कांग्रेस की ‘महामिलावट’ और बीजेपी के ‘महाभय’ का कड़वा सच

लोकसभा चुनाव की तैयारियों के बीच देश की सियासत में हाल के दिनों में 3 बड़े चुनावी गठजोड़ हुए हैं. महाराष्ट्र और तमिलनाडु में चुनावी साझीदारी के बाद बाकी राज्यों में भी बीजेपी और कांग्रेस अपनी-अपनी सहूलियत के मुताबिक डील सील करने में जुटी हैं. ये अलग बात है कि दोनों एक-दूसरे के गठबंधन को ‘महामिलावट’ और ‘महाभय’ बता रही हैं.

नई दिल्ली। देश की सियासत में हाल के दिनों में 3 बड़े चुनावी जोड़तोड़ हुए हैं. महाराष्ट्र और तमिलनाडु में सियासी साझीदारी का ऐलान हो चुका है. बाकी राज्यों में भी बीजेपी और कांग्रेस अपनी-अपनी सहूलियतों के मुताबिक साझेदार ढूंढ रही है और सहमति बनने पर डील को सील भी कर देगी. कुल मिलाकर कुनबे को मजबूत करने की कवायद में कांग्रेस और बीजेपी कोई कमी नहीं छोड़ रही है, ये अलग बात है कि दोनों एक दूसरे को कमजोर और मजबूर बताने में भी लगी है. एक ओर विपक्ष के गठबंधन को ‘महामिलावट’ बताया जा रहा है तो दूसरी ओर सत्ता पक्ष के गठजोड़ को ‘महाभय’ का नाम दिया जा रहा है।

वैसे तो पब्लिक में ऐसे आरोप-प्रत्यारोप के खास मायने नहीं होते लेकिन ‘महाभय’ और ‘महामिलावट’ देश की सियासत की मजबूरी बन चुकी है. मुद्दों और विचारधारा की समानता का हवाला देकर करीब 3 दशक से सहूलियत की ये सियासत रफ्तार पकड़ रही है और अब हालात ऐसे बन गए हैं कि कोई भी राष्ट्रीय पार्टी अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरने का साहस नहीं जुटा पा रही है. आखिर क्यों सियासत की है ये मजबूरी ? कब तक पार्टियां अपने दम पर सत्ता के शिखर पर पहुंचने में असहज महसूस करती रहेंगी ? क्या बिना मिलावट किसी एक पार्टी की सरकार शासन करने में सक्षम नहीं है?

क्या वाकई बीजेपी को है ‘महाभय’ ?

2014 के आम चुनाव में यहां बीजेपी ने तमिलनाडु में एक सीट के साथ खाता खोला था लेकिन 5 साल बीत जाने के बाद भी बीजेपी अपने दम पर राज्य में खुद का विस्तार कर पाने में सक्षम नहीं है. शायद इसलिए 2019 के आम चुनाव के लिए तमिलनाडु और पुडुचेरी में बीजेपी ने एआईएडीएमके और पीएमके के साथ गठजोड़ कर अपना कुनबा मजबूत करने की कोशिश की है. मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हुए हालिया विधानसभा चुनाव में मिली शिकस्त और उत्तरप्रदेश में एसपी-बीएसपी गठबंधन के बाद उपजे हालात ने उत्तर भारत में बीजेपी का भय बढ़ा दिया है. इस वजह से बीजेपी ने अब दक्षिण भारत की ओर रुख किया है. दक्षिण के पांच राज्यों तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश की कुल 129 लोकसभा सीटों में से बीजेपी के पास फिलहाल केवल 20 सीटें ही हैं. इसमें भी 17 सीटें अकेले कर्नाटक से हैं और बची तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश की 99 सीटों में से बीजेपी के पास केवल 3 सीटें हैं. उत्तर-पूर्व में भी बीजेपी के लिए हालात कुछ ऐसे ही हैं इसलिए यहां नए साथियों की तलाश उसकी मजबूरी है.

‘महामिलावट’ कांग्रेस की मजबूरी क्यों?

