह तय है कि इनके साथ आकर बिहार चुनाव लड़ने की घोषणा से सीमांचल क्षेत्रों (Seemanchal) में किसी भी पार्टी के लिए लड़ाई आसान नहीं होगी.

मुस्लिम मतदाताओं में सेंध लगाने की चाल

कहा जा रहा है कि ओवैसी (Asaduddin Owaisi) ने देवेंद्र यादव की पार्टी के साथ गठबंधन कर बिहार के यादव और मुस्लिम मतदाताओं में सेंध लगाने की चाल चली है. मुस्लिम और यादव मतदाता RJD के परंपरागत वोट बैंक माने जाते हैं.

संयुक्त जनतांत्रिक सेकुलर गठबंधन (UDSA) ने हालांकि अब तक सीटों की संख्या तय नहीं की है, लेकिन माना जा रहा है कि कोसी और पूर्णिया क्षेत्रों में यह गठबंधन अपने उम्मीदवार उतारेगी. सीमांचल की 15 से 17 सीटों पर मुसलमान मतदाता जहां निर्णायक होते हैं वहीं कई ऐसी सीटें भी हैं, जहां मुस्लिम मतदाता नतीजों को प्रभावित करते हैं.

‘RJD को हो सकता है मुस्लिम वोटों का नुकसान’

मालूम हो कि पिछले चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने छह सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे और सभी उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा था. पांच सीटों पर तो उनके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी. 2019 में किशनगंज सीट पर हुए उपचुनाव में AIMIM के कमरूल होदा (Kamrul Hoda) ने जीत दर्ज की थी.

राजनीति के जानकार और किशनगंज के वरिष्ठ पत्रकार रत्नेश्वर झा भी कहते हैं कि ओवैसी और देवेंद्र यादव (Owaisi and Devendra Yadav) के साथ आने के बाद तय है कि यादव और मुस्लिम वोट बैंक का बंटवारा होगा, जो RJD के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है. उनका कहना है कि UDSA के निशाने पर जो मतदाता होंगे, वह महागठबंधन के वोट माने जाते रहे हैं, इसलिए UDSA जितने भी वोट पाएगी, वह महागठबंधन को ही नुकसान पहुंचाएगा.”

कहा जा रहा है कि ओवैसी के प्रचार का तरीका आक्रामक और ध्रुवीकरण पैदा करने वाला रहा है, ऐसे में ओवैसी का प्रभाव बिहार के अन्य क्षेत्रों में भी पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी.

बिहार में दो धाराओं के बीच लड़ाई है : RJD

इधर, RJD के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी (Mrityunjay Tiwari) किसी तरह के नुकसान को नकारते हुए कहते हैं, “बिहार में दो धाराओं के बीच लड़ाई है. इसके अलावा जो भी लोग इस चुनाव में आ रहे हैं, वह किसके इशारे पर आ रहे हैं, यहां के लोगों को इसका पता है. BJP के खिलाफ लड़ाई को जो भी कमजोर करने की कोशिश करेगा, उसको यहां की जनता खुद जवाब देगी.”

RJD भले ही UDSA को खारिज कर रहा हो, लेकिन उनके मुस्लिम और यादव वोट बैंक में कुछ सेंध लगना तय है. ओवैसी के मुस्लिम बहुल इलाकों में उम्मीदवार उतारने का कुछ हद तक फायदा BJP को मिल सकता है. यह तय है कि सभी मुसलमान ओवैसी को वोट नहीं देंगे और वोटों का बंटवारा होगा.

‘ओवैसी जैसे नेता करते हैं तुष्टिकरण की राजनीति’

इधर, BJP के प्रवक्ता डॉ. निखिल आनंद (Nikhil Anand) ने BJP को लाभ मिलने को लेकर कहा, “ओवैसी जैसे नेता तुष्टिकरण की राजनीति से मुसलमानों की भावनाएं भड़का कर वोट पाने की जुगत में रहते हैं. बिहार की जनता ऐसे नेताओं की विचारधारा को समझती है.” उन्होंने कहा कि NDA इस चुनाव में धर्म और जाति के आधार पर राजनीति करने वालों की राजनीति खत्म कर देगी. उन्होंने कहा कि यह चुनाव बिहार के विकास (Development of Bihar) के लिए चुनाव है. (IANS)