राजनेताओं ने मुझे पांच साल से भूखा मार दिया… पढ़ें कंप्यूटर्स को मात देने वाले बिहार के लाल की कहानी

इस पर एक ग्रामीण की टिप्पणी है- 'वशिष्ठ नारायण लालू यादव के सामाजिक न्याय के परिधि में नहीं आते.'
vashishth narayan singh, राजनेताओं ने मुझे पांच साल से भूखा मार दिया… पढ़ें कंप्यूटर्स को मात देने वाले बिहार के लाल की कहानी

डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह का गुरुवार को पटना में निधन हो गया. उनके परिजनों ने आरोप लगाया है कि अस्पताल प्रशासन उन्हें सही समय पर एंबुलेंस तक नहीं उपलब्ध करा सका. डॉ वशिष्ठ नारायण को याद करते हुए वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर अपने फेसबुक वॉल पर पुरानी यादें साझा की हैं. वो लिखते हैं-

‘आप क्यों आए हैं ?’ 1993 में गणितज्ञ डा.वशिष्ठ नारायण सिंह ने मुझसे यही सवाल पूछा था. आगे उन्होंने कहा, ‘अखबार सब बेकार है. उनमें गणित नहीं होता. मैं ही पटना आऊंगा.
मैं अखबार निकालूंगा.’
कई साल तक लापता रहने के बाद डा.वशिष्ठ नारायण सिंह 1993 में गांव लाए गए थे. तब मैं जनसत्ता का संवाददाता था. मैं उनके गांव उनसे मिलने गया. उस समय जनसत्ता में प्रकाशित मेरी रपट यहां प्रस्तुत है- 

विलक्षण प्रतिभा संपन्न गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह इन दिनों यहां ग़रीबी, सरकारी उपेक्षा और मानसिक बीमारी की त्रासदी झेल रहे हैं. क़रीब पांच वर्षों तक लापता रहने के बाद वशिष्ठ नारायण इसी साल सात फरवरी को गांव लौटे हैं. इस अद्भुत प्रतिभा को एक नज़र देखने के लिए यहां लोगों की भीड़ लग रही है. पर प्रशासन ने अभी तक वशिष्ठ की सुध नहीं ली है.

रामानुजम जैसे ही प्रतिभावान इस गणितज्ञ के लिए 1964 में पटना विश्वविद्यालय के क़ानून में संशोधन किया गया था. लेकन सरकारी भेदभाद व उपेक्षा और पारिवारिक परेशानी के कारण विक्षिप्त हुए वशिष्ठ के इलाज़ की बात तो दूर उन्हें भोजन तक मयस्सर नहीं है. वशिष्ठ का ग़रीब परिवार इस प्रतिभा का देखभाल करने में असमर्थ है.

कर्पूरी ठाकुर के मुख्यमंत्रित्व काल में उन्हें बीस हज़ार रुपये की मदद ज़रूर मिली थी. उसके बाद किसी सरकार ने उनके लिए कुछ नहीं किया.

सिजोफ्रेनिया (मनोविकृति) से ग्रस्त वशिष्ठ कभी-कभी ठीक ठाक बातें करते हैं. किंतु कुछ देर बाद बेसिर पैर की बातें करते हैं. पर उनकी बातों में गणित का ज़िक्र ज़रूर होता है.

भोजपुर ज़िले के मुख्यालय आरा से क़रीब 18 किलोमीटर उत्तर के इस गांव में जब इस संवाददाता ने 48 वर्षीय वशिष्ठ से मुलाक़ात की तो उन्होंने कहा कि ‘आप क्यों आए हैं? अख़बार सब बेकार हैं. किसी में गणित नहीं होता. अख़बार मैथलेस है, मैं ही पटना आऊंगा. वहां से अख़बार निकालूंगा. अच्छा अख़बार निकालूंगा. उसमें गणित होगा.’

ईंट और मिट्टी के बने मकान में बेहद ग़रीबी की हालत में रह रहे वशिष्ठ बीच-बीच में कॉलेज के छात्रों में कभी-कभी गणित भी पढ़ा देतें हैं. किंतु कुछ ही देर बाद वे बेतरतीब बातें करने लगते हैं. वे कहते हैं- नेहरू इज़ कमिंग. मेनन इज़ कमिंग. आई हैव टू टॉक टू दैम. देश की हालत ख़राब है. पॉलिटिशियनों ने मुझे पांच साल से भूखा मार दिया.

जीर्णकार्य इस गणितज्ञ के बेतरतीब बढ़े सिर और दाढ़ी के बाल उजले हो चले हैं. पेट पीठ से सट गया है. और आखें धंस गईं हैं. दुर्बल शरीर और बुझी -बुझी आंखें. कभी अमेरिका और यूरोप के देशों में घूम-घूम कर गणित पर व्याख्यान देने वाले वशिष्ठ को अब भोजन और दवा के लाले पड़ गए हैं.

मां लहासो देवी गुम बैठीं है. भाई छठीलाल को कुछ समझ में नहीं आ रहा है. सिपाही पिता लालबहादुर सिंह को यह कहत-कहते कई साल गुज़र गए ‘हमार त सेना के जहाज डूब गईल.’

एक ग्रामीण ने कहा कि ’28 फरवरी को सरकार ‘विज्ञान दिवस’ मनाती है. उस दिन तो वह वशिष्ठ के लिए कुछ करें. डॉक्टर तो इस विचार के हैं कि वशिष्ठ की कभी ठीक से चिकित्सा नहीं हुई. कुछ कहते हैं कि वो ठीक भी हो सकते हैं. कुछ लोग निराश हो चले हैं.’

