प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857: ऐसे डरे और बदले थे अंग्रेज, क्रांति को ‘असफल’ बताने में पार की सारी हदें

10 मई, 1857 को जली स्वतंत्रता (First freedom Struggle 1857) की पहली चिंगारी ने ही 90 साल तक भारतीय लोगों के संघर्ष को जारी रखा और अंग्रेजों को देश छोड़कर जाने पर मजबूर किया. आइए, जानते हैं कि साल 1857 की महान क्रांति के बाद ब्रिटिशर्स पर क्या असर हुआ.

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम-1857 को याद करना हर भारतीय को गर्व से भर देता है. देशभक्तों को हमेशा प्रेरणा देने वाली क्रांति की शुरुआत के 163 साल 10 मई रविवार को पूरे हो रहे हैं. इस अवसर पर राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति. प्रधानमंत्री, सभी मंत्री और राजनेता समेत पूरा देश कृतज्ञ होकर क्रांति के महानायकों को श्रद्धांजलि दे रहा है. यह समय आजादी के लिए हुए संघर्ष और बलिदानों को याद कर अधिकतर लोग भावुक हो जाते हैं.

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ब्रिटिश यानी अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी राज के खिलाफ भारतीय सैनिकों ने 10 मई 1857 को संगठिक क्रांति की शुरुआत की थी. यह संग्राम मेरठ में शुरू हुआ और बहुत जल्द ही देश के कई महत्वपूर्ण स्थानों पर भी तेज गति से पहुंच गया. तात्कालिन भारत के तमाम हिस्सों में इस क्रांति की लहर पहुंची. देशभक्त सेनानियों ने ब्रिटिश सरकार के सामने अपने विद्रोह की चुनौती बहुत बड़े स्तर पर खड़ी की. अंग्रेज सरकार इससे बुरी तरह डर और घबरा गए थे.

क्रांति को असफल साबित करने की साजिशें

ब्रिटिश हुकूमत ने इस क्रांति को जानवरों की तरह बेरहमी से दबाने की कोशिश की थी. जिसमें वो नाकाम रहे. 1857 की क्रांति से डरे ब्रिटिशर्स को शासन में कई बदलाव करने पड़े. इसके बाद 1857 की क्रांति को असफल बताने की साजिशें शुरू कर दीं. इससे भी चैन नहीं मिला तो उन्होंने तात्कालीन शिक्षा और बौद्धिक जगत में इन बातों (अफवाहों) का दस्तावेजीकरण करवाना शुरू कर दिया था.
– यह महज सिपाही विद्रोह था.
– अचानक और बिना किसी योजना के सिर्फ चर्बी वाले कारतूसों के कारण शुरू हुआ.
– विद्राह केवल उत्तर भारत में हुआ.
– कुछ राजे-रजवाड़े ही विद्रोह में शामिल हुए. वे सब अपना राज छिन जाने के कारण असंतुष्ट थे.
– मुस्लिम समाज फिर से भारत में शासन हासिल करने के लिए इसमें शामिल हुआ.

इन सब अफवाहों और झूठों को आजादी के बाद भी आकादमिक जगत में सच मना जाता रहा. फिर इस पर बहस शुरू हुई. बाद में देर-सबेर इसका सच भी सामने आने लगा. 10 मई, 1857 को जली स्वतंत्रता की पहली चिंगारी ने ही 90 साल तक भारतीय लोगों के संघर्ष को जारी रखा और अंग्रेजों को देश छोड़कर जाने पर मजबूर किया.

 

आइए, जानते हैं कि साल 1857 की महान क्रांति के बाद ब्रिटिशर्स पर क्या असर हुआ. इस संघर्ष के ऐसे क्या 5 सबसे बड़े नतीजे सामने आए जिसका लंबे समय तक असर रहा-

1. ईस्ट इंडिया कंपनी राज खत्म

1857 का स्वतंत्रता संघर्ष के धीमे होते ही साल 1858 में ब्रिटिश संसद ने एक कानून पास कर ईस्ट इंडिया कंपनी के अस्तित्व को समाप्त कर दिया. कंपनी राज खत्म हो गया. भारत पर शासन का पूरा अधिकार क्वीन विक्टोरिया को अपने हाथों में लेना पड़ा. इंग्लैंड में 1858 ई. के अधिनियम के तहत एक ‘भारतीय राज्य सचिव’ की व्यवस्था की गई. इसकी सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक ‘मंत्रणा परिषद्’ बनाई गई. इन 15 सदस्यों में 8 की नियुक्ति सरकार और 7 की ‘कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स’ द्वारा चुनने की व्यवस्था की गई.

