जिस बुर्के पर हिंदुस्तान में आज जारी है बहस, उसे निपटा चुके हैं दुनिया के ज़्यादातर देश

बुर्का एक बार फिर चर्चा में है. शिवसेना ने इसे भारत में बैन करने की हिमायत की तो जावेद अख्तर ने सहमति जताते हुए घूंघट पर भी रोक लगाने की बात कह डाली. इसके बाद फिर से विमर्श शुरू हो गया कि दुनिया बुर्के को लेकर क्या सोचती है.

एक बार फिर देश में बुर्के पर चर्चा छिड़ गई है. गीतकार जावेद अख्तर ने बुर्के पर बैन को लेकर अपनी सहमति जताई,  लेकिन साथ ही सरकार से राजस्थान में घूंघट पर प्रतिबंध लगाने की मांग भी कर दी. बयान पर शिवसेना से लेकर करणी सेना तक ने आपत्ति जाहिर की. शोर शराबे के बीच जावेद अख्तर ने कहा कि उनके बयान को काट छांटकर पेश किया गया है.

फिर कैसे खड़ा हुआ विवाद?
असल में सारा विवाद तब उठ खड़ा हुआ जब श्रीलंका ने चेहरा ढंकने पर पाबंदी लगा दी. शिवसेना ने भारत में भी ऐसा ही कानून लाकर बुर्के पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है. इस पर AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने पलटवार करते हुए पूछा कि ऐसे लोग घूंघट हटाने के बारे में क्या कहेंगे? इस पर कब प्रतिबंध लगेगा?

असल में भारत में बुर्का बैन की मांग नई नहीं है. तीन तलाक पर जब केंद्रीय सरकार कानून ला रही थी तब भी इस चर्चा ने ज़ोर पकड़ा था, मगर इस मुद्दे पर कई पक्ष निकलकर सामने आते रहे हैं. मुस्लिम महिलाओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो अपनी मर्ज़ी से बुर्का पहनने का दावा करता है, जबकि कई लोगों का मानना है कि बुर्का आधुनिकीकरण में बाधक प्रथा है, जिसका खत्म होना समय की मांग है. श्रीलंका के सीरियल ब्लास्ट जैसी घटनाओं ने तो इसे सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती के रूप में भी पेश किया है.

भारत के बाहर भी बुर्का है मुद्दा
वैसे तथ्य ये है कि कई लोग इसे इस्लाम से जोड़ते हैं तो कुछ सिर्फ अरबी पहनावे से. वहीं कई मुस्लिम देशों तक में बुर्का अनिवार्य नहीं है.

अफगानिस्तान में तालिबान से पहले बुरका अनिवार्य नहीं था (बड़ी तादाद में औरतें बुरका नहीं पहन रही थीं). बांग्लादेश में इसकी कोई अनिवार्यता नहीं है. चाड, कैमरून, गैबोन, कांगो में बुरके पर बैन लगा है. इंडोनेशिया ने भी पहनावे को लेकर कोई कानून बनाने की ज़रूरत नहीं समझी. इसके अतिरिक्त डेनमार्क में कानून बनाकर 2018 से ही चेहरा ढंकने पर पाबंदी लगा दी गई. अगर वहां कोई इसे नहीं मानता तो वो जुर्माना भरता है. नीदरलैंड्स में भी पिछले साल सार्वजनिक जगहों पर चेहरा ढंकने वालों कपड़ों पर बैन है.

अल्ज़ीरिया के सरकारी अधिकारियों के भी सार्वजनिक जगहों पर चेहरा छिपाने की मनाही है. जर्मनी में जजों, सिपाहियों और सरकारी नौकरी करनेवालों पर आंशिक बैन है. ड्राइव करते वक्त चेहरा ढंकना तो एकदम मना है. ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, नॉर्वे, स्पेन भी उन देशों में शामिल हैं जिन्होंने बुर्के को हतोत्साहित किया. इटली और स्विट्ज़रलैंड के कई इलाकों में इस पर पूरी तरह पाबंदी है. चीन का शिनजियांग में तो सार्वजनिक जगहों पर चेहरा ढंक नहीं सकते, साथ ही दाढ़ी भी असामान्य से लंबी करने पर पाबंदी है.

मध्यपूर्व में बुरके पर चली बहस
1923 में जब मिस्र की महिलावादी नेता हुदा शारावी ने आज़ादी के प्रतीक स्वरूप बुरका उतार फेंका था तब धीरे-धीरे ईरानी समाज से भी बुरका गायब होने लगा. साल 1958 में यूनाइटेड प्रेस को लिखना पड़ा कि यहां महिलाएं बुरका क्या होता है ये भी नहीं जानती. निश्चित ही शारावी की पहल और कोशिशों से पहले मिस्र की औरतें भी खुद को ढकने के पीछे कुछ ना कुछ तर्क दे ही दिया करती होंगी लेकिन एक मौका मिला नहीं कि ज़्यादातर ने इसे उतार फेंका.

