बहन की एंट्री से खुलेगी भाई की किस्मत ?

Share this on WhatsAppना-ना करते राजनीति में उतरीं प्रियंका गांधी ने यूपी में कांग्रेसी रथ की कमान संभाल ली है। 11 फरवरी को लखनऊ में हुए रोड़ शो को यूपी में उनका आलीशान पदार्पण माना जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बड़ी बहन को पूर्वी यूपी के मोर्चे पर लगाया है तो पश्चिमी […]

ना-ना करते राजनीति में उतरीं प्रियंका गांधी ने यूपी में कांग्रेसी रथ की कमान संभाल ली है। 11 फरवरी को लखनऊ में हुए रोड़ शो को यूपी में उनका आलीशान पदार्पण माना जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बड़ी बहन को पूर्वी यूपी के मोर्चे पर लगाया है तो पश्चिमी यूपी में चुनावी किला फतह करने का ज़िम्मा ज्योतिरादित्य सिंधिया का है।

कितनी कठिन है राह प्रियंका की

सिंधिया की चुनौती आसान नहीं है लेकिन अधिकतर निगाहें प्रियंका गांधी वाड्रा पर हैं। कांग्रेसी गणित के मुताबिक उन्हें पूर्वी यूपी की 42 लोकसभा सीटें साधनी हैं। अब तक तो उन्होंने अपने भाई और मां की दो सीटों पर ही पूरी तरह फोकस किया था लेकिन 2019 के इम्तिहान में सीटें 2 से बढ़कर 42 ( अवध- पूर्वांचल मिलाकर) हो गई हैं। याद रहे कि इनमें पीएम मोदी की वाराणसी सीट और सीएम योगी का प्रभावक्षेत्र गोरखपुर शामिल है।

कांग्रेसी खेमा तो प्रियंका को लेकर उत्सुक है ही, बीजेपी भी उनका असर नाप रही है। तीसरी तरफ अखिलेश-माया भी हैं जिन्होंने एक-दूसरे से हाथ मिलाकर कांग्रेस को पराया कर दिया है। ध्यान रखना चाहिए कि कांग्रेस ने प्रियंका को लड़ने के लिए जिस मैदान में उतारा है वहां बीएसपी और समाजवादी पार्टी का भी अच्छा खासा प्रभाव है। ऐसे दिलचस्प समीकरणों को देख सब एक-दूसरे से यही पूछ रहे हैं कि क्या प्रियंका के आने से कुछ खास फर्क पड़ेगा।

यूपी में कांग्रेस का जर्जर संगठन

पिछले लोकसभा चुनाव में यूपी की दो सीटों पर सिमट गई कांग्रेस के लिए एक संतोषप्रद बात है। वो ये कि कम से कम दो दर्जन सीटों पर उसके प्रत्याशी नंबर दो पर थे। उसके लिए चुनौती अब ये है कि ऐसी सीटों पर उसे अपने मत प्रतिशत को थोड़ा बढ़ाकर जीतने की स्थिति हासिल करनी है, लेकिन पार्टी का जर्जर संगठन उतनी मेहनत कर सकेगा या नहीं ये देखना दिलचस्प होगा। 1989 के बाद से कांग्रेस का पार्टी ढांचा यूपी में कमज़ोर होता गया है। हाल ही में राज बब्बर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं लेकिन उनकी अपील पूरे सूबे में नहीं दिखती। ऐसे में प्रियंका को अपने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष से कोई मदद मिलनी मुश्किल है।

यूपी में कांग्रेस के पास नेता कहां हैं?

