Axis Of Evil का आखिरी निशाना है ईरान, जॉर्ज बुश ने किया था बर्बाद करने का एलान

साल 2002 में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश (बुश जूनियर) ने दोनों सदनों सीनेट और प्रतिनिधि सभा की संयुक्त बैठक (स्टेट ऑफ द यूनियन ) को संबोधित करते हुए ईरान, इराक और उत्तर कोरिया को एक्सिस ऑफ इविल यानी बुराई की धुरी का नाम दिया था.

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ईरान और अमेरिका के बीच तनातनी ने अघोषित जंग का रूख अख्तियार कर लिया है. पहले बगदाद में अमेरिकी ड्रोन में इस्लामिक रिपब्लिक गार्ड्स के जनरल कासिम सुलेमानी की मौत हुई. फिर इराक स्थित अमेरिकी बेस पर ईरानी मिसाइल के हमले ने दुनिया भर की पेशानी पर बल ला दिया है. ईरान के साथ अमेरिका के रवैए ने उसके पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ( George W Bush) के कहे हुए ‘एक्सिस ऑफ इविल (axis of evil)’ की याद दिला दी.

साल 2002 में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश (बुश जूनियर) ने दोनों सदनों सीनेट और प्रतिनिधि सभा की संयुक्त बैठक (स्टेट ऑफ द यूनियन ) को संबोधित करते हुए ईरान, इराक और उत्तर कोरिया को एक्सिस ऑफ इविल यानी बुराई की धुरी का नाम दिया था. हालांकि बाद के कुछ वर्षो में अमेरिकी अधिकारियों ने इस मुहावरे का प्रयोग बंद कर दिया था.

अपने पूरे कार्यकाल के दौरान बुश जूनियर ने इस नाम का कई बार इस्तेमाल किया था. बुश ने अपने भाषण में आरोप लगाया कि ये तीन ही देश आतंकवादियों की मदद कर रहे हैं. इसके अलावा बड़े पैमाने पर जनसंहार के हथियार हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह तीनों देश दुनिया की शांति के लिए खतरनाक हैं. एक तरह से बुश ने इन तीनों ही देश को बर्बाद करने का एलान ही कर दिया था. तब से ही तीनों देश अमेरिका के लिए एक टास्क बन गए थे.

इराक

अपने भाषण में उन्होंने ईराक की सबसे ज्यादा बुराई की थी. बुश ने कहा था कि अमेरीका को लेकर इराक लगातार अपनी दुश्मनी दिखा रहा है. इसके अलावा वह आतंकवादियों की मदद भी कर रहा है. उन्होंने कहा था कि इराक की सरकार एंथ्रेक्स, नर्व गैस और परमाणु हथियारों को हासिल करने की कोशिश करती रहती है. साल 1991 में कुवैत पर हमले के बाद इराक और अमेरिका आमने-सामने आ गए थे. जिसका नतीजा दिसंबर 2003 को अमेरिकी सुरक्षा बलों के हाथों इराक के पूर्व तानाशाह सद्दाम हुसैन को उसके गृहनगर तिकरित के पास से पकड़ने से लेकर 30 दिसंबर 2006 को उसे फांसी पर लटकाने के रूप में सामने आया. तब अमेरिकी सेना के इस अभियान का नाम ऑपरेशन रेड डॉन रखा गया था. इराक में नई सरकार बनने के बाद अमेरिका का पहला टास्क पूरा हो गया था.

उत्तर कोरिया

बुश ने उत्तरी कोरिया को एक ऐसी ताकत बताया था जो अपने नागरिकों को भूखा रख कर मिसाइलों समेत बड़े पैमाने पर जनसंहार के हथियार हासिल करने की कोशिश कर रही है. अमेरिका की ओर से उत्तर कोरिया को आतंकवादी राष्ट्रों की काली सूची से बाहर निकालने और उसके साथ बेहतर आर्थिक और कूटनीतिक संबंध बनाने के वादे के बाद वह अपने परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने पर सहमत हो गया. इसके बाद अमेरिका का दूसरा टास्क भी लगभग पूरा हो गया था. उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग से डोनाल्ड ट्रंप की बातें भी दोस्ताना लहजे में सामने आती हैं.

