वो किस्सा जब राष्ट्रपति बुश की नाराज़गी के बावजूद हिंदुस्तान ने अपने भूखे दोस्त क्यूबा को खाना खिलाया

भारत दोस्तों का दोस्त है. ये साबित हुआ था साल 1991 में. सोवियत यूनियन ढह रहा था और उसके साये में पल रहे कई देश भूखे और डर से सहमे थे. उस वक्त भारत की आर्थिक ताकत आज जैसी नहीं थी, फिर भी नाराज़ अंकल सैम उर्फ अमेरिकी राष्ट्रपति की परवाह ना करते हुए भारत ने जो कुछ किया उसे दुनिया ने हैरान होकर देखा.

ये बात साल 1991 की है. सोवियत यूनियन बिखर चुका था. सोवियत के भरोसे अमेरिका से टक्कर लेनेवाला कम्युनिस्ट क्यूबा फंस गया था. क्यूबा की सारी अर्थव्यवस्था सोवियत यूनियन के भरोसे चलती थी. अमेरिका ने पुराने झगड़े के चलते क्यूबा पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगा रखे थे। इन प्रतिबंधों के चलते क्यूबा कितने ही देशों से खाना वगैरह तक नहीं ले सकता था। खुद क्यूबा अपना सामान भी किसी को बेच नहीं सकता था. टूट से गुज़रता सोवियत क्यूबा की कोई मदद कर पाने में नाकाम था. भूख से परेशान क्यूबा का आवाम बिलबिला रहा था. राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो भारी तनाव में थे. अमेरिका से पंगा लेकर भला कौन क्यूबा की मदद करता.

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भारत में नरसिम्हाराव सरकार थी जो खुद भारत के आर्थिक संकट का समाधान करने में फंसी थी. ऐसे हालात में कम्यूनिस्ट नेता हरकिशन सिंह सुरजीत का ध्यान क्यूबा के संकट पर गया। क्यूबा के साथ भारत के हमेशा ही गहरे रिश्ते रहे थे. नेहरू से लेकर इंदिरा और उसके बाद राजीव गांधी तक का क्यूबा की तरफ रुझान था. ऐसा नहीं कि क्यूबा के साथ भारत के संबंध सोवियत के साये में ही बेहतर हुए बल्कि निजी तौर पर भी दोनों देश के नेता एक-दूसरे से रिश्तों की गर्माहट महसूस करते थे.

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संकट की घड़ी में हरकिशन सिंह सुरजीत ने उन्हीं रिश्तों को याद किया. उन्होंने अपनी पार्टी CPM की तरफ से क्यूबा को दस हज़ार टन गेहूँ भिजवाने की ज़िम्मेदारी ले ली. लोगों से अनाज और पैसा जमा किया गया. सुरजीत ने केंद्र सरकार की मदद भी ली. पंजाब से गेहूं लदी विशेष ट्रेन कोलकाता बंदरगाह पहुंचवाई गई. तत्कालीन नरसिम्हाराव सरकार ने भी सुरजीत की अपील पर इतना ही गेहूं और मंगवाया और कैरिबियन प्रिंसेज़ नाम के जहाज पर लदवा दिया. दस हज़ार साबुन भी रखवाए गए. जब जहाज क्यूबा पहुंचा तो फिदेल कास्त्रो ने खासतौर पर सुरजीत को न्यौता भेजा. सुरजीत ने खुद ही उस जहाज को क्यूबा में रिसीव किया. तब फिदेल कास्त्रो ने कहा था कि अब क्यूबा कुछ दिनों तक सुरजीत सोप और सुरजीत ब्रेड से ज़िंदा रहेगा. दुनिया ने उस दिन अमेरिकी हेकड़ी के सामने भारत का हौसला देखा था. वो भारत दोस्तों की मदद करता था, चाहे खुद भारी गरीबी से जूझ रहा हो.

