स्कूल में अछूत लड़के से स्वीडिश सरकार में आर्ट एडवाइजर तक, जानिए डॉ. पीके महानंदिया का सफ़र

डॉक्टर पीके महानंदिया (Dr PK Mahanandia) स्वीडन में एक कलाकार के रूप में विख्यात हैं और स्वीडिश सरकार के लिए कला और संस्कृति के सलाहकार के रूप में काम करते हैं.
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समय-समय पर ऐसे कई उदाहरण सामने आते रहते हैं जो लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन जाते हैं. मशहूर माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर (Twitter) पर आजकल ऐसे ही एक शख्स की कहानी लोकप्रिय हो रही है, जो लोगों को यह संदेश देने के लिए काफी है कि मेहनत और लगन से सबकुछ हासिल किया जा सकता है.

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ट्विटर पर एक यूजर ने सिलसिलेवार ट्वीट्स के जरिए डॉक्टर पीके महानंदिया (Dr PK Mahanandia) की कहानी शेयर की है. प्रद्युम्न कुमार महानंदिया का जन्म ओडिशा के कंधापाड़ा गांव में हुआ था. एक दलित परिवार से होने के कारण स्कूल में उन्हें दूसरे विद्यार्थियों से अलग बैठाया जाता था, सभी बच्चे भी उनसे दूरी बनाकर रहते थे. स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने 1971 में दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट्स में दाखिला लिया. वहां उन्होंने फाइन आर्ट्स की पढाई स्कॉलरशिप पर की, लेकिन इस दौरान उन्हें कई तकलीफों का सामना करना पड़ा.

नहीं मिलती थी दलित होने के कारण नौकरी

स्कॉलरशिप के पैसे समय पर न पहुंचने के कारण जहां महानंदिया को फीस भरने में दिक्कत होती थी, वहीं दलित होने के कारण कोई उन्हें नौकरी भी नहीं देता था. पीके महानंदिया की जिंदगी उस दिन बदल गयी जब USSR की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री वेलेंटिना ट्रेस्कोवा भारत आयीं. डॉ. पीके ने वेलेंटिना ट्रेस्कोवा का स्केच बना कर उन्हें भेंट किया, जिसकी चर्चा तमाम अख़बारों में हुई. जिसके बाद उन्होंने विभिन्न लोकप्रिय स्थानों पर आने वाले टूरिस्ट का स्केच बनाना शुरू किया.

17 दिसंबर 1975 को पीके महानंदिया स्वीडन की एक छात्रा वॉन शेडिन (Von Schedvin) से मिले, जो 22 दिनों तक ड्राइव कर डॉ. पीके से मिलने के लिए भारत आई थी. उस मुलाकात ने उनके जीवन को बदल दिया और मिलने के बस 3 दिनों बाद दोनों ने एक-दूसरे से शादी कर ली. वॉन शेडिन को अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए स्वीडन लौटना था और प्रद्युम्न को यहां अपनी पढ़ाई पूरी करनी थी. दूर रहने के दौरान दोनों पत्रों के माध्यम से एक-दूसरे के संपर्क में रहे.

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5 महीने साइकिल चलाकर पत्नी के पास स्वीडन पहुंचे थे डॉक्टर पीके

एक दिन पीके महानंदिया ने अपनी पत्नी से मिलने के लिए स्वीडन जाने की ठानी, जिसके बाद उन्होंने अपना सबकुछ बेचकर एक सेकंड हैंड साइकिल खरीदी. साइकिल चलाकर अपनी पत्नी के पास स्वीडन तक पहुंचने में उन्हें 5 महीने लगे. फ़िलहाल डॉक्टर पीके महानंदिया स्वीडन में एक कलाकार के रूप में विख्यात हैं और स्वीडिश सरकार के लिए कला और संस्कृति के सलाहकार के रूप में काम करते हैं.

उनके चित्रों को दुनिया के प्रमुख शहरों में प्रदर्शित किया गया है और प्रतिष्ठित यूनिसेफ ग्रीटिंग कार्ड पर जगह मिली है. 4 जनवरी 2012  को भुवनेश्वर के संस्कृति उत्कल विश्वविद्यालय ने पीके महानंदिया को डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया.

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