काशी की प्राणवायु हैं धूप, अगरबत्ती, गांजे, ठहरे पानी की गंध के साथ चिताओं से उठती चिरांध

हर समाज अपने आनंद के कुछ जरिए बनाता है. मणिकर्णिका का समाज मुर्दा फूंक कर आनंद लेता है. शिव काशी के अधिपति देवता हैं. वे महाश्मशान में रहते हैं. यहीं खेलते हैं, यहीं रमते हैं. तभी वसंत में पंडित छन्नूलाल मिश्र इसी घाट पर गाते हैं- ‘खेलें मसाने में होरी...