आगामी आम चुनाव के लिए तमिलनाडु में बीजेपी-एआईडीएमके-पीएमके गठबंधन के जवाब में कांग्रेस-डीएमके-वीसीके का गठबंधन हो गया है. 2014 के आम चुनाव में तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके अलग-अलग लड़ी थी और दोनों में किसी भी पार्टी को एक भी सीट नहीं मिल पाई थी. दक्षिण भारत के बड़े राज्यों आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में भी कांग्रेस अपने दम पर चुनाव लड़ने और जीतने की स्थिति में नहीं है. दोनों राज्यों में तेलगुदेशम और जेडीएस के रूप में उसने अपना सहयोगी पहले ही ढूंढ़ लिया है. इसी तरह 2014 में उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड की कुल 177 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस को केवल 8 सीटों पर जीत मिली थी. इसलिए 2019 के आम चुनाव में पार्टी इन 4 राज्यों में करीब 9 दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने की तैयारी में है. उत्तरप्रदेश में कांग्रेस भले ही अपने दम पर चुनाव लड़ रही है लेकिन ये उसकी सियासी मजबूरी है, क्योंकि यहां एसपी-बीएसपी-आरएलडी ने पहले ही कांग्रेस से किनारा कर लिया था.

चुनाव से पहले भी, चुनाव के बाद भी!

गठजोड़ की सियासत में चुनाव पूर्व और चुनाव बाद साझेदारी की रवायत है. चुनाव पूर्व एक दूसरे के खून की प्यासी पार्टियां चुनाव बाद सत्ता के लिए एक दूसरे के साथ गलबहियां डाले नजर आती हैं. चाहे जम्मू-कश्मीर में बीजेपी-पीडीएफ का गठबंधन हो या फिर कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस का गठजोड़, सत्ता के लिए सभी दलों की सीमाएं और मर्यादाएं तार-तार हो जाती हैं. सियासत का मचलता मिजाज ही कहिए बिहार में जेडीयू और आरजेडी के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन होता है लेकिन चुनाव बाद दोनों की राहें जुदा हो जाती हैं.

बीजेपी के खिलाफ वोट लेकर सत्ता में आई जेडीयू चुनाव के बाद बीजेपी के साथ साझीदारी कर सरकार चलाने में सहज महसूस करती है. कुछ ऐसा ही आंध्रप्रदेश में हुआ, जहां 2014 में बीजेपी के साथ प्यार-वफा की कसमें खाने वाले चंद्रबाबू नायडू अब काले पोशाक में कांग्रेस के साथ मेलमिलाप का सिलसिला बढ़ा रहे हैं.

अंदरखाने भी होती है साझेदारी

सत्ता के लिए गठजोड़ की कुलबुलाहट की इंतहां यहां तक है कि चुनाव बाद किसी के साथ भी सहयोग करने में कोई पार्टी मना नहीं कर सकती. मिलन न हो सकने लायक कुछ अपवाद मिलेंगे भी तो इस वजह से कि उन दो पार्टियों के वोट बैंक का समीकरण कुछ ऐसा हो, कि जिससे साथ आने की सूरत में उसमें सेंध लगने का खतरा हो. इसका शानदार उदाहरण देश में लंबे समय तक मुलायम सिंह और बीजेपी का रिश्ता रहा.

मुलायम ने कई बार अंदरखाने बीजेपी का सहयोग किया, लेकिन मुस्लिम वोट बैंक की खातिर कागजों पर दोनों के बीच कभी गठबंधन नहीं हुआ. चाहे 1999 में सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने का मामला हो या 2008 में परमाणु करार पर वामदलों का साथ छोड़ने की बात हो या फिर 2002 में राष्ट्रपति पद पर एपीजे अब्दुल कलाम की उम्मीदवारी को समर्थन देने का मामला हो, मुलायम की अगुआई में एसपी ने सियासत में साझेदारी की संस्कृति को वक्त की जरूरतों के मुताबिक इस्तेमाल करने का बीजमंत्र दिया.

दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैं

देश की सियासत में 3 दशक पहले शुरू हुई साझीदारी की सियासत का स्वरूप वक्त के साथ बदलता रहा है. चुनाव पूर्व या चुनाव बाद गठजोड़ न होने की स्थिति में धुर विरोधी विचारों वाले विरोधी दलों के कद्दावर नेताओं को अपने पाले में शामिल करने का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है. इसी परंपरा के तहत समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता गौरव भाटिया बीजेपी के प्रवक्ता बन जाते हैं और ममता बनर्जी के सिपहसालार रहे मुकुल रॉय पश्चिम बंगाल में मोदी के लिए प्रचार कर रहे होते हैं. सियासी समाजवाद की ये परंपरा सभी पार्टियों में है क्योंकि मजबूर ये हालात इधर भी है, उधर भी है.