नामुमकिन है EVM की हैकिंग, यकीन नहीं आ रहा तो पढ़ लीजिये

मैसाच्यूट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के एक रिसर्च असोसिएट के हवाले से छपी रिपोर्टों की माने तो यह इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस दो तरीकों से हैक की जा सकती है.

नई दिल्ली: सच तो ये है कि अब मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखना ‘आप’ छोड़ ही दीजिये. आप यहां पर उन लोगों के लिए है, जो अक्सर ये हो हल्ला मचाते नज़र आ जाते हैं कि फलां चुनाव में ईवीएम यानि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन हैक हुई. या इसे हैक करके कोई पार्टी सत्ता में आ गई.

कई देशों में ऐसा पाया गया है कि ईवीएम हैक की जा सकती है और इन मशीनों के जरिए वोटर की पूरी जानकारी भी निकाली जा सकती है. नतीजों में फेरबदल किया जा सकता है साथ ही ईवीएम मशीन इंटरनली किसी इंसान द्वारा भी बदली जा सकती है. लेकिन भारत में उपयोग लाई जाने वाली ईवीएम विदेशी मशीनों से अलग है. बाहर इस्तेमाल होने वाली ईवीएम जहां नेटवर्क से जुड़ी होती हैं वहीं भारतीय मशीनें पूरी तरह से ऑफलाइन चलती हैं. ईवीएम नेटवर्क से नहीं जुड़ी होने के कारण उसमें छेड़छाड़ की संभावना खत्म हो जाती है.

ऑनलाइन मीडिया रिपोर्टों में मैसाच्यूट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के एक रिसर्च असोसिएट के हवाले से छपी रिपोर्टों की माने तो यह इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस दो तरीकों से हैक की जा सकती. एक वायर्ड और दूसरा वायरलेस तरीकों यानि नेटवर्किंग के जरिए से. इन दो तरीकों को जानने से पहले हमें ये समझना जरूरी होगा कि आखिर ईवीएम काम कैसे करती है.

ऐसे काम करती है ईवीएम
दरअसल ईवीएम में एक कंट्रोल यूनिट, एक बैलट यूनिट और 5 मीटर की केबल होती है. मशीन बैटरी से चलती है. इसकी कंट्रोल यूनिट मतदान अधिकारी के पास होती है जबकि बैलेट यूनिट का प्रयोग मतदाता करते हैं. जब तक मतदान अधिकारी कंट्रोल यूनिट से बैलेट का बटन प्रेस नहीं करेगा, बैलेट यूनिट से वोट डाल पाना नामुमकिन है. बैलेट यूनिट से एक बार वोट डाले जाने के बाद लोग चाहें जितने भी बटन दबाएं, कोई फर्क नहीं पड़ता. मतदाता को अपनी पसंद के कैंडिडेट के नाम के आगे दिया बटन दबाना होता है और एक वोट लेते ही मशीन लॉक हो जाती है. इसके बाद सिर्फ नए बैलट नंबर से ही खुलती है. बैलेट यूनिट तब तक बेकार है जब तब मतदान अधिकारी उसके लिए स्वीकृति न दें.

अब आते हैं हैकिंग के तरीकों पर.

वायर्ड
फैक्ट पर जाएं तो वायर्ड हैकिंग के लिए ईवीएम की कंट्रोल यूनिट से छेड़छाड़ जरूरी है. इसके लिए किसी एक ऐसे डिवाइस की जरूरत होती है जिसकी प्रोग्रामिंग उसी भाषा में की जाए जिसमें ईवीएम में लगी माइक्रोचिप की कोडिंग होती है. वायर्ड हैकिंग का तरीका आम आदमी पार्टी ने पिछले साल अपनाया भी था. यह तरीका फर्जी था क्योंकि इसमें ईवीएम में इस्तेमाल हो रही चिप को हैक करने के बजाय उसे रिप्लेस कर दिया गया था.

वायरलेस
चुनाव आयोग के मुताबिक वायरलेस मेथड से ईवीएम हैक होने के चांस न के बराबर हैं, क्योंकि ईवीएम में किसी तरह का रेडियो रिसीवर नहीं दिया गया है. हैकर अगर अलग से रिसीवर लगाना भी चाहें तो उसके मिलने की संभावना कम और बनाने में आने वाली लागत करोड़ों में होगी. दूसरी बात आगामी चुनावों में एम3 मॉडल की ईवीएम मशीनें (2013 के बाद बनाई गईं) उपयोग में लाई जा रही हैं. ये मशीनें वीवीपैट युक्त होती हैं और किसी भी छेड़छाड़ में अपने आप बंद हो जाती है और उसे खुद सही करती हैं. इन मशीनों में चिप या ब्लूटूथ नहीं जोड़ सकते हैं, इसलिए अब इस्तेमाल हो रही ईवीएम को हैक करना भी मुश्किल है.

संभावनाएं न के बराबर
वोटिंग मशीन दो सरकारी कंपनियों भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा बनाई जाती है. माइक्रोचिप बनाने वाली कंपनियों को मशीन देने से पहले मशीन में सॉफ्टवेयर प्रोग्राम डाल दिया जाता है, इस सॉफ्टवेयर की जांच एक्सपर्ट की पूरी निगरानी में होती है. मशीन बनाने के स्तर पर गड़बड़ी तभी होगी, जब ईवीएम में पहले से ही कोई ऐसी प्रोग्रामिंग कर दी जाए जो किसी खास उम्मीदवार को वोट ट्रांसफर कर दे. ऐसा होना संभव नहीं है क्योंकि कौन सी मशीन किस इलाके में भेजी जाएगी और वहां किस उम्मीदवार का नाम किस क्रम में होगा, यह पहले से तय नहीं होता है. अब तो ईवीएम से जुड़ी वीवीपैट मशीनें भी आने लगी हैं जिससे वोटर ने अपना वोट कहां दिया, जान सकते हैं. इसके अनुसार ईवीएम हैक होने की संभावनाएं न के बराबर रह जाती हैं.

क्या है VVPAT मशीनें
वोटर वैरिफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) या वैरिफायबल पेपर रिकॉर्ड (VPR) मशीन बैलेट मशीन से अटैच होती हैं. वोटर्स जब वोट डालते हैं तो इससे एक पर्ची निकलती है, जिसमें किसे वोट गया ये दर्ज होता है. वोट डालते ही मतदाता को इस मशीन में लगी एक स्क्रीन में देखकर ये पता चल जाता है कि उसका वोट उसे ही गया, जिसे वो डालना चाहता था. काउंटिंग के वक़्त यदि कोई शंका होती है तो पर्चियां गिनकर ईवीएम के रिजल्ट्स से मिलान कर उसे दूर कर दिया जाता है.

इन सबके बावजूद यदि किसी व्यक्ति के पास ऐसी तकनीक है, जिससे एक एंटीना और ट्रांसिवर सर्किट का उपयोग करके लाखों ईवीएम को हैक किया जा सके, फिर इस तकनीक का किसी को पता भी न चले और खुद ही ईवीएम से कनेक्ट भी हो जाए, तो उसे फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार दिया जाना चाहिए.