RBI गवर्नर बोले- इकॉनमी पर ‘कोबरा इफेक्‍ट’ हो सकता है! पढ़ें अंग्रेजी हुकूमत और दिल्‍ली से कनेक्‍शन

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा, "ये चुनौती होगी कि मौद्रिक नीति का फायदा असली अर्थव्‍यवस्‍था को मिले."

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) गवर्नर शक्तिकांत दास ने अर्थव्‍यवस्‍था पर ‘कोबरा इफेक्‍ट’ की संभावना को लेकर सतर्क किया है. दास के मुताबिक, ‘मौद्रिक नीति को ऐसा असाधारण प्रोत्‍साहन मिला है क‍ि दुनिया भर में ब्‍याज दरें नीचे आ गई हैं. यह विकसित देशों में अब तक नहीं देखने को मिला था. लंबे समय तक मुद्रास्‍फीति नीचे लेवल पर रही, उसकी वजह से यह संभव हो पाया.” RBI गवर्नर ने कहा, “ये चुनौती होगी कि मौद्रिक नीति का फायदा असली अर्थव्‍यवस्‍था को मिले. ऐसा ना हो कि फायनेंशियल मार्केट्स में उसका कोई महत्‍व ही ना बचे. हमें कोबरा इफेक्‍ट को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है.”

क्‍या है कोबरा इफेक्‍ट?

मान लीजिए कोई समस्‍या है. उसे दूर करने के लिए आप एक प्‍लान बनाते हैं. मगर हालात सुधरने की बजाय और बिगड़ जाते हैं. इसी को ‘कोबरा इफेक्‍ट’ कहते हैं. अर्थव्‍यवस्‍था और राजनीति में इस टर्म का इस्‍तेमाल अक्‍सर होता है.

यह शब्‍द ब्रिटिश काल के भारत में हुई एक घटना से प्रचलित हुआ. तब दिल्‍ली में जहरीले कोबरा सांपों की बहुतायत से अंग्रेजी हुकूमत घबराई हुई थी. कोबरा को मारने वालों की खातिर बकायदा इनाम तक का ऐलान किया गया. शुरू-शुरू में तो प्‍लान ने असर दिखाया मगर धीरे-धीरे लोग इनाम के लालच में कोबरा सांप पालने लगे.

लोग सांपों की देखरेख करते और एक दिन उन्‍हें मारकर ब्रिटिश सरकार से इनाम ले लेते. अंग्रेजों को इसकी भनक लगी तो इनाम की योजना बंद कर दी गई. नाराज लोगों ने पाले हुए सांप खुले में छोड़ दिए. नतीजा ये हुआ कि दिल्‍ली में कोबरा सांपों की तादाद अचानक कई गुना बढ़ गई. अब अंग्रेजों के सामने वही समस्‍या विकराल रूप लेकर खड़ी थी.

दुनिया में कई जगह दिखा ‘कोबरा इफेक्‍ट’

  • 2005 में UN क्‍लाइमेंट चेंज पैनल ने ग्रीनहाउस गैसों को कम करने पर इंसेंटिव देना शुरू किया. खतरनाक गैसों को डिस्‍पोज करने वाली कंपनियों को कार्बन क्रेडिट्स मिलते, जो कैश में कन्‍वर्ट हो जाता है. कितना पैसा मिलेगा, ये गैस कितनी खतरनाक है, इस पर निर्भर करता था. सबसे ज्‍यादा पैसा कूलेंट से निकलने वाले HFC-23 के लिए मिलता था. करोड़ों डॉलर्स का क्रेडिट पाने के लिए कंपनियों ने भारी मात्रा में कूलेंट बनाए.
  • 1958 में चीन ने मच्‍छर, चूहे, मक्खियां और गौरैया खत्‍म करने के लिए ‘फोर पेस्‍ट्स कैंपेन’ शुरू किया. आइडिया था कि बीमारी फैलाने वाले इन जंतुओं से छुटकारा पाया जाए. गौरैया चीन से पूरी तरह साफ हो गईं. इसका असर ये हुआ कि फसलों में कीड़े लग गए और तगड़ा नुकसान हुआ. इस कैंपेन को 1959-1961 के बीच चीन में आई भयानक भुखमरी की एक वजह माना जाता है. इसमें करीब एक करोड़ लोग मारे गए थे.
  • 1902 में फ्रांस के कब्‍जे वाले वियतनाम में चूहों को मारने पर इनाम की योजना शुरू की गई. इनाम पाने के लिए लोगों को चूहे की कटी हुई पूंछ दिखानी पड़ती थी. फिर अधिकारियों ने देखा कि कई जिंदा चूहे बिना पूंछ के घूम रहे हैं. चूहे पकड़ने वाले उन्‍हें पकड़ते, पूंछ काटते और फिर सीवर में छोड़ देते. पूंछ दिखाकर इनाम लेते. छोड़े गए चूहे अपनी तादाद में इजाफा करते. एक तरह से चूहा पकड़ने वालों ने इसे अपना धंधा बना लिया था.

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