आंतों, जिगर और गुर्दों में सात गोलियां खाने वाले मानेकशॉ की बहादुरी को सलाम, पढ़ें दिलचस्प किस्से

इंदिरा गांधी 1971 में मार्च महीने में ही पाकिस्तान पर चढ़ाई करना चाहती थी लेकिन सैम ने ऐसा करने से इनकार कर दिया क्योंकि भारतीय सेना हमले के लिए तैयार नहीं थी.

नई दिल्ली: सैम होरमूज़जी फ़्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ क्या ये नाम आपने सुना है? बहुत कम ही लोग होंगे जिन्हें यह नाम पता है. पत्नी, दोस्तों या क़रीबी उन्हें सैम कह कर पुकारते थे या “सैम बहादुर”.

7 जून 1969 को सैम मानेकशॉ ने भारत के 8वें चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ का पद ग्रहण किया, और उसके बाद दिसंबर, 1971 में उन्हीं के नेतृत्व में भारत-पाक युद्ध हुआ और बांग्लादेश का जन्म हुआ.

देश के प्रति निस्वार्थ सेवा के चलते सैम मानेकशॉ को साल 1972 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से नवाज़ा गया. वहीं जनवरी, 1973 में उन्हें फील्ड मार्शल का पद दिया गया. इसी माह वह सेवानिवृत्त भी हो गए थे.

इंदिरा गांधी फील्ड मार्शल मानेकशॉ, आंतों, जिगर और गुर्दों में सात गोलियां खाने वाले मानेकशॉ की बहादुरी को सलाम, पढ़ें दिलचस्प किस्से

सेवानिवृत्ति से पहले ही पांच सितारा रैंक तक पहुंचने वाले सैम मानेकशॉ देश के एकमात्र सेनाधिकारी थे. वृद्धावस्था में उन्हें फेफड़े संबंधी रोग हो गया और आख़िरकार 27 जून, 2008 को तमिलनाडु के वेलिंगटन स्थित सैन्य अस्पताल में उनका देहावसान हो गया था.

सैम को सबसे पहले शोहरत मिली साल 1942 में. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बर्मा के मोर्चे पर एक जापानी सैनिक ने अपनी मशीनगन की सात गोलियां उनकी आंतों, जिगर और गुर्दों में उतार दीं.

इंदिरा गांधी फील्ड मार्शल मानेकशॉ, आंतों, जिगर और गुर्दों में सात गोलियां खाने वाले मानेकशॉ की बहादुरी को सलाम, पढ़ें दिलचस्प किस्से

आज जिनकी बहादुरी के क़िस्से पूरी दुनिया याद करती है कभी उनके पिता ही उन्हें सेना में भेजने को राजी नहीं थे लेकिन उन्होंने अपने पिता के ख़िलाफ़ ही बग़ावत कर दी. सैम ने इंडियन मिलिट्री अकैडमी, देहरादून में दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षा दी और 1932 में पहले 40 कैडेट्स वाले बैच में वो शामिल हुए.

आइए उनके जीवन से जुड़ी कुछ रोचक कहानियां पढ़ते हैं.

सैम बहादुर की जीवनी लिखने वाले मेजर जनरल वीके सिंह ने बीबीसी को बताया था, “उनके कमांडर मेजर जनरल कोवान ने उसी समय अपना मिलिट्री क्रॉस उतार कर कर उनके सीने पर इसलिए लगा दिया क्योंकि मृत फ़ौजी को मिलिट्री क्रॉस नहीं दिया जाता था.”

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जब मानेकशॉ घायल हुए थे तो आदेश दिया गया था कि सभी घायलों को उसी अवस्था में छोड़ दिया जाए क्योंकि अगर उन्हें वापस लाया लाया जाता तो पीछे हटती बटालियन की गति धीमी पड़ जाती. लेकिन उनका अर्दली सूबेदार शेर सिंह उन्हें अपने कंधे पर उठा कर पीछे लाया.

सैम की हालत इतनी ख़राब थी कि डॉक्टरों ने उन पर अपना समय बरबाद करना उचित नहीं समझा.

तब सूबेदार शेर सिंह ने भरी हुई राइफ़ल तानते हुए डॉक्टरों से कहा, “हम अपने अफ़सर को जापानियों से लड़ते हुए अपने कंधे पर उठा कर लाए हैं. हम नहीं चाहेंगे कि वह हमारे सामने इसलिए मर जाएं क्योंकि आपने उनका इलाज नहीं किया. आप उनका इलाज करिए नहीं तो मैं आप पर गोली चला दूंगा.”

