, माया-अखिलेश ऐसे बिगाड़ेंगे बीजेपी का खेल, समझिए हर सीट का हिसाब
, माया-अखिलेश ऐसे बिगाड़ेंगे बीजेपी का खेल, समझिए हर सीट का हिसाब

माया-अखिलेश ऐसे बिगाड़ेंगे बीजेपी का खेल, समझिए हर सीट का हिसाब

, माया-अखिलेश ऐसे बिगाड़ेंगे बीजेपी का खेल, समझिए हर सीट का हिसाब

नई दिल्ली: समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और आरएलडी ने आपस में ये तय कर लिया है कि कहां से किसका उम्मीदवार मैदान में होगा? इसके बाद सवाल है कि तीनों के वोट मिलकर क्या कमाल करेंगे? और इन पर ‘प्रियंका फैक्टर’ का कितना असर होगा? महागठबंधन के नेता ये कहने में जुटे हैं कि उनके वोटों का योग हो जाएगा और वो बीजेपी को धूल चटा देंगे. लेकिन एक अहम सवाल और है. 2014 में यूपी में कई ऐसी सीटें थीं, जिनपर बीजेपी ने अकेले दम पर 50 प्रतिशत या इससे भी ज्यादा वोट हासिल कर जीत पाई थी. ऐसे में सवाल ये है कि अगर महागठबंधन के वोटों का योग हो भी गया, तो क्या वे बीजेपी को ऐसी सीटों पर वे हरा पाएंगे?

हम पहले आपको यूपी की कुछ ऐसी वीआईपी सीटों का ब्योरा देंगे, जिन पर बीजेपी ने 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल किया था. उसके बाद आप गोरखपुर, फूलपुर और कैराना के उदाहरण से समझेंगे कि 2014 में आधे से ज्यादा वोट हासिल होने वाली सीटों पर भी बीजेपी कैसे ‘महागठबंधन के जाल’ में फंस सकती है?

शुरू करते हैं वाराणसी से-

वाराणसी :

2014 का मिजाज अपनी जगह बरकरार रहा, तो प्रधानमंत्री मोदी को मां गंगा दोबारा अपनी गोद में पनाह जरूर दे सकती हैं. पिछले चुनाव में नरेंद्र मोदी 56.37 प्रतिशत वोट के साथ बाकी तमाम पार्टियों के वोटों के योग से काफी आगे निकल गए थे. मोदी के सबसे नजदीक आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल खड़े थे, जिन्हें वाराणसी की जनता ने 20.30 प्रतिशत मत दिया था. कांग्रेस के अजय सिंह को 7.34 प्रतिशत वोट मिले थे. जबकि यूपी की दो सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों- बीएसपी और एसपी को महज 5.88 प्रतिशत और 4.39 प्रतिशत वोटों से संतोष करना पड़ा था.

लखनऊ :

राजधानी लखनऊ की सीट पर भी मुकाबला एकतरफा रहा था. राजनाथ सिंह 54.23 प्रतिशत वोट के साथ जीते थे. कांग्रेस 27.87 प्रतिशत वोट के साथ दूसरे नंबर पर रही थी. जबकि एसपी और बीएसपी क्रमश: 5.49 और 6.23 प्रतिशत वोट के साथ मुकाबले में कहीं थी ही नहीं. खास बात ये है कि कांग्रेस टिकट पर लड़ने वाली रीता बहुगुणा जोशी भी अब बीजेपी में हैं. ये सारे ऐसे तथ्य हैं, जो गृहमंत्री राजनाथ सिंह को सुकून दे सकते हैं.

गाजियाबाद :

एक और वीआईपी सीट गाजियाबाद की भी है. यहां 2014 के वोट प्रतिशत के आंकड़े जनरल वी के सिंह के हक में जरूर हैं. बीजेपी तब 56.50 प्रतिशत वोट के साथ काफी आगे थी. दूसरे नंबर पर रही कांग्रेस को 14.24 प्रतिशत, बीएसपी को 12.90 और समाजवादी पार्टी को 7.97 प्रतिशत वोट मिले थे.

फैजाबाद :

राम मंदिर के असर वाली इस सीट को बीजेपी फिर से अपने कब्जे में करने की उम्मीद कर सकती है. क्योंकि 2014 में फैजाबाद में 48.08 प्रतिशत वोट के साथ बीजेपी बाकी दलों से काफी आगे निकल गई थी. दूसरे नंबर पर रही समाजवादी पार्टी को 20.43 प्रतिशत और बीएसपी को 13.87 प्रतिशत मत मिले थे. खास बात ये है कि 12.7 प्रतिशत वोट के साथ कांग्रेस भी बीएसपी से कुछ ही पीछे थी. ऐसे में प्रियंका की एंट्री और त्रिकोणीय मुकाबले की सूरत में बीजेपी इस सीट को दोबारा हासिल करने की उम्मीद कर सकती है.

