दर्द को हराकर जीता मां का प्यार और गोल्ड मेडल, पढ़िए प्रियंका की Success Story

उनका (Priyanka Goswami) कहना है कि देश की आधी आबादी ये तक नहीं जानती कि रेस वॉकिंग (Racewalking) क्या होती है. लोग रेसवॉकर्स पर हंसते हैं और ये स्पोर्ट्स चुनने के लिए उनकामजाक उड़ाते हैं.
priyanka goswami choose racewalking, दर्द को हराकर जीता मां का प्यार और गोल्ड मेडल, पढ़िए प्रियंका की Success Story

रेस वॉकर प्रियंका गोस्वामी (Priyanka Goswami) ने टोक्यो ओलंपिक (Tokyo Olympic) में जाने के लिए काफी मेहनत की थी. पर फरवरी में हुए क्वालिफाइंग इवेंट में वे केवल 38 सेकेंड से मात खा गईं और उनका टोक्यो ओलंपिक्स में जाने का सपना टूट गया. हालांकि, प्रियंका इतनी कमजोर नहीं हैं कि वो अभी तक इस बात को दिल पर लगाए बैठी रहें. प्रियंका एक ऐसी एथलीट हैं, जिन्होंने समाज की पाबंदियों को पीछे छोड़ अपने सपनों को जिया है.

24 वर्षीय प्रियंका उत्तर प्रदेश के मेरठ की रहने वाली हैं. वे 20 किलोमीटर कैटेगरी के रेस वॉकर (Racewalker) हैं. रेसवॉकिंग एक ऐसे स्पोर्ट्स हैं, जिसमें एक एथलीट न तो भागता है और न ही चलता है. यह खेल भागने और चलने दोनों का मिक्सअप होता है. प्रियंका बताती हैं कि कैसे उन्होंने पेट्रियार्की और अपने मेंस्ट्रुअल दर्द से जंग जीती. प्रियंका कहती हैं कि उनका परिवार बहुत ही सपोर्टिव रहा है. उनके माता-पिता ने उनकी और उनके भाई परवरिश बराबर की है. उन्होंने हमेशा प्रियंका को वो करने की छूट दी जिसमें उनकी इच्छा थी.

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रेस वॉकिंग चुनने के लिए लोगों ने उड़ाया मजाक

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प्रियंका जब 9वीं क्लास में थीं जब उन्होंने एथलीट बनने की प्रैक्टिस शुरू की. हालांकि इससे पहले तीन साल वे जिमनास्ट करती थीं, लेकिन कुछ परिस्थितियों के कारण उन्हें यह छोड़ना पड़ा. प्रियंका नहीं जनती थीं, कि एथलीट में एनरोल कराने से उनकी लाइफ एकदम ही बदल जाएगी. उस समय डिस्ट्रिक्ट लेवल का कॉम्पटीशन होना था. पर प्रियंका उसमें क्वालिफाई नहीं कर पाईं. इसके बाद उनके कोच ने उन्हें वॉकिंग कैटेगरी में हिस्सा लेने की सलाह दी. प्रियंका ने कोच की बात मानी और उन्होंने रेस वॉकिंग में तीसरा स्थान हासिल किया.

प्रियंका कहती हैं कि उन्हें अपनी रेस वॉकिंग जर्नी के दौरान काफी संघर्ष करना पड़ा है. उनका कहना है कि देश की आधी आबादी ये तक नहीं जानती कि रेस वॉकिंग क्या होती है. लोग रेसवॉकर्स पर हंसते हैं और ये स्पोर्ट्स चुनने के लिए उनकामजाक उड़ाते हैं. पर प्रियंका ने कभी भी यह सब दिल पर नहीं लिया. उन्होंने इसे काफी एनजॉय किया है. प्रियंका बताती हैं कि आज भी उनके गांव में सुविधाएं नहीं है और फिर भी वे अपने सफर में काफी आगे निकल आई हैं.

पीरियड्स के दर्द में कॉम्पटीशन में हिस्सा ले जीता गोल्ड मेडल

प्रियंका बताती हैं कि उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी पीरियड्स के दौरान होती है. उनका कहना है कि वो इस बारे में किसी को बताने से डरती हैं. अपने कोच को भी वे नहीं बता सकतीं. पीरियड्स के दौरान भयानक दर्द के बावजूद प्रियंका ने रोजाना ग्राउंड पर प्रैक्टिस की है और खूब पसीना बहाया है.

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एक किस्सा बताते हुए प्रियंका ने कहा कि एक बार वे नेशनल रेस वॉकिंग कॉम्पटीशन के लिए गई थीं और उस समय उन्हें पीरियड्स हो रखे थे. उन्हें बहुत ज्यादा दर्द था. वो पानी तक नहीं पी सकती थी. जैसे ही रेस खत्म हुई वे अपनी मां के पास भागकर गई जो उस समय वहां मौजूद थीं और जोर-जोर से रोने लगीं. हालांकि बाद में प्रियंका को उस दर्द की कीमत पता चली, क्योंकि उस कॉम्पटीशन में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता था.

रेस वॉकिंग ने कैसे बदली प्रियंका की जिंदगी

ऑनलाइन हेल्थ पोर्टल के अनुसार, प्रियंका का कहना है कि एक स्पोर्ट्सपर्सन होने के नाते, हमें अपने सोने के शेड्यूल, हमारे भोजन और कई अन्य चीजों का ध्यान रखना होता है. हमें सही वजन बनाए रखने के लिए खाने की मात्रा और भोजन की गुणवत्ता का ध्यान रखना होता है.

अपने बारे में बताते हुए प्रियंका ने कहा कि मैं उस तरह की इंसान हूं जो कि न केवल खेल के लिए कड़ी मेहनत करना पसंद करती है, बल्कि जीवन में अन्य चीजों का भी आनंद लेती है. मुझे अच्छे कपड़े पहनना, फोटोशूट करवाना और नॉर्मल लाइफ जीना पसंद है, लेकिन पिछले चार-पांच महीने से मैंने सबकुछ छोड़ा हुआ है. मैं बाहर नहीं जा रही हूं या कुछ भी नहीं कर रही हूं. मैं एक स्ट्रिक्ट शेड्यूल बना रखा है. मैंने बहुत वजन भी कम किया है. कई लोगों ने मुझसे कहा है कि मैं बुरी दिखने लगी हूं लेकिन मेरा एकमात्र ध्यान अभी अपने खेल में बेस्ट होना है.

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