डॉक्टर ने अनमने मन से उनके शरीर में घुसी गोलियां निकालीं और उनकी आंत का क्षतिग्रस्त हिस्सा काट दिया. आश्चर्यजनक रूप से सैम बच गए. पहले उन्हें मांडले ले जाया गया, फिर रंगून और फिर वापस भारत. साल 1946 में लेफ़्टिनेंट कर्नल सैम मानेकशॉ को सेना मुख्यालय दिल्ली में तैनात किया गया.

1948 में जब वीपी मेनन कश्मीर का भारत में विलय कराने के लिए महाराजा हरि सिंह से बात करने श्रीनगर गए तो सैम मानेकशॉ भी उनके साथ थे. 1962 में चीन से युद्ध हारने के बाद सैम को बिजी कौल के स्थान पर चौथी कोर की कमान दी गई.

पद संभालते ही सैम ने सीमा पर तैनात सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा था, “आज के बाद आप में से कोई भी जब तक पीछे नहीं हटेगा, जब तक आपको इसके लिए लिखित आदेश नहीं मिलते. ध्यान रखिए यह आदेश आपको कभी भी नहीं दिया जाएगा.”

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भारत ने 1971 युद्ध में सैम के ही नेतृत्व में पाकिस्तान को हराया और पाकिस्तान के 93000 सैनिकों को बंदी बनाया. इतने सारे क़ैदियों को एक साथ बंधक बनाना आज भी एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड है.

रक्षा मंत्रालय ने भी 1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध की उस ऐतिहासिक तस्वीर को ट्वीट किया है, जिसमें पाकिस्तानी सेना भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण के कागजों पर हस्ताक्षर कर रही है.

रक्षा मंत्रालय ने अपने ट्वीट में लिखा है कि 16 दिसंबर, 1971. सबसे छोटा युद्ध (13 दिन) और सबसे बड़ा आत्मसमर्पण. हम अपने जाबांज सैनिकों और मुक्ति जोधाज, जिन्होंने इस ऐतिहासिक जीत में योगदान दिया उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.

दरअसल आजादी के वक्त पाकिस्तान दो हिस्सों में पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान में बंटा हुआ था. पूर्वी पाकिस्तान, जिसे अब बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है, वहां रहने वाले बंगालियों को पश्चिमी पाकिस्तान में भेदभाव झेलना पड़ता था। यही वजह रही कि पूर्वी पाकिस्तान में अलगाव की भावना भड़क गई. पूर्वी पाकिस्तान में तत्कालीन नेता शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई लड़ी गई. इस लड़ाई में भारत ने भी पूर्वी पाकिस्तान की मदद की.

इस लड़ाई में भारत ने पाकिस्तान को धूल चटाते हुए उसके 93 हजार सैनिकों को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया था.

सैम हालांकि शक्ल से काफी सख़्त दिखाई देते थे लेकिन असल ज़िदगी में वह काफी सहज़ थे. इंदिरा गांधी के साथ भी उनके रिश्ते काफी बेहतर थे. इसका प्रमाण इस वाकये से भी मिलता है. 1971 के युद्ध के दौरान जब इंदिरा गांधी ने उनसे भारतीय सेना की तैयारी के बारे में पूछा तो उन्होंने जवाब दिया, मैं हमेशा तैयार हूं-स्वीटी.

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उनकी बेटी माया दारूवाला ने बीबीसी को बताया, “लोग सोचते हैं कि सैम बहुत बड़े जनरल हैं, उन्होंने कई लड़ाइयां लड़ी हैं, उनकी बड़ी-बड़ी मूंछें हैं तो घर में भी उतना ही रौब जमाते होंगे. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था. वह बहुत खिलंदड़ थे, बच्चे की तरह. हमारे साथ शरारत करते थे. हमें बहुत परेशान करते थे. कई बार तो हमें कहना पड़ता था कि डैड स्टॉप इट. जब वो कमरे में घुसते थे तो हमें यह सोचना पड़ता था कि अब यह क्या करने जा रहे हैं.”

1962 में चीन से युद्ध हारने के बाद सैम को बिजी कौल के स्थान पर चौथी कोर की कमान दी गई. पद संभालते ही सैम ने सीमा पर तैनात सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा था, “आज के बाद आप में से कोई भी तब तक पीछे नहीं हटेगा, जब तक इसके लिए लिखित आदेश नहीं मिलता. ध्यान रखिए यह आदेश आपको कभी भी नहीं दिया जाएगा.”