गाजीपुर :

2014 में गाजीपुर से बीजेपी टिकट पर मनोज सिन्हा जीते और मंत्री बने थे. इलाके के उनके समर्थक कहते हैं कि उन्होंने 5 साल में अपनी पहचान चुपचाप काम करने वाले सांसद की बनाई. लेकिन जो आंकड़े हैं वो उन्हें जरूर डरा रहे होंगे.

मनोज सिन्हा को गाजीपुर में 2014 के मोदी लहर में भी सिर्फ 31.11 प्रतिशत मत मिले थे, जबकि उनके विरोध में खड़ी समाजवादी पार्टी को 27.82 और बीएसपी को भी 24.49 प्रतिशत वोट मिल गए थे. यानी एसपी और बीएसपी के वोट को जोड़ दें, तो आंकड़ा 52.31 प्रतिशत बैठता है. इसके बाद मनोज सिन्हा काम के बूते भले ही थोड़ी उम्मीद पाल लें, लेकिन वोट का समीकरण उन्हें हार की ओर ही ले जा रहा है.

गौतमबुद्ध नगर :

केंद्रीय मंत्री डॉक्टर महेश शर्मा ये उम्मीद कर सकते हैं कि 2014 वाला माहौल ही उनके इलाके में कायम रहे. वर्ना मामूली सत्ता विरोधी कोई भी लहर उनके किले को ध्वस्त कर सकती है. ये सही है कि 2014 में डॉक्टर साहब ने अकेले 50 प्रतिशत मत हासिल कर लिया था. लेकिन 26.64 प्रतिशत वोट के साथ समाजवादी पार्टी और 16.53 प्रतिशत वोट के साथ बीएसपी ने भी अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराई थी. इन दोनों के वोट का योग 43.17 प्रतिशत बैठता है. और डॉक्टर महेश शर्मा को इस बात का अहसास जरूर होगा कि 2014 और 2019 के हालात काफी अलग हैं.

पिछली बार का 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट भी गारंटी नहीं ?

बीजेपी को जहां भी 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले थे, उन्हें वो गठबंधन की सूरत में भी अपने लिए सुरक्षित मान सकती है, लेकिन गोरखपुर, फूलपुर और कैराना के 2014 के चुनाव और उपचुनाव की तुलना करें, तो बीजेपी का संकट गंभीर हो जाता है.

गोरखपुर :

गोरखपुर में 2014 में बीजेपी के योगी आदित्यनाथ 51.80 प्रतिशत मत ले गए थे. समाजवादी पार्टी 21.75 और बीएसपी 16.95 प्रतिशत वोट के साथ काफी पीछे छूट गई थी. लेकिन 2017 विधानसभा चुनाव में बीजेपी की आंधी के बाद भी पार्टी उपचुनाव में योगी आदित्यनाथ की सीट नहीं बचा पाई. क्योंकि महागठबंधन होते ही कहानी बदल गई.

फूलपुर :

बीजेपी के केशव प्रसाद मौर्य ने 52.43 प्रतिशत वोट लेकर मुकाबले को 2014 में एकतरफा बना दिया. मगर उपचुनाव में महागठबंधन होते ही यहां भी हालात बदल गए. फूलपुर उपचुनाव में बीजेपी को सिर्फ 38.81 प्रतिशत वोट ही मिले.

कैराना :

कुछ ऐसी ही कहानी कैराना में भी दोहराई गई, जब 2014 के चुनाव में 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट लेने के बाद भी उपचुनाव में बीजेपी महागठबंधन के आगे पिट गई. कैराना में 2014 के आमचुनाव में बीजेपी के हुकुम सिंह 50.54 प्रतिशत वोट लेकर कामयाब हुए थे. लेकिन उनकी मौत के बाद हुए उपचुनाव में महागठबंधन के आगे उनकी बेटी मृगांका को सहानुभूति वोटों का भी लाभ नहीं मिला. आरएलडी की तवस्सुम हसन ने 51.26 प्रतिशत वोट लेकर पूरी बाजी ही पलट दी. मृगांका 46.51 प्रतिशत मत लेकर हार गईं.

मतलब साफ है. 2014 के बाद यूपी के अंदर गंगा में काफी पानी बह चुका है. महागठबंधन को बीजेपी भले ही महामिलावट कह ले, लेकिन टक्कर ऐसी मिलती दिख रही है, जिसकी उम्मीद साल भर पहले ही किसी को नहीं थी.

, माया-अखिलेश ऐसे बिगाड़ेंगे बीजेपी का खेल, समझिए हर सीट का हिसाब
, माया-अखिलेश ऐसे बिगाड़ेंगे बीजेपी का खेल, समझिए हर सीट का हिसाब

Related Posts

, माया-अखिलेश ऐसे बिगाड़ेंगे बीजेपी का खेल, समझिए हर सीट का हिसाब
, माया-अखिलेश ऐसे बिगाड़ेंगे बीजेपी का खेल, समझिए हर सीट का हिसाब