कांग्रेस के पास यूपी में कोई कद्दावर स्थानीय नेता नहीं है। अखिलेश, मायावती या योगी आदित्यनाथ का मुकाबला करने के लिए उसी कद का नेता कांग्रेस के लिए खोजना मुश्किल है। ये हालात तब हैं जब पार्टी का मुख्य आधार इसी सूबे में है और आजतक पार्टी का अध्यक्ष इसी प्रदेश से चुनाव जीतकर संसद में पहुंचता है। अगर कांग्रेस के पास यूपी में कोई जननेता होता तो यकीनन उसे प्रियंका गांधी को मैदान में उतरने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। पूर्वांचल में अखिलेश प्रताप सिंह और आरपीएन सिंह थोड़ी बहुत पहचान रखते हैं लेकिन जगदंबिका पाल और रीता बहुगुणा जोशी जैसे नेताओं के पाला बदलने से कांग्रेस की स्थिति और मुश्किल हो गई है। खुद सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र में तीन सालों के भीतर पार्टी के विधायक राकेश प्रताप सिंह, एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह और जिला पंचायत अध्यक्ष ने उनका साथ छोड़ दिया।

प्रियंका के सामने वोट बैंक का संकट

कांग्रेस के सामने संगठन और जिताऊ चेहरों की कमी का संकट तो पुराना है लेकिन इसे और बुरा बनाता है वोट बैंक ना होने का महासंकट। दलितों और मुसलमानों का वोट पाने वाली कांग्रेस के सामने बीएसपी और समाजवादी पार्टी की चुनौती है। मायावती का दलित वोट बैंक अक्षुण्ण है तो अखिलेश यादव अपनी पार्टी के पुराने मुस्लिम मतदाताओं को कहीं जाने नहीं देंगे।

बीजेपी के खिलाफ दोनों पार्टियों ने हाथ मिला लिए हैं, ऐसे में मोदी-योगी से नाराज़ लोगों के सामने कांग्रेस के अलावा बीएसपी-एसपी भी विकल्प के तौर पर हैं। प्रियंका को महिला होने का फायदा भी मिलना मुश्किल है क्योंकि यहां भी मायावती विकल्प के तौर पर वोटर्स के सामने खड़ी हैं।

धार्मिक ध्रुवीकरण के मामले में प्रियंका का सामना सीधे बीजेपी से होगा । अयोध्या मामला फिर गर्माने के बाद हिंदू वोट योगी-मोदी की जोड़ी की तरफ आकर्षित हो सकता है। हालांकि राहुल के नर्म हिंदुत्व ने इसकी काट तीन प्रदेशों के विधानसभा चुनावों में की है, लेकिन क्या प्रियंका भी ऐसा ही कुछ कर सकेंगी इसका जवाब भविष्य देगा।

प्रियंका का करिश्मा पड़ेगा भारी?

कुल मिलाकर प्रियंका के सामने सबसे मुश्किल किले में सेंध लगाने की चुनौती है। उनके पास अपना निजी करिश्मा तो है पर उसे वो अमेठी और रायबरेली की जीत की तरह दोहरा सकेंगी इस पर कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी। उनका करिश्मा ही है जो  राहुल के लिए चमत्कार कर सकता है। 

1999 में रायबरेली की लोकसभा सीट पर जब गांधी परिवार की प्रतिष्ठा को उनके ही अपने अरुण नेहरू ने चुनौती दी थी तब प्रियंका के भाषणों ने चुनाव को एकतरफा बना दिया था।

इसी तरह 1999 में ही जब सोनिया गांधी के सामने बेल्लारी में बीजेपी की कद्दावर नेता सुषमा स्वराज ने ताल ठोकी तो प्रियंका ने मां की जीत को आसान बना दिया। चुनाव प्रचार के आखिरी दिन प्रियंका रैली में पहुंचीं और उन्हें देखने के लिए जो भीड़ उमड़ी वो वोटों में तब्दील हो गई। 56 हजार वोटों के अंतर से सोनिया ने उस चुनाव को जीत लिया था।

ज़ाहिर है, परिवार के लिए हमेशा जीत की गांरटी बननेवाली प्रियंका से राहुल गांधी की आस बेमानी नहीं है। बहन पर भाई के विश्वास को बनाए रखने की बड़ी ज़िम्मेदारी है। 

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