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राजीव के साथ फिदेल कास्त्रो ने निभाई थी दोस्ती

कांग्रेसी नेता मारग्रेट अल्वा भी क्यूबा को लेकर अपना अनुभव बताती हैं. वो बताती हैं कि फिदेल कास्त्रो को काफी पहले ये पता चल गया था कि वीपी सिंह ने राजीव गांधी की कुर्सी पलटने की तैयारी कर ली है. अल्वा उस वक्त मैक्सिको गई थीं और जल्दबाज़ी में क्यूबा पहुंचीं. इस वक्त तक वीपी को राजीव के बेहद करीब माना जाता था. फिदेल कास्त्रो की खुफिया एजेंसी बहुत तेज़ तर्रार थी और माना जाता है कि उसने ही कास्त्रो तक खबर पहुंचाई थी. मारग्रेट अल्वा ने ये बात अपनी किताब ‘करेज ऐंड कमिंटमेंट’ में लिखी कि फिदेल कास्त्रो ने उनसे कहा था कि भारत लौटकर राजीव को कहना कि अपने वित्तमंत्री पर भरोसा ना करें. वो खतरनाक है और भरोसे के काबिल नहीं है. वो राजीव की पीठ में छुरा घोंपेगा. बहरहाल मारग्रेट अल्वा ने उन्हें उलटा समझाने की कोशिश ही की. बाद में अल्वा ने ये बात राजीव को बताई तो राजीव भी हंसे और अल्वा से सवाल किया कि कास्त्रो भारत के बारे में क्या जानते हैं?  जब वीपी ने अपनी चाल चल दी तब मारग्रेट अल्वा ने राजीव को फिदेल कास्त्रो की चेतावनी याद दिलाई. चुप रहने के सिवा राजीव तब क्या करते.

नेहरू का खुद पर स्नेह और इंदिरा से गहरी दोस्ती ही थी जिसकी वजह से फिदेल कास्त्रो हमेशा राजीव से करीबी मानते रहे. साथ में खड़े हैं नटवर सिंह जो बाद में सोनिया से नाराज़ होकर राजनीति से कट गए।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और राज्यपाल रहीं मारग्रेट अल्वा फिदेल कास्त्रो के साथ हुई अपनी मुलाकातों के बारे में चाव से बताती हैं.  उन्होंने एक मज़ेदार किस्सा बीबीसी को भी बताया था. उन्होंने बताया कि एक बार खाने के बाद फिदेल कास्त्रो ने उनका वज़न पूछा. अल्वा ने कहा कि मैं आपको अपने वज़न के बारे में क्यों बताऊं. हमारे यहाँ भारत में कहावत है कि उस चीज़ के बारे में हरगिज़ न बताया जाए जिसे साड़ी छुपा सकती है. इससे कई पाप छुपाए जा सकते हैं.

अल्वा की बात पर फिदेल कास्त्रो ज़ोर से हंसे और उनकी कमर पर हाथ रखकर बोले कि मैं तुम्हें उठाकर भी बता सकता हूं कि तुम्हारा वज़न कितना है. अल्वा ने फिदेल को ऐसा करने से मना किया. बोलीं- यॉर एक्सलेंसी आप ऐसा मत करिए. आप जितना सोचते हैं उससे मैं कहीं ज़्यादा भारी हूँ. इससे पहले कि वाक्य पूरा हो पाता अल्वा ज़मीन से एक फ़ुट ऊपर थीं. फिदेल कास्त्रो ज़ोर से हंसे और बोले- अब मुझे मालूम है कि तुम्हारा वज़न कितना है. अल्वा बेचारीं शर्म से लाल हो गईं.

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मारग्रेट अल्वा एक और किस्सा बताती हैं. एक बार फिदेल कास्त्रो ने उनसे पूछा कि स्पेनिश लोग क्यूबा में न उतर कर यदि भारत में उतरे होते तो इतिहास क्या होता? (कोलंबस ने क्यूबा खोजा था जबकि वो भारत खोज रहा था). अल्वा ने तुरंत कहा कि तब आप भारतीय होते. ये बात सुनते ही फिदेल कास्त्रो ठहाका लगाने लगे. ज़ोर -ज़ोर से मेज़ थपथपाकर बोले कि ये मेरे लिए खुशकिस्मती की बात होती! भारत एक महान देश है.

(सारे किस्से ‘वन लाइफ इज़ नॉट एनफ’,’करेज एंड कमिंटमेंट’, ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘बीबीसी’ से)

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