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शारावी ने बुरका पहनने से इनकार किया तो मध्यपूर्व में बहस खड़ी हो गई

इसके बाद देश-विदेश की परिस्थितियों के कारण मुस्लिम प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ा और 2007 में न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक 90 फीसद महिलाएं स्कार्फ (बुरका अभी भी नहीं ) पहनने लगीं. बाद के दिनों में नकाब या बुरका धर्म का नहीं सियासत का टूल बनकर उभरा और सेकुलर ताकतों ने उसे देश में अनिवार्य बनने से रोकने की हर कोशिश की. कट्टरपंथियों ने भी अपनी कोशिशें जारी रखीं और अपने समर्थकों को धर्म के नाम पर नकाब ओढ़ने को कहा (ध्यान रहे ये अब भी किसी व्यवहारिक ज़रूरत का नहीं ख़ालिस राजनीति का मामला बन गया). मिस्र के कई विश्वविद्यालयों ने तो नकाब वालियों को ही बैन कर दिया. हाल फिलहाल स्कार्फ पहना भी जा रहा है तो फैशन स्टेटमेंट के तौर पर ही अधिक.
इतना तो साफ है ही कि मिस्र में इसे लेकर सालों तक खासा बवाल हुआ है.. हिंदुस्तान की तुलना में तो कहीं ज़्यादा.

तुर्की में कंजर्वेटिव सरकार आने से पहले तक हिजाब विवि और सरकारी दफ्तरों में प्रतिबंधित था. बैन को हटाने की कई सरकारी कोशिशों के बावजूद ऐसा हो नहीं सका. अब भी इस्तांबुल और अंकारा में हिजाब हिट नहीं हो सके हैं। तुर्की में भी अब ये धर्म का कम राजनीतिक महत्व का मामला अधिक बन गया है। इस्लामिक दुनिया में शायद ही कोई देश होगा जहां इस बात पर जिरह ना हो रही हो कि इस पहनावे को रखें या छोड़ें।
बात अगर मिडिल ईस्ट की करें तो इराक के करबला और नजफ में ये ज़रूरी बनाया गया है जबकि बगदाद में उन्हें थोड़ी छूट है।

ईरान में सिर ढकना धर्म नहीं चलन था
ईरान में ये चीज़ कभी संभ्रांत वर्ग के फैशन से जुड़ी थी। यहां तक कि इस्लाम के आगमन से भी पहले कुछ ना कुछ ओढ़कर चलना सभ्य समाज का चलन था लेकिन चरमपंथी मुस्लिमों ने इसे जबरिया लागू किया.

19वीं-20वीं सदी तक ईरान में सिर ढकने को एक आम तहज़ीब माना जाता रहा जिसका लेनादेना इस्लाम से कुछ भी नहीं था. 1930 के ईरान में आधुनिकीकरण ज़ोरों पर था. तब उसी बयार में शाह ने नकाब वगैरह पर बैन लगा दिया जिसका इस्तेमाल कालांतर में परंपरावादियों ने शाह को पश्चिम का पिट्ठू ठहराने में किया. शाह ने कई मर्दाना कपड़ों को भी बैन किया क्योंकि शाह की सोच थी कि वो आधुनिक दुनिया में पिछड़ेपन की निशानी थे (वैसे ये थोड़ा ज्यादा ही था). शाह ने आधुनिकता को आने नहीं दिया बल्कि थोपना चाहा. आधुनिकता हवा बनती लेकिन वो तो तूफान खड़ा करना चाह रहा था. प्रतिक्रियावश नकाब और हिजाब को भूल रहा ईरान भी अचानक आक्रोश में आ गया. उसे लगा कि ये तो धर्म और उसके पहनने की आज़ादी पर हमला है. पूरी तरह इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता था.

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ईरान के शाह ने जबरन आधुनिकता थोपने की कीमत सत्ता खोकर चुकाई

किसी ने नकाब के लिए, किसी ने खिलाफ किया आंदोलन
शाह का तख्तापलट हुआ तो ज़्यादातर औरतों ने नकाब इसलिए पहने ताकि शाह के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध दर्ज करा सकें. आलम ये था कि शाह विरोधी वो महिलाएं भी कुछ ना कुछ ओढ़ती-पहनती दिखी जिन्होंने कभी ऐसा किया नहीं था. इस दौर में महिलाओं के एक तबके ने नकाब का ज़बरदस्त विरोध भी किया और सड़कों पर उतर आईं. इनमें से कई ने बाद में देश तक छोड़ दिया. ईरान नकाब पर एकमत नहीं था. कोई चेहरे ढंकने के अपने अधिकार के लिए लड़ने लगा तो कोई इसे पुरातनपंथी मानकर खिलाफ खड़ा था.