वशिष्ठ पर इस ज़िले को ही नहीं, बल्कि बिहार के लोगों को भी गर्व रहा है. वे न सिर्फ 1963 में हायर सेकेंड्री परीक्षा में रिकॉर्ड नंबर के साथ पूरे बिहार में प्रथम आए थे. बल्कि वे अन्य सभी परीक्षाओं में भी प्रथम आए.

1963 में जब वे बीएससी (पार्ट वन) में ही एमएससी तक के गणित के सवाल हल करने लगे तो पटना साइंस कॉलेज के तब के प्राचार्य डॉ. एनएस नागेंद्रनाथ यह देख अचंभित रह गए.

उन्होंने तब के वाईस चांसलर जार्ज जैकब से कहकर पटना विश्वविद्यालय क़ानून में संशोधन कराया और पढ़ाई का समय पूरा होने के पहले ही वशिष्ठ को बीएससी और एमएससी की परीक्षाएं देनें की इजाज़त दी गईं. उन परीक्षाओं में भी वो प्रथम आए.

इसके बाद वो अमेरिका गए जहां उन्होंने विशिष्टता के साथ ऊंची शिक्षा प्राप्त की. लेकिन स्वदेश लौटने के बाद उनकी परेशानियां शुरू हो गई. पहले बंबई में उन्हें नौकरी मिली. बाद में उनका तबादला कलकत्ता कर दिया गया. वे कलकत्ता स्टेटिस्टिकल इंस्टीट्यूट में शिक्षक थे.

मक्खनबाजी नहीं कर पाने की वजह से उन्हें बंबई और कलकत्ता में काफी परेशानी उठानी पड़ी. उधर उनके कांस्टेबल पिता लालबहादुर सिंह ने सारण ज़िले के खलपुरा के डॉ. दीप नारायण सिंह की पुत्री वंदना से वशिष्ठ की शादी कर दी.

गणित के संसार में डूबे वशिष्ठ अपनी पत्नी की तरफ पूरा ध्यान नहीं दे पाए. इस कारण पारिवारिक जीवन अशांत हो उठा. उधर संस्थान में उनके साथ भेदभाव और उपेक्षा के कारण उनके दिमाग़ी तंतु उलझ गए. इस बीच पत्नी वंदना ने उनसे तलाक़ ले लिया.

भीतर से टूट गया यह गणितज्ञ इसके बाद पूरी तरह विक्षिप्त हो कर गांव लौट आया. उनका कमाा पैसा चुक गया और वे अभाव और ग़रीबी में रहने लगे.

इस बीच फरवरी 1978 में ‘इंडियन नेशन’ ने पहले पेज में वशिष्ठ की दशा के बारे में मार्मिक रपट छापी. उस पर पटना में तहलका मचा. नेतरहाट स्कूल के पूर्व छात्रों और तब के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के प्रयास से उन्हें इस गांव से निकाल कर अस्पताल पहुंचाया गया.

रांची के डॉ. डेविस के अस्पताल में उनका इलाज़ चल रहा था. सरकार ने खर्च देने का वायदा किया था. लेकिन बाद में कांग्रेस सरकार ने खर्च बंद कर दिया.

बाद में उन्हें रांची के सरकारी पागलखाने में रखा गया. वहां इलाज़ की ज़रूरी व्यवस्था नहीं थी. परिजन इस अव्यवस्था से हार कर उन्हें घर ले आए.

क़रीब पांच साल पहले वशिष्ठ के भाई किशनसिंह वशिष्ठ को बंबई-जनता एक्सप्रेस ट्रेन से पूना इलाज़ के लिए ले जा रहे थे. बीच में खंडवा (मध्य प्रदेश) में वे ट्रेन से ग़ायब पाए गए. उन्हें खोजने का सरकार ने कोई प्रयास नहीं किया.

पांच साल तक वे कहां-कहां भटकते रहे इस बारे में पूछने पर वशिष्ठ कुछ नहीं बताते. वे सिर्फ कहते हैं कि मुझे पॉलिटिशियनों ने पांच साल से भूखा मार दिया. अंत में वे सारण ज़िले में अपनी पुरानी ससुराल खलपुरा के पास डोरीगंज बाज़ार में मिले.

वे वहां बीस दिनों से भटक रहे थे कि उनके गांव के कमलेश राम संयोगवश किसी काम से डोरीगंज गए थे. कमलेश उन्हें देखते ही वहां पहचान गया.

कमलेश ने उनसे बात करनी शुरू की. कमलेश ने उनसे पूछा- डॉ. राजेंद्र प्रसाद कहां के थे? उन्होंने कहा कि वे बिहार के थे. फिर उनसे पूछा कि डॉ वशिष्ठ नारायण कहां के थे? इस पर उन्होंने कहा- ‘हट बदमाश’.

कमलेश को पक्का विश्वास हो गया कि वो वशिष्ठ ही हैं. उन्हें यहां उनके गांव लाया गया. वशिष्ठ को देखनेवालों का मेला लगा रहता था. लेकिन सरकार मौन है. इस पर एक ग्रामीण की टिप्पणी है- ‘वशिष्ठ नारायण लालू यादव के सामाजिक न्याय के परिधि में नहीं आते.’

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