उसी समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण ने सीमा क्षेत्रों का दौरा किया था. नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी भी उनके साथ थीं.

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सैम के एडीसी ब्रिगेडियर बहराम पंताखी अपनी किताब सैम मानेकशॉ- द मैन एंड हिज़ टाइम्स में लिखते हैं, “सैम ने इंदिरा गांधी से कहा था कि आप ऑपरेशन रूम में नहीं घुस सकतीं क्योंकि आपने गोपनीयता की शपथ नहीं ली है. इंदिरा को तब यह बात बुरी भी लगी थी लेकिन सौभाग्य से इंदिरा गांधी और मानेकशॉ के रिश्ते इसकी वजह से ख़राब नहीं हुए थे.”

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मिजोरम में एक बटालियन उग्रवादियों से लड़ाई में हिचक रही थी. इस बारे में जब मानेकशॉ को पता चला तो उन्होंने चूड़ियों का एक पार्सल बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर को एक नोट के साथ भेजा. नोट में लिखा था, ‘अगर आप दुश्मन से लड़ना नहीं चाहते हैं तो अपने जवानों को ये चूड़ियां पहनने को दे दें.’

जिसके बाद बटालियन ने इस ऑपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया.

इंदिरा गांधी 1971 में मार्च महीने में ही पाकिस्तान पर चढ़ाई करना चाहती थी लेकिन सैम ने ऐसा करने से इनकार कर दिया क्योंकि भारतीय सेना हमले के लिए तैयार नहीं थी.

इंदिरा गांधी फील्ड मार्शल मानेकशॉ, आंतों, जिगर और गुर्दों में सात गोलियां खाने वाले मानेकशॉ की बहादुरी को सलाम, पढ़ें दिलचस्प किस्से

दरअसल जब इंदिरा गांधी ने असमय पूर्वी पाकिस्तान पर हमले के लिए कहा तो उन्होंने जवाब दिया कि इस स्थिति में हार तय है. इससे इंदिरा गांधी को गुस्सा आ गया. उनके गुस्से की परवाह किए बगैर मानेकशॉ ने कहा, ‘प्रधानमंत्री, क्या आप चाहती हैं कि आपके मुंह खोलने से पहले मैं कोई बहाना बनाकर अपना इस्तीफा सौंप दूं.’

मानेकशॉ ने कहा, मुझे छह महीने का समय दीजिए. मैं गारंटी देता हूं कि जीत आपकी होगी.

बीबीसी से बातत करते हुए मेजर जनरल वीके सिंह कहते हैं, “एक बार इंदिरा गांधी जब विदेश यात्रा से लौटीं तो मानेकशॉ उन्हें रिसीव करने पालम हवाई अड्डे गए. इंदिरा गांधी को देखते ही उन्होंने कहा कि आपका हेयर स्टाइल ज़बरदस्त लग रहा है. इस पर इंदिरा गांधी मुस्कराईं और बोलीं, और किसी ने तो इसे नोटिस ही नहीं किया.”

भारत-पाक के बंटवारे से पहले वह और याह्या खान (1971 युद्ध के दौरान पाकिस्तान के राष्ट्रपति) सेना में एक साथ सेवा दे रहे थे. मानेकशॉ ने अपनी बाइक याह्या को बेची थी जिसका पैसा याह्या ने चुकाया नहीं था. बाद में जब 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को हरा दिया और बांग्लादेश अस्तित्व में आ गया तो मानेकशॉ ने कहा, ‘याह्या ने मेरी बाइक का 1,000 रुपये मुझे कभी नहीं दिया लेकिन अब उसने आधा देश दे दिया है.’

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जब सेना द्वारा तख्तापलट की अफवाह फैली तब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं. उन्होंने सैम मानेकशॉ से पूछा. उन्होंने बोल्ड अंदाज में जवाब दिया, ‘आप अपने काम पर ध्यान दो और मैं अपने काम पर ध्यान देता हूं. राजनीति में मैं उस समय तक कोई हस्तक्षेप नहीं करूंगा, जब तक कोई मेरे मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा.’

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एक बार उन्होंने गोरखा रेजिमेंट की तारीफ करते हुए कहा, अगर आपसे कोई कहता है कि वह मौत से नहीं डरता है तो वह या तो झूठा है या फिर गोरखा.