दुनिया भर में फैले मुसलमान बुर्के, हिजाब या नकाब पर एकमत नहीं हो सके. मिस्र से लेकर ईरान तक में बहसें चलती रहीं लेकिन सहमति बन नहीं पाई.

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तेहरान में एक लाख महिलाएं हिजाब को अनिवार्य बनाने पर सड़कों पर उतरी थीं

दुनिया के ज़्यादातर देश निपटा चुके विवाद
जॉर्डन में नकाब, हिजाब, बुरके को लेकर कोई कानून नहीं है. मलेशिया में मस्जिद में प्रवेश के अलावा किसी तरह की अनिवार्यता नहीं है. मलेशियन सुप्रीम कोर्ट ने तो एक केस में फैसला सुनाते हुए यहां तक कहा था कि नकाब और परदे का किसी महिला के पूजा पाठ संबंधित अधिकारों से कोई लेना देना नहीं है. इस्लाम में कहीं नहीं बताया गया कि चेहरा ढंकना ज़रूरी है. मोरक्को भी ऐसी कोई बाध्यता नहीं मानता. यहां तक कि कुछ साल पहले धार्मिक शिक्षा की पाठ्यपुस्तक में एक छोटी बच्ची को हिजाब पहने दर्शाया गया तो भारी विरोध हुआ. उस तस्वीर को हटाना ही पड़ा. पाकिस्तान में इस तरह की बातों को लेकर कोई कानून नहीं बनाया गया. सऊदी अरब में तो खैर हर इस्लामिक रिवाज़ कानून है सो इसे लेकर भी कट्टरपन जारी है.

बहरहाल इतने सारे उदाहरण कम से कम इतना तो साफ करते ही हैं कि जिस तरह इस्लामिक विद्वानों में बुरके को लेकर मतैक्य नहीं है वैसे ही दुनिया भर के मुस्लिम मुल्कों में भी है। बुरके पर बवाल सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं मचता बल्कि ये करीब करीब हर जगह चर्चा में रह चुका है.

हिजाब, बुरका, नकाब सब हैं अलग अलग

नकाब में पूरा चेहरा ढका जाता है. महिला की सिर्फ आंखें ही दिखाई पड़ती हैं. काले लंबे लबादे के साथ इसे पहनते हैं.

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बुरके में शरीर पूरी तरह ढका रहता है. देखने के लिए आंखों के आगे एक जालीनुमा कपड़ा होता है. इसका प्रचलन भारत में खूब है. veil, जिस बुर्के पर हिंदुस्तान में आज जारी है बहस, उसे निपटा चुके हैं दुनिया के ज़्यादातर देश

हिजाब में चेहरा साफ दिखाई देता है लेकिन सिर के बाल, कान, गला और छाती के अलावा कंधों तक का कुछ हिस्सा ढका होता है. दुनिया भर में सबसे ज़्यादा प्रचलित है.

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चादर में चेहरे को छोड़ आधे से ज्‍यादा शरीर को ढका जाता है. सिर पर अलग से स्कार्फ भी पहना जाता है.

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शायला एक चोकोर स्कार्फ होता है जिससे सिर और बालों को ढंका जाता है. इसके दोनों सिरे कंधों पर लटके रहते हैं.  इसमें गला दिखता रहता है. खाड़ी देशों में शायला लोकप्रिय है.

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चिमार या खिमार हेड स्कार्फ से जुडा हुआ एक दूसरा स्कार्फ होता है जो काफी लंबा होता है. इसमें चेहरा दिखता रहता है, लेकिन सिर, कंधें, छाती और आधी बाहों तक शरीर पूरी तरह ढंका हुआ होता है.veil, जिस बुर्के पर हिंदुस्तान में आज जारी है बहस, उसे निपटा चुके हैं दुनिया के ज़्यादातर देश

अल अमीरा डबल स्कार्फ होता है. इसके एक हिस्से से सिर पूरी तरह कवर किया जाता है जबकि दूसरा हिस्सा उसके बाद पहनना होता है, जो सिर से लेकर कंधों को ढंकते हुए छाती के आधे हिस्से तक आता है. अरब देशों में यह काफी लोकप्रिय है.

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(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी हैं)