2. साम्राज्य विस्तार को लगा लगाम

भारतीय लोगों को उनके गौरव और अधिकारों को पुनः वापस करने की बात कही गई. भारतीय नरेशों को क्वीन विक्टोरिया ने अपनी ओर से समस्त संधियों के पालन करने का वादा करना पड़ा. अपने साम्राज्य विस्तार की वासना पर काबू का वादा भी क्वीन विक्टोरिया ने किया. उसने कहा कि वह अपने राज्य क्षेत्र या अधिकारों का अतिक्रमण नहीं करेंगी. साथ ही सरकार में धार्मिक शोषण खत्म करने और सरकारी सेवाओं में बिना भेदभाव के नियुक्ति की बात भी की. साम्राज्य विस्तार की नीति खत्म हुई और आर्थिक शोषण के युग को लाने की चालबाजियां शुरू कर दी गई.

3. सैन्य पुनर्गठन की हुई शुरुआत

सैन्य पुनर्गठन के आधार पर यूरोपीय सैनिकों की संख्या को बढ़ाया गया. उच्च सैनिक पदों पर भारतीयों की नियुक्ति को बंद कर दिया गया. तोपखाने पर पूर्णरूप से अंग्रेज़ी सेना का अधिकार हो गया. अब बंगाल प्रेसीडेंसी के लिए सेना में भारतीय और अंग्रेज सैनिकों का अनुपात 2:1 का हो गया. वहीं मद्रास और बम्बई प्रसीडेंसियों में यह अनुपात 3:1 का हो गया. उच्च जाति के लोगों में से सैनिकों की भर्ती बंद कर दी गई.

4. गवर्नर-जनरल पद का नाम बदला

साल 1858 के अधिनियम के तहत ही भारत में गवर्नर-जनरल के पदनाम में बदलाव कर उसे ‘वायसराय’ का पदनाम दिया गया. भारतीयों के प्रशासन में प्रतिनिधित्व के क्षेत्र में अल्प प्रयास के अंतर्गत साल 1861 में ‘भारतीय परिषद अधिनियम’ को पारित किया गया. इसके साथ ही देश में अंग्रेजों की मददगार मानी जा रही सामंतवादी व्यवस्था चरमरा गई. भारतीय लोगों का भरोसा उनसे उठ गया.

5. ईसाई रिलीजन का खुलेआम प्रचार-प्रसार धीमा

साल 1857 की क्रांति की तात्कालिक वजहों में एक धार्मिक दृष्टिकोण भी था. इसका बड़ा असर देखने को मिला. 1857 में देश में मुगल साम्राज्य का रहा-सहा अस्तित्व खत्म हो गया. वहीं गोरे अंग्रेजों के उच्च होने का भ्रम भी मिट गया. इसके साथ ही अंग्रेजों की शह पाकर खुलेआम हो रहे ईसाइयत का प्रचार-प्रसार भी थमा. मिशनरीज ने रूप बदल कर सेवा के क्षेत्र को धर्मांतरण का जरिया बनाने की शुरुआत की.

साल 1824 में हुआ था क्रांति का पूर्वाभ्यास

साल 1757 में प्लासी के युद्व के बाद भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना के साथ ही भारत में उसका विरोध भी शुरू हो गया था. 1857 की क्रांति तक भारत में अनेक संघर्ष हुए. साल 1818 में खानदेश के भीलों और राजस्थान के मेरो ने संघर्ष किया. साल 1824 में वर्मा युद्व में अंग्रेजो की असफलता और उसके साथ ही बैरकपुर छावनी में 42-नैटिव इंफैंट्री में विद्रोह में उत्साहित होकर भारतीयों ने एकसाथ सहारनपुर-हरिद्वार क्षेत्र, रोहतक और गुजरात में कोली बाहुल्य क्षेत्र में जनविद्रेाह कर स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रयास किए. साल 1857 में क्रांति सैनिक विद्रोह से शुरू हुई थी और बाद में जन विद्रोह में बदल गई. इसी प्रकार की एक घटना साल 1824 में घटी थी. कुछ इतिहासकारों ने इन घटनाओं के साम्य के आधार पर साल 1824 की क्रांति को साल 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का अग्रगामी और पुर्वाभ्यास भी कहा है.

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