‘एक्सिस ऑफ इविल’ में क्यों शामिल हुआ ईरान

इस्लामिक क्रांति और जनमत संग्रह के बाद साल 1979 में पहली अप्रैल को ईरान को एक इस्लामी गणतंत्र घोषित कर दिया गया था. इराक और अमेरिका युद्ध के दौरान ईरान ने इराक का समर्थन किया था. तब से ईरान और अमेरिका के बीच तल्खी है. इसके अलावा ‘एक्सिस ऑफ इविल’ में ईरान शामिल होने की वजह सिर्फ कच्चा तेल ही नहीं है. ईरान के साथ अमेरिका के जारी विवाद की बड़ी वजह परमाणु कार्यक्रम है.

साल 2002 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम का दुनिया को पता चला. इसके बाद अमेरिका ने ईरान पर तमाम प्रतिबंध लगा दिए. प्रतिबंधों से ईरान पर आर्थिक दबाव आने लगा. ईरान और यूरोपीय संघ में इसको लेकर बातचीत होने लगी. इसके पहले ईरान ने यूरेनियम संर्वद्धन कार्यक्रम बंद करने की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मांग भी ठुकरा दी थी. साल 2005 से 2013 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे महमूद अहमदीनेजाद इस स्थिति का सामना करते रहे. साल 2013 में उनके हाथ से निकलकर सत्ता हसन रोहानी के हाथ में आ गई. उन्होंने परमाणु कार्यक्रम पर नए सिरे से बात करना शुरू कर दिया था.

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के आने से बिगड़ा माहौल

साल 2015 में अमेरिका समेत पश्चिम देशों और ईरान के बीच में परमाणु कार्यक्रम पर हुए समझौते के बाद लगा था कि दोनों देशों की 30 वर्षों से ज्यादा समय से चली आ रही दुश्मनी खत्म हो जाएगी. ईरान से कई आर्थिक प्रतिबंध भी हट गए. लेकिन 2016 में अमेरिका में सत्ता बदल गई. डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनते ही ओबामा के दौर में हुए ईरान समझौते को एकतरफा कार्रवाई करते हुए रद्द कर दिया. ट्रंप ने ईरान पर दोबारा आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए. इसके अलावा अमेरिका ने ईरान की सेना को आतंकी संगठन घोषित कर दिया. यूरोपीय संघ ने ट्रंप से फैसले पर पुनर्विचार की बात कही लेकिन ट्रंप नहीं माने. उन्होंने एलान किया कि जो देश ईरान के साथ व्यापार करेगा उस पर भी आर्थिक प्रतिबंध लागू हो जाएंगे.

दूसरे देशों की जमीन पर भी जारी है दोनों की लड़ाई

ईरान और अमेरिका सीधी दुश्मनी के अलावा यमन, सीरिया और इस्राएल में अप्रत्यक्ष युद्ध भी लड़ रहे हैं. यमन में अमेरिका सऊदी अरब के साथ है तो ईरान हूथी विद्रोहियों के साथ है. अमेरिका इजरायल के साथ है तो ईरान हिज्बुल्लाह और हमास के साथ. सीरिया में ईरान सरकार के साथ है तो अमेरिका विद्रोहियों का साथ दे रहा है.

क्या अमेरिका पूरा कर पाएगा अपना तीसरा टास्क

इस साल तीन जनवरी से पहले ईरान और अमेरिका के बीच सिर्फ तनातनी थी. अमेरिका के हाथों जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान ने अपनी ओर से औपचारिक जंग का एलान कर दिया है. इस बार फिर दोनों देशों के हमले का गवाह बन रहा है इराक. अमेरिका ने वहीं सुलेमानी को मारा और अब वहीं के अमेरिकी सैन्य बेस पर ईरान ने भी मिसाइल हमला किया है.

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