मिलिए भारत की ‘बेयर ग्रिल्स’ से, 68 साल की उम्र में नाप दिए 65 मुल्क

एडवेंचर की शौकीन चेन्नई की महालिंगम 65 देशों की यात्रा कर चुकी हैं. उनके पास 6 देशों के पासपोर्ट हैं.

नई दिल्ली: देश में एडवेंचर के शौकीन लोगों की कमी नहीं है लेकिन चेन्नई की सुधा महालिंगम ने कुछ ऐसा किया जिससे उनकी वाहवाही हो रही है. एडवेंचर की शौकीन सुधा अब तक 65 देशों की यात्रा कर चुकी हैं. उनके पास 6 देशों के पासपोर्ट हैं.

‘अपने ब्यूरोक्रेट पति के साथ यूरोप के कई देशों में घूमी’

सुधा बताती हैं, ‘मैं पहली बार अपने परिवार के साथ महाबलिपुरम गई तो वहां जिप्सियों की गाड़ी में विभिन्न देशों के झंडे देखे. वह झंडे देखकर उन सभी देशों में घूमने की इच्छा जागी और वहीं से यह सफर शुरू हुआ. मैं तो बस इतना चाहती थी कि किसी ग्रुप के साथ जुड़ जाऊं, जिनके साथ मैं अपनी एडवेंचरस लाइफ जी सकूं.

जब मैं पत्रकार थी तब अपने ब्यूरोक्रेट पति के साथ यूरोप के कई देशों में घूमी थी लेकिन यह वो सपना नहीं था, जो मैंने बचपन में देखा था. अकेले घूमने का, अकेले जगहों को एक्सप्लोर करने का.  सुधा के पति ब्यूरोक्रेट थे. उनके पति की अलग-अलग देशों में तैनाती होती थी.

इस दौरान सुधा को सैर करने की और ज्यादा इच्छा होने लगी. लेकिन इन सबके बावजूद उनकी एडवेंचर ट्रिप की इच्छा पूरी नहीं हो पाती थी.

‘प्रकृति की उस अनछुई खूबसूरती को महसूस करना चाहती थी’

सुधा बताती हैं कि पति के साथ होने वाली ये ट्रिप बेहद फॉर्मल होती थी, जहां फाइव स्टार होटल में बुकिंग होती थी, सभी प्लान पहले ही बन जाते थे, ड्राइवर हमेशा कहीं ले जाने के लिए तैयार रहता था और रातें एक आरामदायक कमरे में कट जाती थीं. लेकिन मैं तो प्रकृति की उस अनछुई खूबसूरती को महसूस करना चाहती थी, जिसमें कोई प्लान नहीं होता और कुछ भी पहले से निर्धारित नहीं होता.

‘कैलाश मानसरोवर यात्रा ने बहुत कुछ सिखाया’

मेरे जीवन में अकेले घूमने का मौका पत्रकारिता छोड़ने के बाद लगभग 45 साल की उम्र के आसपास आया. पत्रकारिता छोड़ने के बाद मैंने ऊर्जा विभाग में इंस्टिट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालसिस विभाग के लिए काम करना शुरू किया. इस दौरान मुझे काम के सिलसिले में अकेले अलग-अलग जगहों पर ट्रैवल करने का मौका मिला. यहीं से मेरा ट्रैवलिंग का सफर शुरू हुआ. बिना किसी बुकिंग के, सुदूर इलाकों में, सीमित बजट में हॉस्टल में रहते हुए एडवेंचरस जगहों को खोजने का मजा ही कुछ और है.
कैलाश मानसरोवर यात्रा ने बहुत कुछ सिखाया

‘अब मैं किसी चीज ने नहीं डरती’

सुधा ने 1996 में एक कैलाश मानसरोवर की यात्रा की. जोकि सोलो ट्रिप थी. यह यात्रा 32 दिनों की थी. उन्होंने बताया कि मुझे आज भी याद है कि कैसे इस यात्रा के दौरान मेरा पांच साल का छोटा बेटा साड़ी लपेटकर सोता था. इस अनुभव ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है. इसने मुझे अकेले कोई भी करने के लिए सीखने में बहुत मदद की है. इस दौरान मैंने अहसास किया कि अब मैं किसी चीज ने नहीं डरती.

‘मैं ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियल रीफ का अनुभव कभी नहीं भूल सकती’

उन्होंने बताया कि कश्मीर में फायरिंग करते आतंकवादी, मैंने इन सबका सामना किया है. हालांकि, मैं ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियल रीफ का अनुभव कभी नहीं भूल सकती जब एक वक्त के लिए लगा कि यह आखिरी यात्रा है. दरअसल, मैं लेडी इलियट आईलैंड पर पर डाइविंग के लिए गई थी. सर्टिफाइड होने के बावजूद मैं कोई प्रफेशनल और अनुभवी डाइवर नहीं थी लेकिन मैं जिन फोटोग्राफर्स के साथ समुद्र की यात्रा कर रही थी वह सभी लंबे समय से यह काम करते आ रहे थे.

खौफनाक ट्रिप का जिक्र

सुधा ने अपनी सबसे ज्यादा खौफनाक ट्रिप का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि इंस्ट्रक्टर में बताया कि समुद्रतल 40 फीट गहरा है और तुम्हारे सिलेंडर में 50 मिनट तक के लिए ऑक्सीजन है. इसके खत्म होने से पहले तुम्हें वापस आना होगा. हालांकि, इन सबके दौरान मैंने यह नहीं नोटिस किया कि मेरे बाकी साथियों के पास दो ऑक्सीजन सिलेंडर है मतलब वे 100 मिनट तक समुद्र में रह सकते थे. ऐसे में जब मैं पानी की सरफेस पर आई तो देखा कि आसमान में काले बादल हैं और लहरों का प्रवाह बहुत तेज है.

‘एक नाव आई तब जाकर मेरी जान बची’

मुझे तैरते रहने में दिक्कत हो रही थी. लगभग एक घंटे तक किसी तरह पानी के अंदर बाहर डुबकी लगाती रही और काफी सारा खारी पानी मुंह में चला गया. इस दौरान मुझे अहसास हुआ कि यह मेरी आखिरी यात्रा है, अब बचने की कोई उम्मीद नहीं है. मैं डूबने वाली हूं. तभी एक नाव आई तब जाकर मेरी जान बची. वह पहला मौका था जब मैं जरा सा डरी थी.
एक ऐसा ही अनुभव इंडोनेशनिया और मलयेशिया में बीच फैले बोर्नेयो के जंगलों में हुआ था.

‘हार मत मानों और न ही कभी रुको’

2012 में मुझे बोर्नेयो वर्षावन जाने का मौका मिला. इस दौरान जहरीले फंगस, घातक जोंक और जानलेवा चीटियों के बीच होकर गुजरना बेहद डरावना था. इन सबके बावजूद मैं कहूंगी कि वहां का अनुभव कमाल का था. सभी की मदद से ही यह मुमकिन हो पाता है कि मैं साल में 5-6 जगहों पर घूम पाती हूं.

मेरी घूमने की लिस्ट में अगली जगह मेडागास्कर है और उसके बाद पेटागोनिया. जो महिलाएं ट्रैवल करना चाहती हैं उन्हें मैं यही संदेश देना चाहती हूं कि हम अपनी सीमाएं खुद बनाते हैं. अगर आप सपने बड़े देखोगे तो उन सभी जगहों पर जा सकते हो जहां जाना चाहते हो. कई बार इसमें आप असफल भी होगी लेकिन अंदर की आग जलती रहनी चाहिए. हार मत मानों और न ही कभी रुको.

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