Oscar के रेड कार्पेट पर जलवा बिखेरने वाली हापुड़ की स्‍नेहा की कहानी

यह उत्‍तर प्रदेश के हापुड़ में रहने वाली उन महिलाओं की कहानी है, जो मासिक धर्म से जुड़ी रूढ़ियों के खिलाफ आवाज बुलंद करती हैं. इस फिल्म में अहम किरदार निभाया है, स्नेहा ने.

नई दिल्‍ली: अमेरिका के लॉस एंजिल्‍स में 91वां एकेडमी अवॉर्ड्स ‘ऑस्कर’ 2019 का समारोह चल रहा था और उत्‍तर प्रदेश के हापुड़ में बैठे तमाम लोगों की धड़कने तेज थीं. रिजल्ट आया और ऐसा आया, जिसने हापुड़ ही नहीं पूरे देश को गौरवान्वित कर दिया. हम बात कर रहे हैं भारतीय प्रोड्यूसर गुनीत मोंगा की फिल्म ‘पीरियड एंड ऑफ सेंटेंस’ की. इसे ‘बेस्ट डॉक्‍यूमेंट्री शॉर्ट सब्जेक्ट’  कैटेगरी में ऑस्कर मिला है.

स्‍नेहा का हापुड़ टू ऑस्कर तक का सफर 
भारत के ग्रामीण क्षेत्र में माहवारी के समय महिलाओं को होने वाली समस्या और सैनेट्री पैड्स की कमी पर एक डॉक्‍यूमेंट्री बनाई गई. नाम है- ‘पीरियड: द एंड ऑफ सेंटेंस’. ‘बेस्ट डॉक्युमेंट्री शॉर्ट सब्जेक्ट’ कैटेगरी में ऑस्कर अवॉर्ड जीतने वाली इस फिल्म के डायरेक्‍टर हैं रायका जेताबची, जबकि इसे प्रोड्यूस किया गुनीत मोंगा के ‘सिख्या एंटरटेनमेंट’ ने. गुनीत ने ‘मसान’ और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ जैसी फिल्में बनाकर शोहरत पाई है. यह उत्‍तर प्रदेश के पास हापुड़ में रहने वाली उन महिलाओं की कहानी है, जो मासिक धर्म से जुड़ी रूढ़ियों के खिलाफ आवाज बुलंद करती हैं. इस फिल्म में अहम किरदार निभाया है, स्नेहा ने, जो कि हापुड़ की रहने वाली हैं.
बड़े-बड़े हॉलीवुड स्टार्स के बीच स्नेहा
ऑस्कर में हॉलीवुड के बड़े-बड़े स्टार्स पहुंचे और इन स्टार्स के बीच थीं, उत्तर प्रदेश के हापुड़ में रहने वाली लड़की स्नेहा. वह हापुड़ की एक आम लड़की की तरह पढ़-लिखकर यूपी पुलिस में जाने की तैयारी कर रही थीं पर इस डॉक्‍यूमेंट्री ने उनकी जिंदगी बदल डाली. स्नेहा का रेड कार्पेट लुक उनकी असल जिंदगी से एकदम अलग था. कुछ साल पहले ‘एक्शन इंडिया’ कंपनी ने महिलाओं के मासिक धर्म में इस्तेमाल होने वाले सैनेट्री पैड बनाने का काम शुरू किया. स्नेहा को इसके लिए संपर्क किया गया. इस दौरान उन्‍होंने पीरियड्स के बारे में पूछा गया तो वह शरमा गईं. उन्‍होंने कहा- ‘मैं जानती हूं, पर इस बारे कुछ बोल नहीं सकती’. स्नेहा ने बताया कि जिस संस्था के बारे में डॉक्यूमेंट्री में दिखाया गया है, वह उसी में काम करती हैं, क्‍योंकि यहां काम करके उन्‍हें इतना पैसा मिल जाता है कि वह कोचिंग की फीस भर सकें.
‘मैं तो कभी हापुड़ से दिल्ली तक नहीं गई’
डॉक्‍यूमेंट्री में स्नेहा के साथ गांव की कई लड़कियां दिखाई गई हैं. ऑस्कर जीतने पर स्नेहा ने कहा, ‘मैंलने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन अमेरिका जाना होगा. मैं तो कभी हापुड़ से दिल्‍ली तक नहीं गई’.
इस तरह बनी ऑस्‍कर विंनिंग डॉक्‍यूमेंट्री 
स्‍नेहा ने बताया कि संस्था में काम करने के दौरान ही हापुड़ कॉर्डिनेटर शबाना के साथ कुछ विदेशी आए, जिन्होंने कहा कि महिलाओं के मासिक धर्म को लेकर फिल्म बनानी है. स्नेहा ने साहस जुटाया और फिल्म काम करने के लिए माता-पिता को मना लिया. गांव में फिल्म  ‘पीरियड-एंड ऑफ सेंटेंस’ की शूटिंग हुई और विदेशी वापस लौट गए. इसके करीब एक साल बाद पता चला कि फिल्म ऑस्कर के लिए नॉमिनेट हुई है. स्नेहा के परिवार ने ऑस्कर जीतने पर जमकर जश्न मनाया. इस जीत के बाद से ग्रामीण गदगद हैं.