दिग्विजय बोले- प्रियंका ने दिलाई 1977 वाली इंदिरा गांधी की याद, तब 16 घंटे में कैसे बदला था माहौल

आइए, जानते हैं कि साल 1977 में इंदिरा गांधी के साथ क्या हुआ था और दिग्विजय सिंह ने उस घटना को प्रियंका गांधी के साथ क्यों जोड़ा है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में शनिवार को कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की ओर से पुलिस और सुरक्षा बलों पर बदसलूकी के आरोप लगाने का मामला तूल पकड़ने लगा है. कांग्रेस नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ट्वीट कर इस घटना को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की याद दिलानेवाला करार दिया है.

दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया, ‘ प्रियंका जी इंदिरा गांधी जी की याद दिलाती हैं। जिस तरह से 77 में इंदिरा जी ने लड़ाई लड़ी थी उसी प्रकार से Congress को Indian Constitution बचाने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ेगा और जेल भरो आंदोलन शुरू करना पड़ेगा। मुझे याद है तब मैं विधायक था और हम सब जेल गए थे।

भारत माता की जय ‘

इसके बाद साल 1977 और इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी के दौरान 16 घंटे सीबीआई और पुलिस के साथ कांग्रेस नेताओं के संघर्ष की चर्चा लाजिमी है. इससे पहले लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान भी प्रियंका की उनकी दादी के साथ समानता की बात काफी चर्चा में रही थी. तब उन दोनों के नाक को एक जैसा बताया गया था. आइए, जानते हैं कि साल 1977 में इंदिरा गांधी के साथ क्या हुआ था और दिग्विजय सिंह ने उस घटना को प्रियंका गांधी के साथ क्यों जोड़ा है.

जनता पार्टी सरकार के शासन काल में 3 अक्टूबर, 1977 को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी गिरफ्तारी की गई थी. कुछ घंटे बाद ही तकनीकी आधार पर रिहा कर दिया गया था. जानकारों ने तब भ्रष्‍टाचार के आरोप में गिरफ्तार की गई इंदिरा गांधी के साथ इस व्‍यवहार को सबसे बड़ी राजनीतिक भूल कहा था. बाद में यह आकलन सही साबित हुआ था.

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर की लिखी किताब ‘ एक जिंदगी काफी नहीं ‘ में इस बारें विस्तार से लिखा है. उनके संस्मरण और रिकॉर्ड के मुताबिक पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर आरोप लगा था कि भारत में कार बनाने वाली पहली कंपनी मारुती में उनके छोटे बेटे संजय गांधी की पार्टनरशिप है. इस मामले में लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में झूठी जानकारी देने के आरोप में इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी का प्रस्ताव पास कर दिया गया था. दूसरी ओर चुनाव प्रचार के दौरान खरीदी जीपों के कांग्रेस नहीं सरकार के पैसे से खरीदे जाने का मामला भी सामने आया था. माना जाता है कि तत्कालीन जनता पार्टी सरकार ने आपातकाल के बाद भीषण हार की तकलीफ झेल रही इंदिरा गांधी को और ज्यादा कमजोर करने के इरादे से यह कदम उठाया था.

देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और केंद्रीय गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह ने तय किया कि लोकसभा को अंधेरे में रखने के आरोप में इंदिरा गांधी को गिरफ्तार किया जाए. लोकसभा में प्रस्ताव आया और आपातकाल के अत्याचारों से त्रस्त अधिकतर सांसदों ने उसे फौरन पास भी कर दिया. इस घटना से आहत इंदिरा गांधी ने जमानत लेने से मना कर दिया. बाद में 3 अक्टूबर 1977 की सुबह उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.

आईपीएस अधिकारी एनके सिंह ने उसी दिन इंदिरा गांधी को एफआईआर की एक कॉपी सौंप दी थी. इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करने के लिए सुबह आठ बजे उनके घर टीम पहुंची. पुलिस को देखकर वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने शोर मचाकर विरोध करना शुरू कर दिया. हो-हंगामे के बीच इंदिरा गांधी पुलिस के साथ चल पड़ीं. उनके दोनों बेटे राजीव गांधी और संजय गांधी एक कार में पुलिस के पीछे-पीछे चलते रहे. इनके साथ ही कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं की भीड़ भी चल पड़ी थी.

इंदिरा गांधी को हिरासत में रखने के लिए बड़कल झील के पास एक जगह तय की गई थी. रास्ते में झील और फरीदाबाद के बीच का रेलवे फाटक बंद था. वहां रुकने पर इंदिरा गांधी कार से नीचे उतर कर अपने वकील से सलाह करने की जिद करने लगीं. वहां उनके सर्मथकों की बड़ी भीड़ जुट गई थी. वहां कांग्रेस नेताओं ने मीडिया को भी बुला लिया था. मामला बिगड़ता देखकर उन्हें पुरानी दिल्ली स्थित दिल्ली पुलिस की ऑफिसर्स मेस में ले जाया गया. इंदिरा गांधी रात भर वहीं रहीं.

उन्हें अगली सुबह 4 अक्टूबर 1977 को मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया. मजिस्ट्रेट ने उन पर लगे आरोपों के पक्ष में सबूतों की मांग की. जवाब में कहा गया कि बीते दिन ही उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी. सबूत इकट्ठा किए जाने में वक्त लगने की बात कहने पर मजिस्ट्रेट ने हैरान वादी पक्ष से पूछा कि तो अब क्या किया जाए ? सरकार के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था. इसी तकनीकी आधार पर इंदिरा गांधी को बरी कर दिया गया कि उनको हिरासत में रखने के लिए पर्याप्त सबूत पुलिस के पास नहीं था.

केंद्र सरकार को इस मामले में इंदिरा गांधी को दोबारा गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं हो सकी. राजनीतिक जानकारों ने उस दौरान उनकी गिरफ्तारी को ऑपरेशन ब्लंडर करार दिया था. क्योंकि गिरफ्तारी के बाद इंदिरा गांधी के खिलाफ आपातकाल के दौरान पैदा नफरत और जनता का गुस्सा कम हो गया. साथ ही उसकी जगह सहानुभूति ने ले ली थी. वह 1978 के उप -चुनाव में चिकमंगलूर से जीत कर सदन में आ गई और राजनीति पलट गई.

हालांकि बाद में दिसंबर, 1978 में इंदिरा गांधी को दूसरे मामले में संसद की कार्यवाही से निलंबन और लगभग एक सप्ताह तक तिहाड़ जेल में रहना पड़ा था. बताया जाता है कि तिहाड़ जेल के वार्ड 19 में उनके लिए खाना लेकर सोनिया गांधी खुद जाती थीं. यह गिरफ्तारी सीबीआई अधिकारियों ने की थी. इस बीच इंदिरा गांधी के खिलाफ शाह कमीशन की जांच भी चलती रही थी. उनकी गिरफ्तारी के विरोध में प्रदर्शन कर रहे कांग्रेस नेताओं की ओर से तब विमान हाईजैक करने लेने की बात भी सामने आई थी.

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