मोदी के नहले पर राहुल का दहला, बजट से पहले ही कर दिया न्यूनतम आय गारंटी का ऐलान

नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हर गरीब व्यक्ति के बैंक खाते में न्यूनतम आमदनी देने के ऐलान के साथ चुनावी बिगुल बजा दिया है. राहुल गांधी ने कहा कि 2019 का चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस पार्टी देश के हर गरीब को न्यूनतम आमदनी देगी. न्यूनतम आय की […]

नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हर गरीब व्यक्ति के बैंक खाते में न्यूनतम आमदनी देने के ऐलान के साथ चुनावी बिगुल बजा दिया है. राहुल गांधी ने कहा कि 2019 का चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस पार्टी देश के हर गरीब को न्यूनतम आमदनी देगी.

न्यूनतम आय की गारंटी का कार्ड खेलकर राहुल गांधी ने बजट से पहले केंद्र सरकार को बैकफुट पर ला दिया है क्योंकि पिछले कई दिनों से बजट को लेकर ये चर्चा गरम है कि मोदी सरकार इस बजट में गरीबों के लिए न्यूनतम आय गांरटी का ऐलान करने का विचार बना रही थी. ऐसे में राहुल गांधी ने बजट से पहले ही यह चुनावी वादा पेश करके बीजेपी को चारों खाने चित कर दिया है.

क्या है मोदी सरकार की योजना?

2019 लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार इस बजट में UBI (यूनिवर्सल बेसिक इनकम) स्कीम लागू करना चाहती है. यह एक ऐसी स्कीम है जिसका उद्देश्य गरीबी हटाने के लिए अमीर-गरीब सभी को निश्चित अंतराल पर एक निश्चित रकम देने से है.

साल 2016-17 के आर्थिक सर्वे में मोदी सरकार ने UBI का जिक्र किया था. इस रिपोर्ट में ऐसा दावा किया गया था कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम भारत में व्याप्त गरीबी का एक समाधान बन सकती है. इकनॉमिक सर्वे 2016-17 में सबसे गरीब 25% परिवारों को इस योजना का लाभ देने की सिफारिश भी की गई थी.

कितना बोझ आएगा सरकार पर?

देश के गरीब परिवारों को इस स्कीम का लाभ मुहैया कराने पर सरकारी खजाने पर लगभग 7 लाख करोड़ का खर्च आएगा और अगर सबसे गरीब 18 से 20 प्रतिशत परिवारों तक भी इस योजना को सीमित रखा गया तो भी लगभग 5 लाख करोड़ से ज्यादा का खर्च आएगा.

किसको मिलेगा योजना का लाभ?

ऐसा मानना है कि UBI स्कीम के तहत देश की सबसे गरीब आबादी के करीब 20 करोड़ जरूरतमंदों को इसका फायदा मिलेगा. चूंकि देश में गरीबी रेखा के दायरे में कौन-कौन आता है इसका आंकलन ठीक से नहीं हुआ है ऐसे में 2011 में सामाजिक, आर्थिक, जातीय जनगणना के तहत जुटाए गए आंकड़ों का सहारा लिया जा सकता है. ऐसे में यह मोदी और राहुल दोनों के लिए चुनौती साबित होगा कि योजना का कार्यान्वयन कैसे किया जाए वरना यह भी कहीं चुनावी जुमला बनकर न रह जाए.